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दुनिया मेरे आगेः सुधार की राह

मनुष्य की प्रवृत्ति होती है बहाव के साथ चलना। ऐसे लोगों से किसी नए काम की आशा नहीं की जा सकती है। लेकिन जो बहाव के विरुद्ध चलते हैं, उनसे हम उम्मीद कर सकते हैं।

महेश परिमल

भोपाल की एक अदालत ने हाल ही में एक अनोखा फैसला सुनाया। छियासठ साल की वृद्ध मां को उनके बेटों ने घर से बेदखल कर दिया था। अदालत ने उन बेटों को आदेश दिया कि अगले छह महीने तक लगातार वे महीने में एक दिन वृद्धाश्रम जाकर बुजुर्गों की सेवा करें और उनके साथ तस्वीर भी खिंचवाएं। इसका रिकॉर्ड रखें और अदालत में पेश करें। ऐसा इसलिए कि उन्हें इस बात का अहसास हो कि अकेले रहने वाले बुजुर्गों की पीड़ा क्या होती है। अदालत के आदेश के अनुसार बेटों को हर महीने में दो दिन परिवार समेत मां के साथ गुजारने पड़ेंगे और उनकी देखरेख भी करनी होगी। जब भी मां का जन्मदिन आएगा, बेटों को परिवार सहित उनके पास जाकर जन्मदिन मनाना होगा। इससे पहले मई 2016 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दो अनोखे फैसले सुनाए थे, जिनमें सजा के रूप में आरोपियों को पांच हजार पौधे लगाने का आदेश दिया गया था। यह हम सब जानते हैं कि सजा पाने वाला हमेशा अपराधी नहीं होता। पर जो जान-बूझ कर अपराध करते हैं, उनके लिए सजा ऐसी होनी चाहिए कि दूसरे भी उसे चेतावनी के रूप में लें।

सोच कर देखिए, वह दृश्य कितना सुखद होगा, जब हम देखेंगे कि एक नेता पूरे एक हफ्ते तक झोपड़पट्टियों में रह कर वहां रहने वालों की समस्याओं को समझ रहा है। एक मंत्री ट्रेन के साधारण दर्जे में यात्रा कर यात्रियों की समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहा है और एक साहूकार खेतों में हल चला कर एक किसान की लाचारगी को समझने की कोशिश कर रहा है। यातायात का नियम तोड़ने वाला शहर के भीड़-भरे रास्तों पर साइकिल चला रहा है। वातानुकूलित कमरे में बैठने वाला अधिकारी कड़ी धूप में खेतों में खड़े होकर किसान को काम करता हुआ देख रहा है। बड़े-बड़े उद्योगपतियों की पत्नियां झोपड़पट्टियों में जाकर गरीबों का जीवन देख रही हैं। ये दृश्य आम नहीं हो सकते। लेकिन हमारे देश में अगर परंपरागत निर्णयों से हट कर कुछ नई तरह की सजा की व्यवस्था शुरू हो तो तस्वीर बदल सकती है।

मनुष्य की प्रवृत्ति होती है बहाव के साथ चलना। ऐसे लोगों से किसी नए काम की आशा नहीं की जा सकती है। लेकिन जो बहाव के विरुद्ध चलते हैं, उनसे हम उम्मीद कर सकते हैं। यों अदालतों ने कई बार जरा हट कर सजा सुनाने की कोशिश की है। एक बार एक विधायक को अदालत ने गांधी साहित्य पढ़ने की सजा दी थी। एक मशहूर हस्ती को झोपड़पट्टी इलाके में एक सप्ताह बिताने का आदेश दिया गया था। अगर लीक से हट कर सजा सुनाई जाए तो ऐसी सजा भुगतने वाले को अहसास होगा कि यह जटिल सजा है। एक करोड़पति अपराधी को अगर किसी अपराध के बदले हजार रुपए का जुर्माना कर भी दिया गया तो उसे क्या फर्क पड़ेगा। लेकिन उसे रिक्शा चला कर एक निश्चित आमदनी रोज अदालत में जमा करने को कहा जाए तो यह प्रायश्चित वाली सजा होगी।

कुछ साल पहले आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में पकड़े गए व्यक्ति पर पांच करोड़ रुपए का जुर्माना लगाते हुए देवास की अदालत ने कहा था कि भ्रष्ट लोक सेवक और व्यवसायी अनुपातहीन संपत्ति इतनी चतुराई से रखते हैं कि उन्हें पकड़ पाना लगभग असंभव हो चुका है। इसे पकड़ने की व्यवस्था के साथ-साथ भ्रष्टाचार के एवज में ऐसा दंड दिया जाना चाहिए, जिससे अपराधी के मन में भय पैदा हो कि जिस दिन वे पकड़े जाएंगे, उस दिन भ्रष्ट साधनों से अर्जित संपत्ति समूचे मूल्य सहित उनके पास से वापस चली जाएगी।

दरअसल, अदालत के फैसले का आज भी सम्मान होता है। आम लोग यही मानते हैं कि फैसले के पीछे न्यायोचित आधार होगा। इसलिए सुधार के मकसद से ऐसी सजाएं सुनाने से पहले अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखना होगा। जघन्य अपराधों के मामले में इसी तरह की व्यवस्था को शायद सहज स्वीकृति न मिल सके। हालांकि सच यही है कि बेहद सख्त सजाओं के प्रावधान भी अपराध को जड़-मूल से खत्म कर सकने में नाकाम साबित हुए हैं। ऐसी अनोखी सजाएं अगर सामने आने लगें तो शायद लोग वैसे अपराध करने से पहले सोचें कि न जाने कब कैसी सजा मिल जाए! यह भी तय है कि कई लोग केवल अपनी ‘इज्जत’ का हवाला देकर इस तरह की सजा का विरोध करेंगे। मुझे 1971 में देखी एक फिल्म ‘दुश्मन’ याद है। इसमें नायक के ट्रक के नीचे आने से एक व्यक्ति की मौत हो जाती है। जज उसे मृतक के परिवार को पालने की सजा देते हैं। पहले तो नायक को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, बाद में स्थिति सामान्य हो जाती है। फिल्म के अंत में नायक जज के पांवों पर गिर कर अपनी सजा बढ़ाने की गुहार लगाता है। यानी सजा के जरिए अगर अपराधी का सचमुच सुधार हो सके तो उसे सजा के मकसद को पूरा होने के रूप में देखा जाएगा।