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दुनिया मेरे आगे: बुजुर्गों की जगह

घुटनों में दर्द से परेशान व्यक्ति से डॉक्टर ने उसकी उम्र पूछी थी। व्यक्ति ने अपनी उम्र बताई। डॉक्टर ने कहा, इस उम्र में ऐसा होता है। व्यक्ति ने झल्लाते हुए कहा था- ‘आप डॉक्टर हैं, कोई इलाज बताएं।

कमल कुमार

घुटनों में दर्द से परेशान व्यक्ति से डॉक्टर ने उसकी उम्र पूछी थी। व्यक्ति ने अपनी उम्र बताई। डॉक्टर ने कहा, इस उम्र में ऐसा होता है। व्यक्ति ने झल्लाते हुए कहा था- ‘आप डॉक्टर हैं, कोई इलाज बताएं। उम्र बताने से क्या होगा?’ एक अन्य बुजुर्ग ने पोते को कहा- ‘सारा दिन मोबाइल में मुंह छिपाए बैठे रहते हो, जाओ कुछ देर बाहर खेल कर आओ, शाम का वक्त है।’ बच्चे ने मुंह बिचकाया- ‘आप बूढ़े हो गए हैं दादू… आपको कुछ नहीं पता।’ इसी तरह, एक परिवार में बेटे-बहू के हर दिन के झगड़े से घर का माहौल खराब होने पर पिता ने सुझाया- ‘आप लोग आपस में बातचीत करके अपने मतभेद सुलझा लो। रोज-रोज के झगड़े से रिश्तों में कड़वाहट आती है।’ बेटे ने तल्खी से कहा- ‘आप अपना काम करें। अब आपका समय नहीं रहा। मैं जल्दी ही इससे तलाक लेने वाला हूं।’
खेल परिसर में बने जिम में कुछ बुजुर्ग भी गर्दन, घुटनों और कमर के व्यायाम के लिए आते हैं। जिम में अक्सर तेज आवाज में पंजाबी पॉप संगीत बजता है।

बुजुर्ग ने आवाज कुछ कम करने के लिए कहा था। युवा ने हिकारत के साथ देखा- ‘आपकी उम्र में यह सब अच्छा नहीं लगता।’ बुजुर्ग एक विदेशी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे थे। उन्होंने अगले दिन जिम के दरवाजे के बाहर एक नोटिस लगाया कि आवाज का ‘वॉल्यूम’ क्या होता है। बहुत अधिक तेज आवाज का कानों, मस्तिष्क की नसों और दिल की धड़कन पर क्या दुष्प्रभाव होता है। साथ ही उन्होंने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट भी दी थी कि अमेरिका में दस वर्ष की उम्र तक बच्चों की आंखों पर चश्मा लग जाता है, टीवी देखने से और मोबाइल पर लगे रहने से। पंद्रह वर्ष की आयु तक आते-आते उनकी सुनने की शक्ति कम हो जाती है। इस नोटिस को कुछ ने पढ़ा, कुछ ने नहीं। पढ़ने वालों पर भी उसका कोई असर नहीं था।

घर हो या बाहर, बड़ा या छोटा, अपना या पराया- ज्यादातर लोग बुजुर्गों के प्रति ऐसा ही रवैया रखते हैं। उनके विवेक, विद्वता और अनुभवों को नकारते हैं। आज जीने और मरने के बीच बुजुर्ग पीढ़ी की जिंदगी परत-दर-परत कई विरोधों, विडंबनाओं और रिश्तों की अपेक्षा और कटुता के बीच बेहाल है। भारतीय समाज की सबसे सुदृढ़ इकाई परिवार रही है। परिवारों में पहला विस्थापन 1950-60 के बीच हुआ था, जब युवा पीढ़ी गांवों से शहर में आ गई थी। दूसरा 1980 के आसपास हुआ, जब मध्यवर्ग की युवा पीढ़ी शिक्षा या नौकरी के लिए विदेशों में गई और वहीं बस गई। जो युवा पीढ़ी बाहर नहीं गई, पढ़-लिख कर यहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने लगी।

