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अकेलेपन का अंधेरा

आत्महत्या को समझने के लिए पुलिसिया जांच की जरूरत नहीं होती, बल्कि सामाजिक तौर पर इसकी जांच होनी चाहिए।

प्रत्यूषा बनर्जी (फाइल फोटो)

मुंबई को मायानगरी कहा जाता है। इस शहर के कई उपनाम इसी पर आधारित हैं। इस शहर में कई बार बड़ी-बड़ी घटनाएं भी चुपचाप गुजर जाती हैं। इनमें से कुछ सुर्खियों में भी आती हैं, लेकिन अब तक उनका कोई सामाजिक हल खोजने की कोशिश शायद नहीं की गई। इसलिए हर घटना का हासिल शून्य बन कर रह जाता है। लोग भूल जाते हैं और आगे निकल जाते हैं। दिव्या भारती, जिया खान से लेकर प्रत्यूषा बनर्जी, एक शृंखला है, जिनकी मौत एक गुम कहानी बन कर रह गई या रह जाएगी। दरअसल, मुंबई में जिंदगी रुकती नहीं है, बल्कि ‘आगे बढ़ते रहो’ की तर्ज पर चलती है। यह शहर जाने कितनी सिसकियों को हर रोज पी जाता है! हालांकि यही वह शहर है जो किसी घिसी-पिटी एक जड़ या ठहरी हुई जिंदगी को आसमान की बुलंदियों पर भी ला देता है।

एकांत और तनहाई का फर्क अगर हम समझते हैं तो फिर यह भी जानना चाहिए कि मुंबई ऊपर से जितनी चकमक दिखती है, उसके भीतर उतना ही अकेलापन है। यहां एकांत नहीं है जो आपको अपने होने का मौज दे, खुशी दे। यहां या तो आप भीड़ में होते हैं या फिर तनहा होते हैं। यह बात फिल्म और टेलीविजन से जुड़े कलाकारों के साथ जितनी लागू होती है, उतनी ही बिजनेस घरानों के साथ भी… और उतनी ही एक आम मुंबईकर की भी, जो भीड़ का हिस्सा होता है, लेकिन उसमें भी वह कहीं न कहीं अकेला होता है।

जब कोई अपना छोटा-सा शहर छोड़ कर मुंबई जाता है तो उसे इस शहर की लहरें वापस भेजने के लिए बार-बार धकेलती हैं। फिर भी अगर आप टिक गए तो फिर ये लहरें आपको तोड़ती हैं और तोड़ कर आपको आपके शहर से अलग कर देती हैं। यह जरूरी इसलिए भी है कि मुंबई और किसी दूसरे छोटे शहर की दूरी को एक साथ नापना आसान काम नहीं है। इक्कीस साल की प्रत्यूषा बनर्जी भी जब पहली बार मुंबई पहुंची थी तो वहां की ‘नाइट लाइफ’ देख कर अचंभित थी। वह नहीं जानती थी कि ‘पब’ क्या होता है और ऐसे कैसे हो सकता है कि तेज म्यूजिक के साथ लोग एक दूसरे को गलबहियां डाले झूमता रहे।

यह शायद उसके शहर की संस्कृति नहीं हो सकती है और अगर कहीं हो भी तो उसके परिवार की तो कतई नहीं। लेकिन सिर्फ एक साल के भीतर प्रत्यूषा ने यह दूरी पाट दी और मुंबई की जानी-मानी हस्ती हो गई। बल्कि यह कहा जाए कि या तो उसने खुद को शहर में या फिर शहर ने खुद को उसमें ढाल लिया। मगर सिर्फ तीन से चार सालों में वह बिला भी गई। जैसे किसी सिनेमा में वह ‘अतिथि भूमिका’ निभाने आई हो वैसे ही वह मुंबई में आई थी। लेकिन उसकी मौत से पीछे छूटे सवालों का जवाब कौन देगा!

प्रत्यूषा की आत्महत्या एक प्रतिनिधि मामला है। लेकिन उसने आत्महत्या क्यों की, इससे जुड़े तमाम सवाल और सफाइयां अलग-अलग पक्षों से आ रही हैं। कानून को अब जो करना होगा, करेगा। लेकिन इस बात से परदा उठना इसलिए भी जरूरी है कि यह मौत सिर्फ एक लड़की की मौत नहीं है, यह एक शहर के सपनों की मौत है। दो शहरों की दूरी पाटने वाले उन तमाम युवाओं की मौत है जो सपने देखने और उसे सच करने निकल पड़ते हैं, लेकिन उनके पीछे रह जाता है तो सिर्फ दबाव और तनाव। अब तक जो तस्वीरें उभर कर सामने आई हैं, उससे यही समझ आ रहा है कि मामला न सिर्फ पेचीदा है, बल्कि झकझोर देने वाला भी है।

टेलीविजन पर दिखते रहने का तनाव, हमेशा खुश दिखने का तनाव और तनाव घर वापस नहीं आने का। समाज में ओहदे के नष्ट होने की फिक्र क्या इस तरह की आत्महत्या का कारण नहीं हो सकता है? युवक-युवतियां मुंबई जैसे शहरों में किस तरह से संघर्ष करते हैं और उनको अपने-अपने घरों से किस किस्म का दबाव झेलते रहना पड़ता है! यह बात दीगर है, इसलिए भी इस मौत का सच बाहर आना चाहिए। आत्महत्या कभी भी किसी एक वजह से होता है तो कई बार इसके लिए बहुत से कारण जमा होते हैं। एक व्यक्ति ‘एक्यूट डिप्रेशन’ में जा चुका होता है। प्रत्यूषा ने फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली। उस फंदे को लगाने से लेकर उसमें झूल जाने तक क्या उसे अपने परिवार के एक भी सदस्य, एक भी मित्र की याद नहीं आई?

आत्महत्या को समझने के लिए पुलिसिया जांच की जरूरत नहीं होती, बल्कि सामाजिक तौर पर इसकी जांच होनी चाहिए। हर उस आदमी को सामने लाया जाना चाहिए, जिसने इस परिस्थिति में किसी व्यक्ति को ला दिया हो। वरना परेशानी तो सबके पास होती है और कभी परिवार का कोई व्यक्ति बहला ले जाता है तो कभी कोई दोस्त। प्रत्यूषा के पास निश्चित तौर पर इन सबकी कमी थी!

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