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दुनिया मेरे आगे: अदम्य महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ

अंकों की आपाधापी के युग में अंक-आधारित उपलब्धियां मायने रखती हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन अंकतालिकाओं से हम एक बेहतर और कुशल दक्षता संपन्न युवा समाज को दे पा रहे हैं?

स्कूल-कॉलेजों में बच्चों पर बढ़ता दबाव उन्हें मानसिक रूप से दक्ष बनने की बजाए किसी तरह से अच्छा अंक लाने पर ध्यान केंद्रित करने को विवश कर रहा है।

आजकल इस बात पर लोगों के बीच ऊहापोह और भय का माहौल देखा जा रहा है कि उनके बच्चों की नियमित पढ़ाई रुकी हुई और संभवत: साल बेकार चला जाए। बीमारी का भय और असुरक्षा के बीच वह होड़ कुछ थमी दिखती है कि बच्चे को सबसे ज्यादा अंक कैसे आएगा। लेकिन इतना तय है कि जब स्कूल और पढ़ाई नियमित शुरू हो जाएंगे, तब फिर से वही होड़ सब पर हावी हो जाएगा।

अंकों की आपाधापी के युग में अंक-आधारित उपलब्धियां मायने रखती हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन अंकतालिकाओं से हम एक बेहतर और कुशल दक्षता संपन्न युवा समाज को दे पा रहे हैं? हमारी परीक्षा प्रणाली आज भी रटंत विद्या पर आधारित है और जो विद्यार्थी उम्दा स्मरण शक्ति का धनी है, वह इन परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने में सक्षम होता है। साथ ही माता-पिता परीक्षा का ऐसा हौवा घरों मे खड़ा कर देते हैं कि बच्चे पर व्यर्थ का मनोवैज्ञानिक दबाव काम करने लगता है और उसके स्नायु और मनोजगत पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ता है।

हमारे देश में आज भी विद्यार्थी को उसकी क्षमता से नहीं, उसके शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के प्रदर्शन से ही आंका जाता है। यह एक बड़ी विडंबना है। परिणामस्वरूप कमजोर मानसिक मनोबल वाले कई विद्यार्थी आत्महत्या कर लेते हैं और विफल होने पर पढ़ाई छोड़ देते हैं। हालांकि ऐसे विद्यार्थियों के लिए कहने को हर राज्य में और केंद्रीय स्तर पर पत्राचार से पढ़ाने वाले संस्थान हैं, लेकिन उनका कार्यक्रम, लेटलतीफी और संपर्क कक्षाओं की खानापूरी आदि तमाम ऐसी विषमताएं हैं जो कि ऐसे बीच में किन्ही कारणों से पढ़ाई छोड़ने वाले, लेकिन अध्ययन के इच्छुक विद्यार्थियों को पर्याप्त राहत प्रदान नहीं करती हैं।

इसके अलावा, सामाजिक रूप से हमारे नियोक्ता और उच्च शिक्षण संस्थान इन योग्यताधारियों को उस नजरिए से नहीं देखते हैं। माता-पिता का व्यवहार भी कमोबेश अपने नौनिहालों के लिए संवेदनशील कम, लेकिन सामाजिक चलन और हैसियत के चक्कर में स्वार्थी अधिक है। हर मां-बाप बच्चे को इंजीनियर और डॉक्टर बनाने की अंधी दौड़ में भाग रहा है, दूसरे विकल्पों पर ध्यान कम है।

अपने अधूरे स्वप्नों को अभिभावक बच्चों पर थोप रहे हैं। उन्हें एक बेहतर नागरिक और संवेदनशील संतान नहीं, एक मशीनी और डिजाइन की हुई औलाद चाहिए, जो उनकी इच्छाओं के अनुसार फल दे सके और जो समाज में उनको सम्मान दिला सके। संतान के उत्तरदायित्वपूर्ण होने, संवेदनशील इंसान बनाने में उनकी कोई रुचि नहीं है। उनके लिए संतान एक नकदी फसल है, जिससे वे बाजार में मुनाफा कमाना चाहते हैं और अपनी अतृप्त इच्छाओं का संसार पुन: बसाना चाहते हैं।

इंजीनियरिंग शिक्षा के हालात इतने बदतर हैं कि पूरे देश में हजारों ऐसे संस्थान बंद हो चुके हैं या ताला लगने के कगार पर हैं। अधिकतर तकनीकी शिक्षण संस्थान केवल मोटी फीस की कमाई के अड्डे हैं, वहां जरूरी सुविधाओं से लेकर तकनीकी शिक्षा का स्तर अत्यंत निम्न है। कमोबेश यही हाल मेडिकल शिक्षा का भी है। इसमें तो ऊंचा ‘डोनेशन’ और तमाम तरह के शोषण की नई प्रविधियां हैं। विद्यार्थियों को कॅरियर के नाम पर अच्छी पढ़ाई और प्रशिक्षण पूरी कराने के नाम पर रात-दिन घिसा जाता है।

वे बेचारे उफ तक नहीं कर सकते। पिछले दिनों एक अनुभवी चिकित्सक महोदय ने बताया कि एमबीबीएस पास प्रशिक्षु को रक्तचाप नापना तक नहीं आता ढंग से। ऐसे में कॅरियर की अंधी दौड़ हमें कहां ले जाकर छोड़ेगी, यह एक चिंतनीय प्रश्न है। कोचिंग संस्थान सपने बेचते हैं, आकर्षक रैपर और विज्ञापनों में लपेट कर। पहले होर्डिंग और आजकल आॅनलाइन के नाम पर। आप खरीदिए और इस दौड़ में शामिल हो जाइए।

कॅरियर परामर्श नाम की सुविधा महज महानगरों में ही उपलब्ध है। छोटे कस्बों और शहरों में परामर्श की चिड़िया की कूक किसी ने सुनी ही नहीं होगी अभी तक। किशोरों पर इच्छाएं थोप दी जाती हैं और किशोरी है तो पूछने का प्रश्न ही नहीं है। उसे परिवार के बुजुर्गों के निर्णय ही स्वीकार करने हैं चुपचाप। मानविकी के विषय पिछड़ रहे हैं। देश की संस्कृति, सभ्यता और इतिहास का ज्ञान कोरा ही है।

बिना देश को समझे उसे आत्मसात करे मात्र रट कर या परीक्षा पास करके लोग सिविल सर्विस सेवाओं के लिए चयनित हो रहे हैं। लेकिन बाद में वही उच्च पदस्थ नौकरशाह करोड़ों रुपए की घूस लेते पकड़ा जाता है। सवाल शिक्षा प्रणाली पर उठता है। लेकिन क्या ये सवाल हमारे समाज के तथाकथित कॅरियर संबंधी भेड़चाल पर नहीं उठना चाहिए?

क्या जिस तरह का अर्थलोभी और भौतिकता के पीछे भागनेवाला समाज हम गढ़ रहे हैं, उसके लिए युवा अकेला दोषी है या हमारी सरकारों की सोच, समाज के नजरिए पर भी कुछ छींटे आने चाहिए? कॅरियर की इस अंधी दौड़ में हम अपने किशोरों को हाड़-मांस के धन-कमाऊ पुतले या रोबोट में तो तब्दील नहीं कर रहे? इस विषय पर गंभीरता से हमारे समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों और समाज को गंभीरता से सोचना होगा। अन्यथा कॅरियर के इस अंधे कुएं में लोग लगातार कूदते रहेंगे और उनकी चीखों से समाज का स्याह चेहरा कभी चमक नहीं पाएगा।

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