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दुनिया मेरे आगे: स्वार्थ का समाज

इसमें कोई दो राय नहीं कि समय के साथ सामाजिक व्यवस्था और परंपराएं भी बदली हैं। ऐसे में लोगों की मानसिकता में भी अगर बदलाव आए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। यों जब-जब बदलाव होता है, तब लोगों की उम्मीद यह रहती है कि यह अच्छे के लिए हो, बुरे के लिए नहीं। यह अलग बात है कि आमतौर पर होता इसका उल्टा है।

परंपरा पर मनुष्य के मस्तिष्क और स्वभाव का प्रभाव पड़ता है।

चंदन कुमार चौधरी
लोगों को अक्सर कहते सुनते हैं कि दुनिया बदल रही है। आमतौर पर जब लोग ऐसा कहते हैं तो वे खुली आंखों से देखे जाने वाले परिवर्तन की बात करते हैं। उसमें विकास और विनाश की बातें शामिल होती हैं। ऐसे परिवर्तन आंखों से देख कर और कानों से सुन कर पता चल जाते हैं। हालांकि कुछ बदलाव ऐसे होते हैं जिनका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। हम उसे देख नहीं सकते।

इसमें कोई दो राय नहीं कि समय के साथ सामाजिक व्यवस्था और परंपराएं भी बदली हैं। ऐसे में लोगों की मानसिकता में भी अगर बदलाव आए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। यों जब-जब बदलाव होता है, तब लोगों की उम्मीद यह रहती है कि यह अच्छे के लिए हो, बुरे के लिए नहीं। यह अलग बात है कि आमतौर पर होता इसका उल्टा है। लोगों के सामने खुद और दूसरों के कई ऐसे अनुभव होंगे, जिनके कारण वे समाज में बढ़ रही नकारात्मक प्रवृत्ति से इनकार नहीं करेंगे। लोग स्वीकार करेंगे कि समाज में पहले के मुकाबले लोगों में अवगुणों का समावेश ज्यादा हो गया है। लोग उन्हें सहज मानने लगे हैं।

आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि पहले के जमाने में लोगों में ईर्ष्या, द्वेष, जलन और लालच जैसे अवगुण इतने अधिक नहीं थे। लेकिन मेरा मानना है कि ये अवगुण पहले भी थे, बस उसकी शक्ल दूसरी थी। पहले जब इस तरह के भाव व्यवहार में आते थे, तो उसे लेकर समाज में पीड़ित लोगों के बीच एक सहज स्वीकार्यता थी। कई लोग अपनी पीड़ा को नियति का हिस्सा मानते थे और उसे लेकर प्रत्यक्ष आपत्ति नहीं जताते थे। हालांकि वही सहजता एक व्यवस्था के रूप में कई बार सामाजिक त्रासदी की वजह बनती थी। समय के साथ उस प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हो गई है या फिर यह प्रकट रूप दिखाई पड़ने लगा है और उसकी पहचान की जा पा रही है। यह एक व्यक्ति के अपने गुण-दोष होते हैं, जिससे सामने वाले इंसान को परेशानी नहीं होती है। बात तब बिगड़ती है जब यह ईर्ष्या, द्वेष और जलन लोगों के लिए परपीड़ा का औजार बनने लगते हैं।

परिवार हो या समाज, ऐसा लगता है कि कोई भी जगह इस रोग से अछूता नहीं रहा है। दूसरे व्यक्ति को दुख में देख कर लोगों को आखिर क्या खुशी मिलती है, यह समझ से परे है। अपने आसपास को देख कर हम कह सकते हैं कि समाज में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो दूसरे व्यक्ति को तकलीफ में देख कर राहत का भाव महसूस करते हैं। ऐसे लोग तकलीफ में पड़े किसी दूसरे व्यक्ति की मदद क्या करेंगे? आदर्श स्थिति में होना तो यह चाहिए कि मुसीबत में पड़े व्यक्ति की बढ़-चढ़ कर मदद की जाए। लेकिन हकीकत हम सब देखते और महसूस करते हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि समाज में मददगार लोग नहीं हैं। निश्चित रूप से हैं, लेकिन समय के साथ ऐसे लोगों की संख्या दिनों-दिन कम होती जा रही है। यह किसी भी संवेदनशील इंसान के लिए चिंता की बात है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर लोगों की मानसिकता में तेजी से ऐसा बदलाव क्यों हो रहा है!लोग इतने कुंठित क्यों होते जा रहे हैं जो दूसरे को तकलीफ में देख कर खुश होते हैं? यों तो समाज में हर जगह परपीड़क लोग हैं, लेकिन कार्यस्थलों पर ऐसे लोगों का उत्पात कुछ अधिक ही देखने को मिलता है। कुछ लोग दूसरों को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। कई बार तो लोग अपने निहित स्वार्थ या लाभ के लिए दूसरे को पीड़ा पहुंचाने का काम करते हैं और अपने उद्देश्य में सफल भी होते हैं। कई बार ऐसा भी होता है, जब इस खेल में लगे लोग सिर्फ मजे के लिए ऐसा करते हैं और दूसरे व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाते रहते हैं। क्या एक सभ्य और संवेदनशील परपीड़ा में आनंद का अनुभव कर सकता है?

समाज में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो दावे के साथ कहे कि उसके साथ इस तरह की घटना नहीं हुई है। अपने जीवन में हर व्यक्ति ने कमोबेश इस तरह की पीड़ा का अनुभव किया ही होगा। अक्सर इस बात पर किसी निर्णय या निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाता हूं कि अगर कोई व्यक्ति बिना लाभ के या फिर किसी लाभ के लिए किसी को नुकसान पहुंचाता है तो इसके पीछे कौन-सा स्वार्थ या भाव छिपा रहता है!

आज बहुत सारे लोगों को लगता है कि किसी भी तरीके से मैं ठीक रहूं। किसी के ऐसा सोचने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन यह विचित्र है कि मेरी सुविधा से भले दूसरे व्यक्ति को तकलीफ पहुंचे, उसे नुकसान हो, मगर उससे मुझे लाभ होना चाहिए! मैं सुरक्षित रहूं और खुश रहूं। इंसानी लिहाज से इसे कैसे देखा जाए? दरअसल, ऐसा होता नहीं है। ऐसे लोगों के जीवन में भी दुख-तकलीफें आती हैं। लेकिन विडंबना यह है कि उस समय वे भले ही बहुत दुखी हों, इसके बावजूद वे अपना स्वभाव नहीं बदलते।
अगर लोगों की मानसिकता बदलेगी और संवेदना के साथ अच्छी सोच आएगी तो समाज पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा। इससे समाज में खुशी बढ़ेगी और लोगों के जीवन में तकलीफें कम होंगी।

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