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बदलाव की बुनियाद

परीक्षा में नकल रोकना एक सराहनीय पहल है। इसे और व्यापक होना चाहिए। लेकिन कुछ बुनियादी बातों पर भी ध्यान देना होगा।

Author April 6, 2017 5:50 AM
प्रतीकात्मक चित्र

बचपन में इम्तिहान से डरते बच्चों के बारे में सुनता था तो आश्चर्य होता था। बड़ा हुआ और दसवीं की परीक्षा में देखा कि परीक्षा केंद्रों पर पुलिस बल और प्रशासनिक सुरक्षा के ऐसे इंतजाम थे, मानो किसी बड़े आयोजन में हम शामिल होने आए हैं। परीक्षा केंद्र के मुख्य द्वार पर, परीक्षा भवन में और परीक्षा के बीच रह-रह कर विद्यार्थियों की जांच ने मुझे आभास कराया कि जीवन का पहला इम्तिहान है, लिहाजा अभी से जिंदगी की परीक्षाओं का अंदाजा करवा दिया जाता है। लगभग सभी विद्यार्थियों के साथ उनके अभिभावकों की मौजूदगी यह अहसास दिलाता है कि घबराओ नहीं, परिवार का साथ तुम्हें मिलता रहेगा। जिन विद्यार्थियों के साथ कोई नहीं आता, लोगों की संवेदना उनके साथ होती।

दसवीं के बाद फिर बारहवीं की परीक्षा में भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। हालांकि कॉलेज तक यह भी जान गया था कि परीक्षा क्या होती है और इसका डर कैसा होता है! यह सब उस दौर की बात है जब हम इतने तकनीकी से लैस नहीं हुए थे। चोरी के साधन मात्र चिट-पुर्जे ही थे, जब नकलची छात्र एक छोटी-सी पर्ची में पूरा मुगल काल लिख लेता था। विज्ञान और गणित के सूत्रों को कहानी और मुहावरे में ही हल कर लिया करते थे। समय और परिस्थितियां बदलीं और नकल के तरीके भी। कुछ समय पहले बिहार के कुछ जिलों में परीक्षा केंद्र के दीवारों पर लटकते नकल करवाने वाले लोगों की तस्वीरें खूब प्रचारित हुई थीं।

फिर ‘टॉपर घोटाला’ और ‘बीएसएसई घोटाले’ भी सामने आए। लगातार ऐसी खबरों को लेकर सरकार चिंतित तो लग रही है, लेकिन इसके लिए उठाए जाने वाले कदम अब तक संदेहास्पद हैं। हाल के दिनों में कदाचारमुक्त परीक्षा के संचालन को लेकर सरकार द्वारा कई तरह के निर्देश जारी किए गए, जिनमें मीडियाकर्मी का परीक्षा केंद्र के अंदर प्रवेश वर्जित और परीक्षा देने आने वाले विद्यार्थियों की सघन जांच शामिल था। परीक्षा केंद्र में प्रवेश के पहले कपड़े उतार कर या जूते खोल कर विद्यार्थियों की जांच करने से उनकी भावनाओं पर क्या असर पड़ा होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। एक बच्चा, जो ऐसी पहली परीक्षा में शामिल हो रहा हो, उसके साथ ऐसी हरकत उन्हें भय और अवसाद ही देगी, उन्हें इम्तिहान के असल उद्देश्य की ओर कभी प्रेरित नहीं करेगी।

इसी तरह मीडिया का प्रवेश रोकना केवल अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए किया गया। सरकार द्वारा स्कूलों और कॉलेजों में चलाई जा रही शिक्षा और परीक्षा के संदर्भ में पूरे देश में एक जैसी ही व्यवस्था है। कहीं थोड़ा बेहतर है तो कहीं कुछ कम। असल में देश के अंदर सरकार के समांतर पूंजी चल रही है। इसे धीरे-धीरे सरकार ने मान लिया है और उसे फैलाने में मदद भी कर रही है। नतीजतन, सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के समांतर निजी शिक्षण संस्थान चल पड़े। यही हाल चिकित्सा, दूरसंचार आदि क्षेत्रों में भी है। लगातार वित्तीय पूंजी का संकट बता कर सरकारी उपक्रमों को हाशिये पर धकेला जा रहा है और उद्योग घरानों का पोषण किया जा रहा है। सरकारी उपक्रम को बंद कर राजनीतिक फायदे के लिए अनुदान देने की पद्धति ने जोर पकड़ लिया है।

सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को यह आभास करवाया जा रहा है कि तुम सरकार की दी हुई सुविधाओं पर पलने वाले हो, तुम्हें ऐसी ही जांच प्रक्रियाओं से जूझना पड़ेगा। परीक्षा में नकल रोकना एक सराहनीय पहल है। इसे और व्यापक होना चाहिए। लेकिन कुछ बुनियादी बातों पर भी ध्यान देना होगा। हमारे देश में आज भी शिक्षा पर छह प्रतिशत के आसपास ही खर्च किए जा रहे हैं, जो अन्य देशों से बहुत कम है। नतीजतन, आजादी के सात दशक बाद भी स्कूलों में बैठने के लिए बेंच नहीं है, पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। हाई स्कूलों में विज्ञान के प्रयोशालाओं को धीरे-धीरे ध्वस्त कर दिया गया। विद्यार्थियों द्वारा विज्ञान की प्रायोगिक परीक्षाओं की खानापूरी भर करवा ली जाती है।

सुहाने सपने तो दिखाए जा रहे हैं, लेकिन हाई स्कूलों और कॉलेजों में कंप्यूटर की शिक्षा की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। जो शिक्षक बहाल किए गए हैं, उन्हें समय पर वेतन नहीं दिया जाता है। ऐसे माहौल में जो बच्चे पढ़ रहे हैं, उनसे उम्मीद करें कि वे परीक्षा के महत्त्व को समझें तो यह हास्यास्पद ही है। स्वच्छ और कदाचारमुक्त परीक्षा के लिए यह जरूरी है कि पहले हम स्कूलों और कॉलेजों में शैक्षणिक माहौल दें। हम बेहतर शिक्षक और संसाधन उपलब्ध करवाएं। डंडे के बल पर नकल रोकने का प्रयास बच्चों पर उल्टा असर डालता है। ऐसे ही विद्यार्थी जब बड़े होते हैं तो वे शिक्षकों से लेकर शासन और समाज के प्रति नफरत पालते हैं। ऐसे में एक सभ्य कहे जाने वाला समाज द्वारा असामाजिक तत्त्व का तमगा दे दिया जाता है। केवल नारों और वादों के सहारे दुनिया के बराबर में भारत को नहीं लाया जा सकता। इसके लिए बुनियादी चीजों में बदलाव जरूरी है।

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