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दुनिया मेरे आगे: रोशनी का दायरा

एक दौर था, जब दीपावली आते ही स्थानीय हाट और बाजार मिट्टी के दीये और संबंधित अन्य आवश्यक सामग्रियों से पट जाते थे। मिट्टी के दीयों के जलने से न सिर्फ गौरवशाली संस्कृति का आभास होता था, बल्कि बरसात के बाद पनपने वाले कीड़े-मकोड़े का खात्मा भी हो जाता था। लेकिन समय बीतने के साथ इसमें भी बड़ा परिवर्तन आया है।

मनाएं सुरक्षित दीपावली।

सुधीर कुमार

पर्व-त्योहारों का समय-समय पर दस्तक देना भारतीय समाज की प्रमुख विशेषता रही है। इनमें निहित संदेशों से इसकी महत्ता स्पष्ट होती है। दरअसल, पर्व-त्योहार न सिर्फ व्यक्ति के जीवन में व्याप्त नीरसता को खत्म करने का अवसर प्रदान करते हैं, बल्कि परिवारजनों को एक साथ जोड़ कर सदस्यों के बीच निहित प्रेम को प्रगाढ़ करने में भी महती भूमिका निभाते हैं।

यही वजह है कि शैक्षिक, आर्थिक और अन्य कारणों से देश के बाहर या देश के विभिन्न भागों में अपने पैतृक स्थान से प्रवास किया व्यक्ति पर्व-त्योहार के अवसर पर घर लौटने को व्याकुल नजर आता है। सामाजिक समरसता और भाईचारे को बरकरार रखने में पर्व-त्योहारों की विशेष महत्ता रही है। हालांकि बदलते समय के साथ पर्व-त्योहारों को मनाने के तरीकों में भी बड़ा बदलाव देखा गया है।

बतौर उदाहरण प्रकाश-पर्व दीपावली को देखें, तो इसमें निहित शुचिता, स्वच्छता और मितव्ययिता की बातें दिनोंदिन गायब होती गई हैं। आज यह बस पटाखों, आतिशबाजी, प्रदूषण और फिजूलखर्ची तक ही सीमित रह गई है। दीपावली से पहले हम अपने घर और आसपास की साफ-सफाई तो करते हैं, लेकिन दूसरे ही दिन पटाखों के फटे अंश हमारी मेहनत का सत्यानाश कर देते हैं।

कानफाड़ू पटाखों से एक तरफ पूरा वायुमंडल धुंध से ढंक जाता है, तो दूसरी तरफ उसकी गूंज और होने वाले प्रदूषण से बच्चे, बीमार और बुजुर्गों को सांस लेने में तकलीफ होने लगती हैं। इसके साथ ही, पटाखा उद्योगों या दुकानों में अनहोनी की वजह से लगने वाली आग से जान-माल का नुकसान भी होता है।

लेकिन वक्त के साथ बदलती जरूरतों के बीच आज दीपावली बस नाममात्र की रह गई है। व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में व्याप्त तनाव, दबाव और समय का अभाव इसकी वजहें हो सकती हैं। दूसरी तरफ, चंद वर्ष पहले तक दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीद कर घर रोशन करने का लोगों में जबर्दस्त चलन था।

उपभोक्ताओं के इस प्रयास से लाखों कुम्हार परिवारों की रोजी-रोटी का बंदोबस्त हो जाता था। लेकिन आज इतनी जहमत कौन उठाना चाहता है! आज लोग दीये और मोमबत्ती की जगह बिजली के उपकरणों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दे रहे हैं। दीया निर्माण के व्यवसाय में लगे हजारों लोगों के पेट पर यह सीधा हमला ही तो है।

एक दौर था, जब दीपावली आते ही स्थानीय हाट और बाजार मिट्टी के दीये और संबंधित अन्य आवश्यक सामग्रियों से पट जाते थे। मिट्टी के दीयों के जलने से न सिर्फ गौरवशाली संस्कृति का आभास होता था, बल्कि बरसात के बाद पनपने वाले कीड़े-मकोड़े का खात्मा भी हो जाता था। लेकिन समय बीतने के साथ इसमें भी बड़ा परिवर्तन आया है।

वैश्वीकरण की नीति को अपनाने के बाद भारतीय बाजारों में चीनी उत्पादों की भरमार हो गई है। बेशक ये उत्पाद अपेक्षाकृत सस्ते, आकर्षक और टिकाऊ हैं, लेकिन ‘स्वदेशी अपनाओ’ का नारा बुलंद करने वाले भारतीय बाजारों में इसकी दखल से हमारे समाज में लोगों के रोजगार पर खतरा मंडरा रहा है।

पारंपरिक रूप से मिट्टी के एक वर्ग सदियों से मिट्टी के बर्तन, खिलौने और अलग-अलग तरह की कलाकृतियां तथा उपयोगी वस्तुओं को बना कर अपनी आजीविका का निर्वहन करता आया है। बेकार पड़ी मृदा को अपनी कला से जीवंत रूप प्रदान करने वाले मूर्तिकारों और कुम्हारों का यह वर्ग उपेक्षित है। यह उपेक्षा न सिर्फ सरकारी स्तर से है, बल्कि तथाकथित आधुनिकता को किसी भी कीमत पर अपनाने वाले नागरिकों की ओर से भी है। हमारे छोटे-से प्रयास से हजारों लोगों के रोजी-रोटी का इंतजाम करने में मदद मिल सकती है।

इसे विडंबना ही कहेंगे कि धनतेरस पर जब देश में आर्थिक रूप से संपन्न लोग महंगी वस्तुएं खरीदने में व्यस्त रहते हैं, तब हमारे समाज का एक तबका दो जून की रोटी के लिए भटकता नजर आता है। दीपावली पर जब संपन्न परिवारों के बच्चे नए कपड़े पहन कर आतिशबाजी करते हैं, तब निम्न आय वर्ग के बच्चे फटे-पुराने कपड़ों में किसी कारणवश न फूटने वाले पटाखों को चुनते नजर आते हैं।

आज पर्व-त्योहार केवल अमीरों के लिए ही रह गए हैं। आर्थिक विपन्नता और महंगाई की वजह से गरीब लोगों का इन त्योहारों के प्रति रुझान कम हुआ है। आज देश में आर्थिक विषमता की खाई इतनी गहरी हो गई है कि अमीर दिनोंदिन अमीर और गरीब उसी अनुपात में गरीबी की दलदल में फंसते जा रहे हैं।

बहरहाल, दीपावली दीपों और हर्षोल्लास का पर्व है। अंधकार पर प्रकाश के विजय का प्रतीक यह पर्व खास संदेश भी देता है। जब व्यक्ति के जीवन में निराशा का अंधकार छा जाता है, तब आशाओं का एक दीपक अंधकार को चीरता हुआ प्रकट होता है। जब रातें अपनी काली परछार्इं से पृथ्वी को ढक लेती हैं, तब तड़के उसे भगाने के लिए सूरज का प्रकाश चला आता है।

मोमबत्ती या दीये का प्रकाश उस उम्मीद का प्रतिनिधित्व करता है जो सारी रात बिना रुके दरिद्र के प्रतीक अंधकार को आसपास फटकने नहीं देती। मुश्किलों और दुश्वारियों पर रोने के बजाय उनका हल ढूंढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। इसी से इस पर्व की सार्थकता बनी रहेगी।

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