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दुनिया मेरे आगेः बदलाव के ठौर

शहर के उतार-चढ़ाव के बीच भीड़ के बरक्स समाज में पसरे एकाकीपन को देखते-समझते वक्त गुजरता गया। लेकिन वह सहेली जब भी मिलती तो उनका प्रस्ताव वक्त-वक्त पर आता रहा।

Author October 17, 2018 2:36 AM
शहर के उतार-चढ़ाव के बीच भीड़ के बरक्स समाज में पसरे एकाकीपन को देखते-समझते वक्त गुजरता गया। (प्रतीकात्मक चित्र)

वर्षा

छोटे शहर और कस्बे में पली-बढ़ी मैं जब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने आई तो पता ही नहीं चलता था कि एक शहर कहां खत्म होता है और दूसरा कहां से शुरू। बस सड़क किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग पर छपे विज्ञापनों को पढ़ कर ही यह अंदाजा होता था कि अब इस शहर में हैं और अब उस शहर में। सब कुछ आपस में घुला-मिला था। वैसे ही लोग और बहुत हद तक वैसी ही सोच। जो जितना नया था, वह उतना ही अनाड़ी जान पड़ता था। मैं यह सब बहुत वक्त गुजर जाने के बाद समझी, क्योंकि शुरू में तो मैं खुद इन अनाड़ियों में शामिल थी। आमने-सामने या अगल-बगल के घरों में रहने वाले लोगों का पास से गुजरने पर देखना हो जाता था, लेकिन यहां मुस्कुराहटों के जवाब में मुस्कुराहट मिलना भी मुश्किल था। हां, काम पड़ जाए किसी को फिर तो दुआ-सलाम भी हो जाती। लेकिन अगर कोई काम नहीं हो तो जैसे पहचानना भी मुश्किल होता कि कोई जानता भी है किसी को!

आस-पड़ोस वालों के बच्चे भी जो टकराते तो ऐसा लगता जैसे बिना देखे ही गुजर जाते हैं। इस तरह का अनजानापन हैरान करता था और बेगानगी का अहसास देता था। ऐसे में अपने छोटे शहर में रहने के दिन याद आते जब किसी पड़ोसी या परिचित को बिना नमस्ते किए कदम आगे नहीं बढ़ते थे। एक बार नजरें झुकाए अपनी ही धुन में मैं कुछ काम से जा रही थी और यह ध्यान भी नहीं रहा कि कौन पास से गुजरा, कौन नहीं तो अगले दिन पापा से किसी ने शिकायत कर दी थी कि लगता है बिटिया ने नमस्ते करना बंद कर दिया है बड़ों को! यह शिकायत कम थी और एक दूसरे का खयाल रखने की परिपाटी को बनाए रखने के लिए अपनी पहलकदमी ज्यादा।

लेकिन महानगर कहे जाने वाले इस बड़े शहर में तो ऐसा लगता था कि जैसे हम अदृश्य हैं, बस काम पड़ने पर ही दिखाई देते हैं। भरा शहर भी सुनसान लगता, बचपन से ही मम्मी को मुहल्ले की औरतों के साथ गप्पें लगाते देखा था। गरमी के मौसम में इकट्ठा बैठ कर वे सब जवे तोड़तीं और सर्दियों में स्वेटर बुनतीं। खरबूजे के बीज जो हम बच्चे खरबूजों के मौसम में धोकर साफ करके सुखा लेते थे, उन्हें वे सब संग-साथ बैठ कर जाड़े की धूप में चिमटी से छीलती थीं। शहरों की यादों और जिंदगी से गुजरना हो रहा था कि इस बीच एक दिन एक बुटीक पर एक महिला से मुलाकात हुई। वे हमारे ही सेक्टर के दूसरे ब्लॉक में रहती थीं। धीरे-धीरे दोस्ती बढ़ी और उन्होंने मुझे अपने यहां की किटी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। मैंने मना करने में एक मिनट भी नहीं लगाया। हालांकि उन्होंने समझाने की कोशिश की, लेकिन मैं तैयार नहीं हुई। दरअसल, उसमें शामिल होने के लिए मना करने के पीछे मेरी वह धारणा थी जो सुनी-सुनाई बातों पर बनी थी। मुझे यही पता था कि किटी पार्टी में हिस्सा लेना बिल्कुल निठल्ले लोगों का काम है, वहां दूसरों में कमियां निकालने या बुराइयां करने के सिवा कुछ और नहीं होता। इसके अलावा और भी कई बातें थीं, जो मैंने दूसरों से सुन रखी थीं। मैंने ऐसे फालतू माने जाने वाले जमावड़े से दूर रहने का निर्णय अपनी भलाई के लिए ही लिया था, इसलिए उस पर डटे रहना मुझे अपना कर्तव्य जान पड़ता था।

शहर के उतार-चढ़ाव के बीच भीड़ के बरक्स समाज में पसरे एकाकीपन को देखते-समझते वक्त गुजरता गया। लेकिन वह सहेली जब भी मिलती तो उनका प्रस्ताव वक्त-वक्त पर आता रहा। कई साल बाद उसके ज्यादा जोर देने पर मैं इस शर्त पर मान गई कि जब मेरा मन करेगा किटी में जाऊंगी और जब नहीं करेगा तब नहीं जाऊंगी। लेकिन पैसे भिजवा दूंगी। यानी इस तरह अब तक मना करते हुए भी किटी की दुनिया में मेरा प्रवेश हो गया। मुझे मिला कर उस समूह में चौदह सदस्य थे। एक को छोड़ कर मेरे लिए सब नए थे, पर धीरे-धीरे सबसे मित्रता हो गई। तब जाकर लगा जैसे इस शहर से पहचान हो रही है। मेरी आशंकाओं के बरक्स उस समूह में सभी महिलाएं भली थीं और उन सबसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। एक तरह से मेरी जिंदगी की पाठशाला का नया अध्याय शुरू हुआ था।

समझ में आ गया था शहरों के बदलते स्वरूप और समाज में किटी दरअसल एक-दूसरे से पहचान बढ़ाने का जरिया है। यहां थोड़ी मौज-मस्ती और गप्प है तो मेलजोल के मौके भी। यहां कस्बों की तरह गली-मोहल्ले या आंगन में जवे तोड़ने और सर्दियों की धूप में स्वेटर बुनने और खरबूजे के बीज निकालने के बहाने बातचीत के आयोजन नहीं होते, लेकिन उसी के समांतर इसकी रिवायतें अलग हैं। आप जहां होते हैं, वहां अगर कुछ अच्छा नहीं है तो उसमें अपने मुताबिक बदलाव ला सकते हैं। लेकिन जगह और वक्त के साथ सबके लिए थोड़ा खुद को भी बदलना जरूरी है।

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