दुख में सुख

हम सबकी रोज की दौड़-भाग का एकमात्र लक्ष्य उस आदर्श स्थिति को प्राप्त करने का होता है जिसमें हम खुद को सुखी और संतुष्ट स्थिति में ला सकें।

सांकेतिक फोटो।

एकता कानूनगो बक्षी

हम सबकी रोज की दौड़-भाग का एकमात्र लक्ष्य उस आदर्श स्थिति को प्राप्त करने का होता है जिसमें हम खुद को सुखी और संतुष्ट स्थिति में ला सकें। सुख और आनंद की ख्वाहिश पूरा करने की जद्दोजहद छुटपन से ही शुरू हो जाती है, हम जाने अनजाने सुख की तलाश में जुट से जाते हैं। मन लगाकर खूब पढ़ाई करते हैं, कोई हुनर सीखते हैं, शौक पालते हैं, जिससे हमारा जीवन आसान और सुखद हो सके। इस सुख को बनाए रखने के लिए सुरक्षा कवच के रूप में थोड़ा बहुत निवेश भी करने लगते हैं ताकि जीवन में अकस्मात किसी तूफान के आने पर हमारी सुख की इमारत को संभावित क्षति से बचाया जा सके। आकस्मिक तूफान के बारे में हम बात भले ही बहुत कम करते हैं, पर लगातार हम उस जोखिम से घिरे रहते हैं और खतरों से बचने-बचाने के प्रयास और योजनाओं में ही लगे रहते हैं।

समस्या यह है कि हमने जीवन के एक पक्ष को तो खुल कर अपनाया है, पर उसी के पूरक पक्ष से हम बचकर निकल जाना चाहते हैं। उससे खुद को इतना भयभीत कर लिया है कि उससे सामना होने पर सब कुछ उलट-पलट हो जाता है। दुख, परेशानी, असफलता का होना यह साबित करता है कि हम जीवित हैं। हमसे अक्सर यह कहा जाता है कि किनारे पर खड़ा जहाज बहुत सुरक्षित होता है, पर वह तो बना ही है समुद्र की लहरों पर सवार होने के लिए। अगर जहाज यह ठान ले कि वह समुद्र में आगे नहीं बढ़ेगा, किनारे पर ही खड़ा रहेगा तो क्या तब वह अजर-अमर वैसे ही बना रह पाएगा?

किनारे पर पड़ा रहेगा तो उसके पुर्जो पर पहले जंग लगेगा, फिर उसका शरीर धीरे-धीरे गलेगा, फिर बिना कुछ किए वह उसी पानी मे ढह जाएगा। इसी तरह जीवन है तो निश्चित ही संघर्ष रहेंगे, चुनौतियां भी रहेंगी, जुनून रहेगा, घाव रहेंगे, थकान रहेगी, रोमांच रहेगा और मृत्यु भी होगी। शायद हमें दुख को लेकर इतना उदासीन रवैया कभी नहीं रखना चाहिए। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। खुशी से ही नहीं, हम सब दुखों से भी गुजरते है, टूटते हैं, संभलते हैं और मजबूत बनते हैं। अपने दुख से गुजर कर ही दूसरों का दर्द समझने लगते हैं। अन्य का सहारा बनने लगते हैं। दुख हमें मांजता है चमकाता है और कभी-कभी तो पूरी तरह नया भी बना देता है।

ठीक से आकलन करें तो पाएंगे कि हमारे जीवन का बड़ा हिस्सा दुख और संघर्षों में बीतता है। सुख थोड़ा-सा ही होता है, लेकिन उसका आवेग तीव्र और अनुभूति दीर्घकालिक होती है। हिसाब लगाया जाए तो हम अधिक बार दुखी हुए होते हैं। दुख की अवस्था से गुजरने के बाद ही हमें कोई खुशी मिली होती है। सुखी होने का भाव खुश होने से थोड़ा-सा पृथक भाव है। सुखी होना ठहराव का भाव लेकर आता है, जो हमारे मन की स्थिर परिपक्व स्थिति को बयान करता है। सुखी हम तभी हो सकते हैं, जब हमने हर परिस्थिति में संतुलित रहने की कला सीख ली हो।

हमारा मन दुख और खुशी के बीच घूमता रहता है। जब हमने साइकिल चलानी सीखी, तब कई बार गिरे, चोट भी लगी, असफल रहे, दुखी हुए, पर प्रयासरत रहे। ज्यों ही हम खुद आत्मनिर्भरता से चलाने लगे, बहुत खुश हुए थे। बाद में वही साइकिल चलाना हमारी खुशी का आधार नहीं रहा। कुछ समय बाद हमें कार मिल गई तो हम खुश हुए। कुछ साल हम खुश रहे। अब हमें और बड़ी अच्छी कार की जरूरत है। यह सिलसिला अनंत काल तक जारी रह सकता है।

कभी अभाव हमें दुखी कर देता है, कभी विरह। न चाहते हुए भी हमने खुद दुख को अधिक व्यापक बना लिया है। हमें हमेशा दुख-तकलीफ से बचे रहने का पाठ पढ़ाया गया है। दुख का सामना करने, उसके लिए तैयार रहने पर कभी परिवार स्तर पर खुल कर बात नहीं होती। न ही दुख या तकलीफ से गुजर रहे व्यक्ति के साथ किए जाने वाले व्यवहार पर कभी ठीक तरह से विचार किया जाता है। केवल अफसोस जता कर या दुख पर संवेदना व्यक्त कर किसी की परेशानी का हल नहीं किया जा सकता। अगर समाधान की कोई राह निकाली जाए, पीड़ित का आत्मबल बढ़ाने और मनोस्थिति को ठीक करने के लिए कोई सकारात्मक पहल की जाए तो शायद विवेकपूर्ण कहा जाएगा।

प्रकृति और जीवन सब कुछ एक चक्र-सा गतिमान है। धरती अपनी धुरी पर चक्कर लगा रही है, मौसम का अपना चक्र है। जीवन में सुख और दुख भी उसी तरह आ-जा रहे हैं। हम ही कुछ अलग करने के प्रयास में प्राकृतिक चक्र की गति में बाधक बन जाते हैं। तेज रफ्तार से दौड़ लगा कर ऐसे बिंदु पर पहुंच जाना चाहते हैं, जहां पर केवल सुख हो। यह बहुत जरूरी है कि किसी तरह की दौड़ में शामिल हुए बिना या किसी दूरस्थ लक्ष्य को सुख समझ लेने की गलती की जगह आज में अपना सर्वोपरि देते रहें, जिसमें केवल आज का सुख ही शामिल हो। असली सुख तो जीवन के हर पक्ष को हिम्मत और मुस्कुराहट के साथ गले लगाने में ही है।

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