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दुनिया मेरे आगे: अतीत की अहमियत

हम आज आत्मनिर्भरता पर जोर देते दिखते हैं, लेकिन अपने दौर में गांधीजी हरेक क्षेत्र में व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करते थे। इसलिए वे बुनियादी शिक्षा पर बल देते थे।

जितनी सादगी महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, स्वामी विवेकानंद जैसे राष्ट्रनायकों में थी, वह अब लोगों में विरले देखने को मिलती है।

संगीता कुमारी

बहुत वक्त के बाद आज हमारे आसपास, शासन के काम में और यहां तक राजनीतिक मुद्दे के तौर पर जो मूल्य विकसित होते या फलते-फूलते दिख रहे हैं, वह थोड़ी राहत देता है। खासतौर पर स्वच्छता और आत्मनिर्भरता को लेकर जो राजनीतिक और सामाजिक सजगता आई है, वह गौरतलब है। दरअसल, ये बातें हमारे देश में विकास के मूल्यों में पहले से मौजूद रही हैं, लेकिन कई बार हम दूसरी दिशा में सोचते हुए इनका ध्यान नहीं रख पाते हैं।

मसलन, आत्मनिर्भरता, स्वच्छता, स्वदेशी, जनकल्याण, कौशल विकास, बुनियादी शिक्षा, आत्मविकास, बालकों में मूल्य शिक्षा और नैतिक शिक्षा पर बल देने जैसी अनेक बातों के लिए महात्मा गांधी कभी भुलाए नहीं जा सकते! राष्ट्र निर्माण में उन्होंने जो अमिट छाप छोड़ी है, वह अब देश के साथ हमेशा ही मौजूद रहेगा।

क्या हम गौर कर पा रहे हैं कि आज की मुख्यधारा की राजनीति में ये मूल्य मुद्दों की तरह सक्रिय दिखने लगे हैं? सच यह है कि गांधीजी एक व्यक्ति नहीं, संपूर्णता साथ लिए एक महान व्यक्तित्त्व थे। मुझे नहीं पता था कि उनके अनेक गुणों में से कुछ गुणों को आत्मसात करना मेरे लिए इतना हितकर होगा! इसका अहसास मौजूदा महामारी के दौर में अधिक हुआ।

इस दौरान जहां अनेक गृहिणियां घरेलू सहायिकाओं के बिना गृहकार्य खुद करने से परेशान थीं, वहीं मैं खुशी-खुशी हमेशा की तरह घर के सारे काम खुद कर रही थी। घर के सारे काम खुद करने की आदत हो तो अचानक आई परिस्थिति से परेशानी कैसी! बचपन में पढ़ा था कि गांधी जी अपने स्नान के लिए कुएं से जल खुद निकाला करते थे। अपनी बकरी को चारा अपने हाथों से खिलाते थे।

अपने पहनने के लिए कपड़े भी खुद ही सूत से काता करते थे। तन पर जो भी कपड़े होते थे, वे खुद धोते थे। शौचालय भी खुद ही साफ करते थे। यानी उनके आसपास अनेक सहयोगी होने के बावजूद वे खुद जितना बन पड़े, अधिक से अधिक काम खुद ही करते थे। यही नहीं, इसके बाद वे अध्ययन के लिए भी समय निकाल लेते थे। यह सब कुछ हमारे सामने प्रेरणा की तरह है, मगर हमने उनसे कितना सीखा और कितना उनके नाम का महज जाप किया, यह हमें खुद से पूछना चाहिए।

हम आज आत्मनिर्भरता पर जोर देते दिखते हैं, लेकिन अपने दौर में गांधीजी हरेक क्षेत्र में व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करते थे। इसलिए वे बुनियादी शिक्षा पर बल देते थे। बच्चों में छिपी प्रतिभा को उभार कर उसको पोषित करने की जिम्मेदारी माता-पिता और अध्यापक पर छोड़ते थे। उनका मानना था कि विद्यालय रूपी संस्था को भावी पीढ़ी का निर्माण स्वावलंबी बनाने के लिए किया जाना चाहि, ताकि बच्चे जब शिक्षा पूरी करके निकलें, तब वे आत्मनिर्भर बन कर समाज को मजबूती दें।

शिक्षा पूरी करने के बाद विद्यार्थी किसी न किसी कौशल में निपुण होकर कमाने खाने योग्य बन सके। जड़, जमीन से जुड़ी प्रकृति का ज्ञान ही स्वावलंबी होने की पहचान है। गांधी बच्चों को एक पौधे के समान मानते थे, जिसे जैसा आकार दिया जाएगा, वह वैसा ही वृक्ष बनेगा। वह पौधे की परख करने वाली संस्था को एक मजबूत बुनियादी पकड़ वाली संस्था के रूप में देखना चाहते थे, न कि खोखली संस्था के रूप में। वे न केवल अंग्रेजों से आजादी चाह रहे थे, बल्कि अंग्रेजी दासता से मुक्त होने वाली शिक्षा नीति अपनाना चाहते थे।

वे विवेक के साथ अपनी जड़ों को याद रखने की बात करते थे। जिस देश की जनता जड़ से जुड़ी नहीं होती है यानी जिसे अपने देश पर गर्व नहीं होता है, उसे बरगलाना सरल होता है। उनकी संवेदना इस बात से भी देखी जा सकती है कि देश की गरीबी को देख कर वे इतने आहत हो गए थे कि उन्होंने शपथ ले ली थी कि वे आजीवन एक ही कपड़ा धारण करेंगे।

उनका यह कहना था कि जब तक देश की आखिरी पंक्ति में खड़ी जनता के तन पर पूरा कपड़ा नहीं होगा, मैं वर्ष भर प्रत्येक मौसम में एक ही कपड़ा धारण करूंगा। न जाने कितनी बार भूखे पेट रह कर गरीबों के भूखे पेट की पीड़ा का उन्होंने अनुभव किया। वे जानते थे कि गरीब भूख की पीड़ा के स्रोतों से लड़ेगा और जन आंदोलन की आग को बुझने नहीं देगा। बदलाव के आंदोलन हमेशा अभाव से जूझते हुए वंचित लोग ही करते हैं।

स्वच्छता के लिए उनके आग्रह जगजाहिर रहे हैं। स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ विचारों को धारित कर सकता है। गांधीजी ने शौचालय की सफाई करके दुनिया को यह समझाना चाहते थे कोई भी कार्य छोटा नहीं है। देश का प्रत्येक व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है। लेकिन हमने गांधी के मूल्यों को दरकिनार कर दिया और अपने सहज जीवन के लिए जरूरी हर काम करने वालों को छोटा या कमतर मानने की मानसिकता में जीते रहे।

यह आजादी के मूल्यों के साथ-साथ गांधीजी के विचारों को भी महत्त्व नहीं देने की वजह से हुआ। लेकिन क्या इन छोटी-छोटी बातों पर गौर किए बिना या इन्हें अहमियत दिए बिना हम बेहतर इंसान बनने का दावा कर सकते हैं! आज बेहतर दुनिया के लिए हम जिन मूल्यों की तलाश में हैं, वे मूल्य हमें आज से बहुत पहले गांधी देकर गए हैं। बस हम उन्हें ही संभाल लें..!

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