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दुनिया मेरे आगे: चुप्पी का शोर

सूचना तकनीक ने चौबीसों घंटे और बारहों महीने बोलते रहने की व्यवस्था खड़ी कर दी है। इससे सुनने-समझने की सभ्यता के सामने संकट आ गया है। जब कहीं कोई सुनने या समझने को तैयार ही नहीं, तो लोगों ने बोलना ही कम कर दिया।

लोकतंत्र में बोलने की आजादी व्यवस्था पर नियंत्रण के लिए आवश्यक माना गया है।

अनिल त्रिवेदी

कोई खुद को पूरी तरह मुक्त कहने वाला समाज भी अभिव्यक्ति को शत-प्रतिशत सह नहीं पाता। शब्द विचार और भाषा मर्यादा से मुक्त नहीं हो सकते। यह अलिखित सभ्यता है। शिष्टाचार, आचार व्यवहार की मर्यादा भी सभ्यता के विचार से ही उपजी है। क्रोध और अधीरापन, मन की दो स्थितियां हैं जो हमारे आचार और व्यवहार को गहरे तौर पर प्रभावित करती हैं। मानव सभ्यता के पास अभिव्यक्ति का लंबा अनुभव है।

किसी के बोलने के लहजे या तौर-तरीके से ही लोगों को आमतौर पर अंदाजा हो जाता है कि बोलने वाला व्यक्ति कैसा है। हमारी बोलचाल मारक और तारक दोनों ही हो सकती है। हमारा मौन या हमारी चुप्पी भी अभिव्यक्ति है। हमारे बोलने से हल्ला, असहमति, अवमानना और विरोध हो सकता है, पर चुप रहना भी अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा हो सकती है।

चुप रहने के भी कई अर्थ होते हैं। बल्कि कई बार बहुत गहरे अर्थ होते हैं। लोग जब चुप होते हैं तो उनका मौन वाचाल होता है। दरअसल, चुप रहना हमेशा तटस्थ होना नहीं होता। गहरी चुप्पी परिवर्तन की आहट होती है। कुछ लोग आवाज से परेशान होते हैं तो कुछ आवाज को उठने नहीं देना चाहते। इसलिए आवाज को समझना जरूरी है। सन्नाटा चुप्पी से अलग है। कोलाहल और फुसफुसाहट के गहरे अर्थ होते हैं। बोलने के लहजे या हाव-भाव से एकदम क्या कहा जा रहा है, यह समझ में आ जाता है।पर चुप्पी का अर्थ खोजना होता है।

मसलन, आज लोग चुप क्यों हैं? यह भी अनुसंधान का विषय हो सकता हैं। क्या लोग भयभीत हैं? क्या लोग संतुष्ट हैं? गहरी चुप्पी से पहले लोग सवाल उठाना बंद करते हैं। चुप्पी भी एक बड़ा और गहरा सवाल है। कई बार बोलना चुप रहने से बेहतर होता है, तो कभी बोलने से बेहतर होता है चुप रहना।

दरअसल, बोलना और चुप रहना दोनों ही अभिव्यक्ति है। आप संदेही हैं और चुप हैं तो संदेह निवारण या कबूल करने की खातिर आपको बोलने के लिए बाध्य किया जाएगा और निरंतर सवाल पूछते हैं तो आपको सवाल पूछने से रोका जाएगा। खुला समाज और संवैधानिक व्यवस्थाएं भी सवाल उठाए जाने और बोलने पर निगरानी और नियंत्रण रखती हैं। सोए हुए व्यक्ति को हल्ला करके सोने नहीं देना असभ्यता है और सोए हुए समाज या देश को आवाज देकर जगाना लोकतांत्रिक सभ्यता है।

आज कल लोगों से ज्यादा व्यवस्था परेशान है कि कोई सवाल तो नहीं उठा रहा है! कई बार लोग इसलिए भी सवाल नहीं उठाते कि व्यवस्था सुनती नहीं और कई बार सवाल इसलिए भी नहीं उठते कि आपके पास कोई जवाब ही नहीं है। व्यवस्था को बोलना कम और सुनना-समझना ज्यादा चाहिए। पर आजकल व्यवस्था निरंतर बोलती रहती है और सुनती-समझती कम है।

सूचना तकनीक ने चौबीसों घंटे और बारहों महीने बोलते रहने की व्यवस्था खड़ी कर दी है। इससे सुनने-समझने की सभ्यता के सामने संकट आ गया है। जब कहीं कोई सुनने या समझने को तैयार ही नहीं, तो लोगों ने बोलना ही कम कर दिया।

लोगों की चुप्पी व्यवस्था की पहली पसंद है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मूल अधिकार माना गया है। पर लोगों को सुनना-समझना और बिना बोले लोक कल्याण के कामों को बिना रुके, बिना थके करते रहना, यह व्यवस्था अब तक खड़ी नहीं हो पाई है। लोक लुभावन बातों को बोलते रहने की व्यवस्था बढ़ गई, तो लोगों का सारा समय सुनने में ही चला जाता है।

लोग चुप रहें और व्यवस्था बोलती रहे, यह लोकराज के व्यवस्था-तंत्र की नई व्यवस्था है। मगर यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि सरकारें जब असरकारी काम नहीं कर पातीं तो लोगों को चुप्पी तोड़ कर बोलना होता है। लोगों की आवाज व्यवस्था-तंत्र को असरकारी बनाने में मदद करती है।

अभिव्यक्ति की आजादी मानसिक गुलामी को खत्म कर लोक चेतना का विस्तार करती है। लोक और व्यवस्था, दोनों परस्पर एक दूसरे पर आश्रित हैं। लोक चुप है तो व्यवस्था अव्यवस्था का विस्तार करेगी। लोगों को अनसुना कर व्यवस्था का बोलते रहना दरअसल नाम और दिखावे का लोकतंत्र है।

व्यवस्था को निरंतर सुनना और समाधान प्रस्तुत करना चाहिए और लोगों को लोकतंत्र मे लोकशक्ति को चैतन्य बनाए रखते हुए अभिव्यक्ति को मुखर और प्रखर रखना चाहिए। लोभ लालच या सत्ता, समाज, विचार, संगठन और धर्म के भय से मुक्त रह कर चुप्पी या सन्नाटे से लोकतंत्र को भयतंत्र या भीड़तंत्र में नहीं बदलने देना चाहिए।

यही अभिव्यक्ति की आजादी का मूल अर्थ है। अभिव्यक्ति की मुखरता, प्रखरता और अधीरता से मान-सम्मान, अपमान, मर्यादा और अवमानना जैसे सवाल उभर सकते हैं, पर चुप्पी सवालों से परे सवाल खड़े करने की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े करती है। चुप्पी लोकतंत्र के मूल स्वरूप से ही खुला, पर मौन सवाल है, जो समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा करता है। लोकतंत्र में सन्नाटा या चुप्पी लोक की अवमानना है। लोकतंत्र में लोक जीवंत और तंत्र लोक संवेदना से परिपूर्ण होना चाहिए।

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