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दुनिया मेरे आगे: बादल, बरखा और बाढ़

दरअसल, सावन का माह प्रेमोत्सव का माह है और इस प्रेमोत्सव में किसी के प्रेम का वितान फैल कर समस्त सृष्टि को अपनी बाहों में भर लेता है। वह किसी वैयक्तिक आलंबन का मोहताज नहीं रह जाता।

sawan, rain, entertainबारिश और सावन का आनंद मन को भाव-विभोर कर देता है।

मेधा
मौसम के साथ माहौल में जो घुटन थी, दिल्ली में बारिश की शुरुआत के साथ थोड़़ी कम-सी महसूस हुई। सब कुछ तो बंद है, फिर भी सावन के विरह में तड़पते दिल को अब जाकर तनिक करार आया है। दिल्ली वालों को अब पता चला कि यह सावन का महीना है, वरना पिछले कुछ महीने से वे एक ही रंग में गुम हैं। हरियाली के मौसम में अब कल्पनाओं में कलाई हरी चूड़ियों की मांग करने लगी हैं।

अलमारी में रखी हरी साड़ियां आवाज दे रही हैं कि तुम्हारी मेरे दिन आ गए हैं। सोसायटी के पार्क में लगे मेंहदी के पेड़ पुकार कर कह रहे हैं कि इस बार बाजार की मेंहदी नहीं, मुझे अपनी हथेलियों में रचाओ। यूट्यूब से निकलकर बारिश के गीत मन-आंगन में उतरने लगे हैं। कजरी की तान पर मन पुराने पीपल पर लगे झूले पर पेंग भरने लगा है। मन-मोर आगत-विगत का मोह छोड़ रहा है। क्षण में जीना बखूबी सिखा रहा है सावन। बारिश के मौसम में कविता पढ़ने-लिखने के बजाय खुद ही कविता हो जाना होता है।

पल-पल बदलती आसमान की रंगत हृदय को भी नित-नूतन करती है। दरअसल, सावन का माह प्रेमोत्सव का माह है और इस प्रेमोत्सव में किसी के प्रेम का वितान फैल कर समस्त सृष्टि को अपनी बाहों में भर लेता है। वह किसी वैयक्तिक आलंबन का मोहताज नहीं रह जाता।

बारिश की झड़ी को तकते हुए घंटों दीन-दुनिया को भुला बैठना कितनी स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है। सहज ‘बरखा-ध्यान’ चित्त को वैसे ही निर्मल किए देता है, जैसे बादल के बरसने से सारी प्रकृति धुल-पोंछ कर साफ हो जाती है। लेकिन प्रकृति के इस महारास में सहज ही एकलय हो जाने वाला हृदय इस बार ऐसा कर पाने में अपने को सर्वथा असमर्थ पा रहा है। सोशल मीडिया पर मित्रों के भेजे चित्र और चलचित्र आंखों के सामने तैर रहे हैं। असम और बिहार बाढ़ से त्रस्त हैं। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश में गांव-शहर, सभी डूब रहे हैं।

लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि बाढ़ का यह दारुण दृश्य महज इस साल की बात हो, लेकिन इस साल महामारी के प्रकोप पर बारिश का कहर संकट को विकराल बना रहा है। बाढ़ को शायद बिहार की जनता ने भी अपनी नियति ही मान लिया है। हम बिहार की संतानें बाढ़ को वार्षिक जीवन-चक्र का एक सहज हिस्सा मान लेने के आदी हो गए हों जैसे। बचपन में विद्यालय की अन्य वार्षिक गतिविधियों में ही शामिल था बारिश के दिनों में बाढ़-राहत से जुड़े काम, मसलन, पूरियां बनाना, खाने के पैकेट तैयार करना, राहत कार्य के लिए चंदा मांगना आदि।

बाढ़ को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानने के लिए हम अभिशप्त बना दिए गए हैं। लेकिन इस सच्चाई से भला कैसे इनकार किया जा सकता है कि ये हमारे हुक्मरानों की बदनीयती का नतीजा है कि हर साल बाढ़ से लाखों लोग बेघर हो जाते हैं। हर बार ये लोग फिर से जिंदगी शुरू करने को अभिशप्त हैं।
आजादी के तिहत्तर साल बाद भी अगर बाढ़ से मुक्ति का मार्ग नहीं ढूंढ़ा जा सका तो उसकी वजह यह कतई नहीं कि बाढ़ से मुक्ति का कोई उपाय ही न हो। इसका कारण मुझे ग्रामीण पत्रकारिता के लिए मशहूर पी साईनाथ की प्रसिद्ध पुस्तक ‘एवरीबडी लव्स ए गुड ड्राउट’ में नजर आता है। बाढ़ और सूखा हमारे राजनेताओं और अफसरशाही के लिए अपनी तिजोरियां भरने का अवसर होता है। इसीलिए इस देश की व्यवस्था में न तो सूखा और न ही बाढ़ के स्थायी समाधान के बारे में कभी सोचा गया। लेकिन लोकतंत्र के जिम्मेदार नागरिक के बतौर सवाल करना हमारा हक है।

ऐसा नहीं है कि सवाल की धार हमेशा बेकार जाती है। बिहार की तेरह करोड़ जनता अगर व्यक्तिगत-सामाजिक और राजनीतिक राग-द्वेष को भुला कर एक साथ सवाल करे तो उसकी धार से यह भ्रष्ट व्यवस्था ताश के महल-सी ढह जाए। वह दिन कभी तो आएगा जब इस लोकतंत्र में सचमुच ही नेता की नकेल जनता के हाथों में होगी। ऐसे दिन देखने के लिए जनता को नेताओं की बांटने की राजनीति को समझना और उसे नाकामयाब करना होगा।

इस घोर अंधेरे समय में भी मैं उम्मीद का दामन नहीं छोड़ सकती। इसी मिट्टी से मैं उन नेताओं को भी उभरते हुए देख रही हूं, जिनकी सौ प्रतिशत प्रतिबद्धता अपनी जनता के प्रति है। इसी देश के कुछ सौभाग्यशाली राज्यों को ऐसे नेताओं का नेतृत्व मिला है और उन राज्यों के दिन फिर गए हैं। मेरी प्रार्थना है कि जैसे उन राज्यों के दिन फिरे हैं, वैसे ही हमारे बिहार के भी दिन फिरें। देश के सभी राज्यों के दिन फिरे। फिलहाल मुझे सुमित्रानंदन पंत की कविता की ये पंक्तियां याद आ रही हैं- ‘सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरन’! तो मैं बाढ़ के दुख के साथ ही सावन की थोड़ी खुशियां चुन लेती हूं।

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