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दुनिया मेरे आगेः इंद्रधनुष के रंग

सोता हुआ मौसम जब उनींदी पलकों से झांकता है तो उसे रंगों के इंद्रधनुष टंगे दिखाई देते हैं। दिन बदले हुए खुले-खुले से और आकाश पहले से कहीं ज्यादा पारदर्शी हो जाता है।

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सोता हुआ मौसम जब उनींदी पलकों से झांकता है तो उसे रंगों के इंद्रधनुष टंगे दिखाई देते हैं। दिन बदले हुए खुले-खुले से और आकाश पहले से कहीं ज्यादा पारदर्शी हो जाता है। तब जंगल से चल कर जो हवा गलियारों में आती है, वह हर एक मन का ठौर-ठिकाना जान लेती है और अपने आने की सूचना दे जाती है। उपवन में शिरीष पलाश और अमलतास के पत्ते इधर से उधर उड़ते सरसराते हैं। हर घर-आंगन में मौसम की अनगिनत चिट्ठियां पड़ी दिखाई देती हैं, जिसे लिखने वाला होता है फागुन।

वही फागुन, जिसके स्मरण मात्र से स्फुरण होता है और देह का पोर-पोर भीग जाता है… जिसमें धूप के सकोरे भर-भर कर पीने के बाद भी मन अघाता नहीं और देह को हवा की चुभन भली लगने लगती है। पीली सरसों का चरमोत्कर्ष पूरे खेत को उसका यौवन देती है और कहीं दूर कोयल का मधुर राग सन्नाटे से टकरा कर दिलों में हलचल जगा जाता है। फागुन की चुहल के अर्थ बीस रंगों से घिरे मनोवांछित रूप में ग्रहण किए जाते हैं, तब फिर ऋतु का आवेग थामे नहीं थमता और सेमल या कनेर के फलों की स्निग्धता भी पैने नश्तर की तरह चुभ-चुभ जाती है। गेहूं की बालियों से लिपटी सरसों और अलसी अपनी मादक गंध का पाश और सख्त कर लेती है। फगुनौटी की सनन-सनन की आवाज से सारा परिवेश चैकन्ना होकर चेतना के आलोक से घिर जाता है।

फागुन चौपालों पर गीत के सुर अलापता है, नृत्य में विभोर होकर हर किसी को लुभाता है। आदिवासी क्षेत्रों में तो जैसे संस्कृति की मूल चेतना साकार हो गई है। लोक गीतों और लोकनृत्य की भरमार हो जाती है। स्त्रियों में फूल सजाने का चाव, नृत्य करने और पुरुषों के गैर, डांडिया और गींदड़ नाचों को देखने की प्रबल उत्कंठा से फागुन सराबोर रहता है। कितना ही जरूरी काम हो, मनुष्य इस ऋतु में बौराया इसके मायाजाल में फंस कर चंद क्षणों के लिए बेसुध हो जाता है। घुंघरुओं और पैंजनियों की झनन-झनन की खनक से कान खड़े होकर अपने प्रियतम का करीबीपन चाहता है।

घर-घर में फाग का रास होता है। वसंतोत्सव मदनोत्सव में बदल कर लोक-लाज की सीमाएं लांघ जाता है। बागों में असंख्य रंगों की पिचकारियां चलती हैं और भंगिमाएं परिवर्तन को समर्पित हो जाती हैं। फागुन खेतों में पानी के धारों से होकर निर्मल जल में दौड़ता हरियाली को परवान चढ़ाता है। तब ही टिटहरी की चीख से पनघट का पारा गूंज उठता है।

मरुस्थल की भावनाएं लोक संस्कृति की पोषक रही हैं। यहां नायिकाओं के संयोग और वियोग दोनों का जीवंत सौंदर्य देखा जा सकता है। एक गीत में यहां लोक जीवन की अद्भुत झांकी मिलती है, जिसमें नायिका फागुन की सूचना से नायक को अवगत कराती है और कहती है कि चारों दिशाओं में फागुन पूरी तरह छा गया है। मेरी सास तो सूत की कूकड़ी (काते हुए सूत का गुच्छा) चाहती हैं और साजन रूप इसमें वह अंत में समाधान रूप में स्पष्ट करती हैं कि दिन में सूत कातूंगी और रात में साजन को रूप दूंगी- ‘रसिया फागण आयो/ चार खूंट चोंतरों हो रसिया/ जिस पे कातूं सूत/ तो सासू मांगे कूकड़ी/ तो साजन मांगे रूप।’

कमोबेश नारी का यह स्वरूप आज भले आधुनिक रूप ले चुका हो, लेकिन वह पुरुष की सहचरी के रूप में आज भी प्रेरणा बनी रही है। उसकी चाहना कम नहीं है आज भी। रंग डालने की मौज-मस्ती में कहीं कमी नहीं है। स्त्री-पुरुष समान भाव से भीतर का उल्लास उसी भाव से व्यक्त करते हैं। रंग-अबीर के बादल अब भी जब बनते हैं तो मन की सुप्त भावनाएं अभी भी चंचल हो उठती हैं। फागुन के आने की सूचना पक्षियों की चहचहाहट और मोर के किलकने से पता चल जाती है, तब भला कैसे नहीं जानें कि फागुन का रंगीला स्वभाव किस-किसको अपने जादू की चपेट में नहीं लेगा।

रंगों से भरी मौसम की पिचकारियां जब इसे और भड़कीला स्वरूप दे जाती हैं, तभी कहीं मैदानों में बहती नदी का जल ठहरा-सा दिखाई देता है और पहाड़ों में भीतर तक उजाला पहुंच कर फागुन के स्वागत में नागफनियों में भी सौंदर्य को पिरो देता है। जीवन का राग नए सुर और ताल की तलाश में संस्कृति के लोकतत्त्व को पा लेता है। शहतूत-जामुन और पीपल के पत्ते ठहाका मार कर हंसते हैं। तब आम के वृक्ष में जो बौर उगता है, उसकी गंध में एक आमंत्रण महसूस होता है। इसी आमंत्रण से भरमाए वन्यजीव बेतहाशा दौड़ते, हांफते, थकते, परेशान से होकर छांव तले सुस्ताते हैं। फागुन रंग हजार हैं। जीव-जगत को उसने अपनी चपेट में ले लिया है और मेलों की असीम छटा से मस्ती का नाच सर्वत्र हो रहा है। इस अलबेली ऋतु में कोई कैसे साधे अपने को! इसकी छब में बैचेन दिलों में अभी भी भव्य जीवन का सतरंगी स्वरूप व्याप्त है।

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