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दुनिया मेरे आगेः ठहरा हुआ अतीत

राजस्थान के सबसे आखरी छोर पर स्थित बांसवाड़ा में काम करने के दौरान मैंने सुबह-सुबह शहर और गांव के बच्चों को छोटी-छोटी टोलियों में एक के पीछे एक स्कूल जाते हुए देखा तो लगा जैसे इनमें खोया हुआ कहीं मैं भी हूं।

Author September 27, 2018 4:28 AM
प्रतीकात्मक चित्र

राय बहादुर सिंह

मैं कई सालों से ‘स्कूल चलें हम’ गीत सुनता आ रहा हूं। यह गीत मुझे मंत्रमुग्ध कर देता है, कल्पना के बगीचे में खींच लाता है। इसके बाद आंखों के सामने खेत ही खेत और उन्हें आपस में जोड़ती हजारों पगडंडियों के मनमोहक दृश्य तैर जाते हैं। उन पगडंडियों पर स्कूल की ओर दौड़ते जाते बच्चों की टोलियों में मैं खुद को कभी-कभी ढूंढ़ लेता हूं। मेरा यह खुद को ढूंढ़ना ही मुझे अतीत और वर्तमान के भंवरजाल में फंसा जाता है। बचपन में मैं भी नंगे पैर स्कूल की ओर दौड़ा चला जाता था। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर दौड़ने वाला मैं कोई अकेला नहीं था। एकाध को छोड़ दिया जाए तो सबके हाल एक ही थे। पगडंडियों पर चलते-चलते कभी ठोकर लगने से पैर की अंगुलियों के नाखून अपनी जगह छोड़ देते थे। हम देर तक रोते रहते और जब साथ के लड़के-लड़कियों को आगे जाते देखते तो सिसकियां भरते उनके पीछे हो लेते। स्कूल की छुट्टी होते-होते खून अलता (महावर) की तरह पैर पर ही सूख जाता। इस बीच दूसरों के कहने पर नीम के पत्ते या फिर सूखी मिट्टी लगा कर बहते खून को रोकने की कोशिश भी करते।

ये तमाम स्मृतियां मेरे जीवन के वे रेशे हैं, जो एकाएक मजबूत रस्सी बन कर मुझे अतीत में जबरन खींच लाए। इस कारण मैं अपने अतीत और वर्तमान में कोई खास भेद नहीं कर पा रहा हूं। अपने अतीत से किसे डर नहीं लगता है! बदलाव प्रकृति का नियम है। लेकिन आज मैं जिस जगह पर हूं, वहां प्रकृति का नियम काम क्यों नहीं कर रहा लगता है! जबकि आज दुनिया तकनीक में चौथी से पांचवीं पीढ़ी की ओर बढ़ रही है। मैं एक ऐसी जगह पर हूं, जहां जितनी दूर तक नजर जाए, घास, फसलों और पेड़-पौधों से लदे खेत और पहाड़ नजर आते हैं और दिखते हैं ऐसे बच्चे, जो शायद स्कूल जाने वाली पहली पीढ़ी है। इस जगह पर सैंकड़ों पगडंडियां खेतों को जोड़ती नजर आती हैं। ठंडी हवा और हर वक्त आसमान पर छाए मेघ। ये सभी चीजें ‘स्कूल चलें हम’ गीत के हर दृश्य को मेरे सामने साकार करते हैं, जिसने हमेशा मेरे सामने एक दिलकश सपने को साकार किया है।

राजस्थान के सबसे आखरी छोर पर स्थित बांसवाड़ा में काम करने के दौरान मैंने सुबह-सुबह शहर और गांव के बच्चों को छोटी-छोटी टोलियों में एक के पीछे एक स्कूल जाते हुए देखा तो लगा जैसे इनमें खोया हुआ कहीं मैं भी हूं। बारिश की मार खाए नुकीली सड़कों, ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर सभी बच्चे नंगे पांव अपने में ही मस्त चले जा रहे थे। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कमीज की सिलाई जगह-जगह से खुली हुई है या बाल सलीके से बने हैं या नहीं। यह सब देख कर सिर में अचानक दर्द उठने लगा। मुझे यह बात पच नहीं रही थी कि सालों बाद भी मेरा अतीत ज्यों का त्यों बदहाल क्यों है।

उस समय मेरे अंतर्मन में अनेक बुलबुले बन रहे थे। ये सवाल थे कि सरकारी स्कूलों की ओर ज्ञान प्राप्ति की लालसा लिए तमाम दुश्वारियों के बावजूद जाने वाले बच्चों के पैर नंगे क्यों हैं? उनके पैरों में पड़ी बिवाइयों या फिर घावों का जिम्मेदार कौन है? मैं जानना चाहता हूं कि सदियों से इन सवालों पर जो मौन है, वह कौन है? इसी उधेड़बुन में बांसवाड़ा की सड़कों और गलियों में घूमते हुए मैंने कई बार उस कहानी के पात्रों को ढूंढ़ना चाहा, जिसे मैंने सालों पहले किसी से सुना था। हुआ यों था कि एक सेठ ने अपने तीन बेटों को बुला कर कहा कि ऐसे गांव जाओ जहां अभी तक विकास न पहुंचा हो और सब देख-समझ के बताना कि वहां क्या धंधा किया जा सकता है। सेठ के दोनों बड़े बेटों ने लौट कर कहा कि वह जगह इंसानों के रहने की नहीं है। लेकिन सेठ के छोटे बेटे ने कहा कि मैं उस क्षेत्र में चप्पल-जूतों का व्यापार करना चाहता हूं, क्योंकि वहां के लोगों के पास पहनने के लिए चप्पल नहीं है और ये परिस्थितियां मेरे धंधे के लिए अच्छी हैं। मैं उन्हें सस्ते जूते-चप्पल बेच कर उनकी आदत बदल दूंगा। यहां बांसवाड़ा में मुझे ऐसी सोच वाला सेठ का कोई लड़का अब तक नजर नहीं आया।

सच कहूं तो मैं जब दिल्ली में था तब मेरे लिए भी चप्पल सिर्फ प्रयोग की एक वस्तु का नाम था। लेकिन जब से बांसवाड़ा आया हूं तब पता चला कि चप्पल शब्द के मायने यहां के गांव में व्यापक हैं। कुछ लोगों के पास चप्पल है तो वे बड़े जतन से रखते हैं तो ज्यादातर के लिए यह गैरजरूरी है। यों आजकल यह जानने की उत्सुकता जाने कैसे मेरे मन में आ बैठी है कि यहां के बच्चे अपने सपनों में भी चप्पल पहनते होंगे या नहीं! या फिर वे अपने सपनों को भी यह कह कर बहला लेते हैं कि ‘खयालों के आंगन में, ओस की बूंदों पर, चलते हुए हम इतनी दूर निकल आए कि यह याद ही नहीं रहा कि चप्पल कहां उतारी थी!’

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