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मुनाफे की दुनिया

मेरे बचपन में हमारे एक पड़ोसी थे। वे सुनारी का काम करते थे। जब तक उनके शरीर में दम रहा, तब तक वे दिन-रात काम कर परिवार का पेट पालते रहे। लेकिन इससे काम चलना मुश्किल हुआ तो उन्होंने ट्यूशन स्कूल खोल लिया, जो कुछ ठीक से चल निकला। कई छोटी-मोटी घरेलू चीजों का भी […]

Author Published on: June 11, 2015 8:26 AM

मेरे बचपन में हमारे एक पड़ोसी थे। वे सुनारी का काम करते थे। जब तक उनके शरीर में दम रहा, तब तक वे दिन-रात काम कर परिवार का पेट पालते रहे। लेकिन इससे काम चलना मुश्किल हुआ तो उन्होंने ट्यूशन स्कूल खोल लिया, जो कुछ ठीक से चल निकला। कई छोटी-मोटी घरेलू चीजों का भी उत्पादन करने लगे, मसलन गरम मसाला, सिर धोने का पाउडर, मंजन आदि। गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया।

उनका बनाया गरम मसाला हमें उनके जीवन के आखिर तक मिलता रहा। वे दुकान-दुकान जाकर खुद अपना सामान बेचने के लिए दे आते थे। मगर उनके उत्पाद स्थानीय बाजार में सफल नहीं हो सके। हालांकि तब दुकानों पर बहुत सी चीजें घरेलू उद्योगों की बनाई मिलती थीं, जिन्हें खासकर गरीब तबका खरीदता था। दरअसल, गरीब लोगों को दिखावा पसंद नहीं होता, इसलिए वे सस्ती और अच्छी चीजों की तलाश में रहते हैं। खैर, तब ‘ब्रांड’ नामक बीमारी इतनी नहीं फैली थी। गरीब लोगों को एक शाम या दो बार का खाना बनाने के लिए थोड़ी मात्रा में भी सामान दुकानदार सहजता से दे देता था। सुबह की चाय के लिए सौ ग्राम दूध खरीदने वाले तब कई थे।

मैंने बचपन में घरेलू उद्योगों में तैयार कपड़े धोने के साबुन से लेकर कई चीजें खरीदी हैं। उन दिनों कपड़े धोने के साबुन का चूरा भी मिलता था, जो काफी सस्ता पड़ता था। दांत तो हम चूल्हे की राख से भी साफ कर लेते थे या कोयले के चूरे में नमक आदि मिला कर घर में बनाए गए मंजन से भी। टूथब्रश का तब पता नहीं था। तब ट्रक-बस के बेकार हो चुके टायर की बनी चप्पलें आठ आने में साप्ताहिक हाट में मिल जाती थीं। तब बाटा और कैरोना के जूते मिलते जरूर थे, मगर हाथ से बने जूतों की बिक्री ज्यादा थी। सिर्फ स्कूल में पहनने के कपड़े के जूते बाटा या किसी और ब्रांड के खरीदने पड़ते थे। लेकिन तब ब्रांड का नहीं, जरूरत का महत्त्व था।

खैर, जो जमाना जा चुका, वह लौट कर नहीं आने वाला। यह बात इंसान और समय के बारे में भी सही है। लेकिन अब दूसरे किस्म की अति दिख रही है। अब ब्रांड ही सब कुछ हो चला है। ब्रांड से मेरा पहला परिचय तब हुआ, जब हमारे पूर्व पड़ोसी के बेटे ने ब्रांडेड जूते खरीदे। पता चला कि बारह सौ रुपए में आए हैं तो उन दिनों तीन-चार सौ रुपए के जूते इतने महंगे खरीदे जाने पर कई दिनों तक मैं आश्चर्य में डूबा रहा।

उसके बाद मैं एक दिन अपने बेटे को जींस दिलाने के लिए दिल्ली के मोहन सिंह प्लेस ले गया। वहां बहुत से टेलर ग्राहक की पसंद का जींस का कपड़ा बेचते हैं और सिलाई करके भी दे देते हैं। लेकिन बेटे ने कहा कि मुझे ब्रांडेड जींस ही चाहिए। क्या करते, वही लेना पड़ा। आज तो ब्रांड ही बिकता है। बल्कि गरीब वर्ग भी उस नाम से बिकने वाली नकली चीजें खरीद कर खुश होता है। लेकिन अब ब्रांडों की भी अनेक ‘ऊंची’ और ‘कमतर’ पहचान हैं और आपने तोहफे में किसी को किस ब्रांड की चीज खरीद कर दी है, उससे आपका उसके प्रति प्रेम नापा जाता है।

अब घरेलू स्तर पर बनी चीजों का बाजार हस्तशिल्प या थोड़ा-बहुत सरकारी समर्थन से चलने वाले स्वयंसेवी समूहों की कुछ छोटी-मोटी चीजों तक है। इस छोटे-मोटे बाजार को कब अपने करतब से बड़े उद्योगपति समाप्त कर देंगे, कहा नहीं जा सकता।

कुछ महीने पहले बिग बाजार जाना हुआ तो नजर तकियों पर पड़ गई। उनमें ऐसे तकिए भी थे, जो एक देश के बड़े उद्योग घराने ने बनाए थे। पहली बार पता चला कि तेल के कुएं खोदने, रिफाइनरी चलाने, कपड़े के कारखाने चलाने से लेकर वे तकिए तक बनाते हैं। आज फल, सब्जियां, फूल, आटा, नमक, खिलौने, चाय, कपड़े, किताबें, फिल्में, संगीत, घड़ियां, सिले-सिलाए कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान, जेनरेटर, कार, ट्रक, तिपहिया, दुपहिया, दवाइयां, फैशन सामग्री, शराब, मोबाइल, मकान बनाने-बेचने-किराए पर देने तक का धंधा भी बड़े उद्योगपतियों के पास है।

वे पेट्रोलियम पदार्थों के उत्पादन, वितरण से लेकर टीवी चैनल, पोर्टल और स्कूल चलाने तक न जाने क्या-क्या काम करते हैं। जहां मुनाफा है, वहां वे हैं। उन्होंने कमजोर तबके के लोगों को छोटे-मोटे मुनाफे की दुनिया से धकेल दिया है। इस प्रक्रिया में सरकार का भी पूरा सहयोग है। कुछ काम बड़े उद्योग घराने सामने आकर नहीं, पीछे रह कर करते हैं। एक अखबार में मैं काम कर चुका हूं जिसका औपचारिक रूप से स्वामित्व किसी और के पास था, मगर पीछे एक बहुत बड़ी कंपनी थी, जिसका पता मुझे तब चल पाया, जब मैं वह काम छोड़ चुका था।

विष्णु नागर

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