लड़कियां भी शिक्षित-प्रशिक्षित होकर चुनौतीपूर्ण व्यवसायों में कार्यरत हैं। यहां काम के घंटे लंबे हैं। यह पीढ़ी या तो बच्चा नहीं चाहती या होता भी है तो बहुत देर बाद। फिर वह बच्चा घर में अधिक समय तक अकेला ही होता है। उसे रिश्तों की जो गरमाहट, बंधन और जीने की पूर्णता मिलनी थी, वह नहीं मिलती। जिस घर में बुजुर्ग हैं, वहां वे उन बच्चों की देखभाल करते हैं। बच्चों के लिए यह सुखकर है। लेकिन रिश्तों में आई निष्क्रियता के कारण बुजुर्गों को कोई नहीं अपनाता। दिन-रात सोशल मीडिया में लगे सबसे कटे बच्चे भी आज अवसाद के शिकार हैं। दूसरी तरफ बुजुर्ग उम्र की गालियां खाते हुए अकेले, उदास और अवसाद में जी रहे हैं। एक शहर में होने पर भी बुजुर्ग अकेले और बेटे अपने परिवार के साथ अलग घरों में रहते हैं।

जीया गया जीवन हमें अनुभवों से संपन्न करता है। जीवन की रफ्तार बदलती है, लेकिन जीवन की धुरी वही रहती है। दक्षिणी दिल्ली की एक आवासीय कॉलोनी में कुछ महिलाओं ने इस बात को महसूस किया। देखा कि हमारे घरों में बुजुर्ग पीढ़ी के पास विवेक, बुद्धि और अनुभवों का भंडार है। कोई इनमें डॉक्टर है, कोई शिक्षाविद् है, कोई कंप्यूटर या टेक्नोलॉजी में विशेषज्ञ रहा है। कोई बुजुर्ग औरत, घरेलू उपचार, होमियोपैथी, रसोई के रखरखाव और खाद्य संरक्षण में कुशल है। इन महिलाओं ने शाम को पार्क में बुजुर्गों, बच्चों, युवाओं को आमंत्रित किया। बच्चों और युवाओं से कहा कि आप इनसे सवाल पूछें, कोई भी।

बुजुर्ग अपनी विषेशज्ञता के अनुसार उसका जवाब देते। डॉक्टर महिलाओं और बच्चों को अच्छे स्वास्थ्य के लिए सुझाव देते। बुजुर्ग औरतें रसोई में कई पुराने व्यंजनों की, आचार, मुरब्बे, चटनी बनाने और उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने की जानकारी देतीं। धीरे-धीरे इस कॉलोनी में एक बड़ा कुनबा बन गया, जिसमें बच्चे, युवा, बुजुर्ग स्त्रियां पुरुष सभी आते और जुड़ते गए। सबका अब एक दूसरे के घर आना-जाना होता है।

इसका प्रभाव बुजुर्गों और नई पीढ़ी दोनों पर सुखकर हुआ। यह लगा कि उम्र के अनुभव बहुत कुछ समझने और समझाने के लिए होते हैं। जो एक ओर घर में रिश्तों में गरमाहट लाता है, वहीं पीढ़ियों के बीच आ रहे बिखराव को समेटने में भी मदद करता है। कॉलोनी में हुई इस पहल को एक बड़े स्तर यानी सामाजिक, संस्थागत और सरकारी स्तर पर भी लिया जाना चाहिए। बुजुर्गों में छिपे ज्ञान, विवेक, विविध विषयों की जानकारी और उनके अनुभवों के खजाने को घरों से समाज में वितरित किया जा सके। इसका बहुआयामी सुखद प्रभाव होगा, घरों और समाज में।

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