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भाव की धारा

मनुष्य मानव मन से संचालित होने वाला ऐसा पुतला है जो उसके हिलाने से जीवनभर हिलता-डुलता रहता है।

‘नेकी कर दरिया में डालने’ का मुहावरा जिंदगी का आईना हो सकता है। बस इसे किसी से कह देने भर से कुछ नहीं समझ में आ पाता है और न ही सुन लेने से! वैसे ही जैसे ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई’। खुद को ठोकर लगने पर ही दर्द होता है। लोग कहते रहते हैं कि मैंने फलां के लिए क्या-क्या नहीं किया, लेकिन क्या सिला मिला! दरअसल, हम जो कुछ इस दुनिया में करते हैं, वह सब हमें यहीं इसी जन्म में भुगतना पड़ता है। पूर्वजन्म के कर्म कहने वाले आज मनोविज्ञान के अनुसार पुरातनपंथी ही कहे जाएंगे। विद्वान, दार्शनिक और वैज्ञानिकों द्वारा सच ही कहा हैं- ‘इस जीवन में जो भी मिलता हैं वह इसी जीवन में करने का परिणाम भर है।’ कहावतें व मुहावरे जीवन रहस्य को खोलते हैं या फिर ओशो की देशनाएं पढ़-सुन लिा जाए, जो जीवन की अधुनातन व्याख्याएं करती हुई लगेंगी।

मनुष्य मानव मन से संचालित होने वाला ऐसा पुतला है जो उसके हिलाने से जीवनभर हिलता-डुलता रहता है। भावना और मन का ऐसा खेल है जो जीवन में बड़े-बड़े खेल को अंजाम देता है और हमें खबर भी नहीं लग पाती है। भौतिकवादी दौर में जब सब कुछ पूंजी से ही संचालित हो रहा है, फिर भी मनुष्य आखिर मन का दास है। मन भावना से अछूता नहीं रहता है, पर मन और भावना में जीवनभर जबरदस्त द्वंद्व मचा रहता है। मध्यवर्गीय मन भागता-दौड़ता ही एक दिन दुनिया से कूच कर जाता है।

आखिर इस जीवन का रहस्य क्या है? उच्च शिक्षा हासिल कर लेने पर भी समझ नहीं आ पाता है। बड़ा व्यापार करने या बड़ी नौकरी के बावजूद एक व्यक्ति रिश्वत लेने से नहीं चूकता है और व्यापारी मिलावट के बिना फायदा नहीं देख पाता है। खासकर इस दौर में जब हर कोई पैसे के पीछे दीवाना है, वह भावना को कहां तवज्जो देता है। जबकि सारा खेल टिका ही भावना पर है। जहां तक ‘नेकी कर दरिया में डाल’ का सवाल है, तो किसी के साथ अच्छाई करते हुए भी किसी तरह की अपेक्षा नहीं करना चाहिए। रिश्ता या दोस्ती भाव के बल पर ही चलती है, जब तक आपस में मेलजोल है, भाईचारा है, यह सब अच्छी भावना पर ही निर्भर करते हैं। ये अच्छे भाव स्थायी नहीं रहा करते है। भाव बदलते ही अच्छे दोस्त दुश्मन में बदलते देर नहीं लगती है। ऐसा कब और क्यों होता है? इसके हजारों कारण हो सकते हैं, पर सबके मूल में ठहरता है- भाव या भावना, जो बदलते हुए विपरीत मोेड़ ले चुकी होती है। किसी के प्रति भाव एकाएक नहीं बदला करते हैं।

जिसे हम कल तक टूटकर चाहते रहे होते हैं, उसी से एक दिन बेहद नफरत कैसे करने लगते हैं? जिससे प्रेम करते हुए प्रेम विवाह कर लेते हैं, उसी से छुटकारा पाने के लिए तलाक के कागज पर हस्ताक्षर करते देर क्यों नहीं लगती है? इसलिए कि जो भाव शुरुआत में थे, वे बदलने लगते हैं, पूर्व धारणाएं टूटने लगती हैं। बदलते भावों के पीछे बेशक अपेक्षाएं ठहरती है। अपेक्षा ही वह तत्त्व है, जिसके बल पर सदियों से बाप, बेटे से बुढ़ापे की लाठी बनने की अपेक्षा रखता रहा है। यह भाव इक्कीसवीं सदी में खत्म से हो चले हंै। तभी संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ले रहे हंै और वृद्ध पितामह वृद्धाश्रम में पनाह पा रहे हैं।

खून के रिश्ते भी अब पानी में बदलने लगे हैं, क्योंकि वह भाव जो सदियों से चला आ रहा था, एकाएक भौतिकवाद ने खत्म कर दिया है। अब रिश्ते दादा-दादी, नाना-नानी से नहीं हैं, पति-पत्नी और बेटे-बेटियों तक सीमित होकर रह गए है। मां-बाप, पति-पत्नी होकर बच्चों को पाल सकते हैं, लेकिन वही बच्चे उन्हीं मां-बाप को आश्रम का रास्ता दिखा रहे हैं। भाव जो समय और उम्र के साथ रंग बदलता नजर आता है, वही दूर के रिश्तों में पलक झपकते ही बदलता हुआ लगता है।

आप जिसे आज दोस्त कहते हैं, जरूरी नहीं है कि यह दोस्ती ताजिंदगी चले। मैं जिसके साथ कुछ साल पहले निस्वार्थ कई तरह से सहायता करता रहा, उसने भी कुछ साल संबंधों में गर्मी का अहसास दिलाया कि वह भरपूर सम्मान करता है। पर कुछ साल और गुजरने पर वह बदलने लगा और एक दिन अचानक दुश्मन की तरह हमला करता बैठा। तब मैं महीनों सदमें में रहा और सोचता रहा। सोचने पर पाया कि इस घटनाक्रम के पीछे वे मानवीय भाव रहे, जिसे हम दोनों ने नजरअंदाज किया।

भाव की धारा जैसी शुरुआत में बह रही होती है वैसी ही अंत तक बहती रहे, यह जरूरी नहीं है, क्योंकि नदी की धारा भी बरसात में बहती है और गर्मी में सूख जाती है। मनुष्य को भावना का पुतला यों ही नहीं कहा गया है। वह मन और भाव से संचालित होता है। वे बिरले ही होते हैं जो मन को नियंत्रण में और भाव को समरस बनाए रख पाते हैं।

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