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दुनिया मेरे आगेः संस्कृति की राह

शोरशराबे, चकाचौंध, दंभ और पाखंड ने धर्म की अवधारणा को बिगाड़ कर रख दिया है। यह समझना मुश्किल है कि जो लोग जिस तरह की गतिविधियों से संस्कृति बचाने का दावा करते हैं, उनसे संस्कृति कितनी बचेगी!

Author October 2, 2018 2:49 AM
गणेशजी की मूर्तियां सजी हैं, लाउडस्पीकरों पर भक्ति-गीत जोर-शोर से बज रहे हैं और आने-जाने वालों को खीर-हलवे का प्रसाद बांटा जा रहा है।

शोभना विज

इन दिनों शाम के समय घर के आसपास और काफी दूर से भी पटाखों की धमाकेदार आवाजें सुनाई पड़ती हैं, मानो दिवाली हो। मुझे लगा कि यह शादियों का मौसम है, शायद इसलिए ऐसा हो रहा है। लेकिन कुछ रोज पहले हम कुछ लोग नजदीक की सड़क के किनारे नए रोपे गए वृक्षों में पानी डाल रहे थे कि अचानक वैसी ही आवाजें हवा में गूंजने लगीं। आसपास के लोगों से पूछने पर पता चला कि इन दिनों लोग गणेश चतुर्थी के मौके पर की गई पूजा के बाद प्रतिमाओं को जल में विसर्जित करने जाते हैं। उसी का जश्न हो रहा है। मुझे लगा कि गणेश की प्रतिमा का जल-विसर्जन! यह पूजा हमारे यहां यह कब से होने लगी? हम अभी सोच ही रहे थे कि कुछ ही देर में सड़क पर बड़े-बड़े वाहनों का आना-जाना शुरू हो गया। उन्माद की तरह का शोर मचाते हुए नौजवानों से लदे ट्रक। एक वाहन पर बीचोंबीच चार-पांच फुट ऊंची गणेश की मूर्ति रखी थी, भड़कीले और चमकीले रंगों से पुती हुई। पता नहीं, जो लोग पूजा-पाठ में लगे होंगे, उनकी नजर में वहां तेज लाउडस्पीकरों से बज रहा संगीत ‘ध्वनि प्रदूषण’ था या नहीं। मगर ज्यादातर होशमंद लोग उसे ‘ध्वनि-प्रदूषण’ के तौर पर ही देखेंगे। उसके बीच बारूद से गंधाती हवा में सांस लेते हुए मैं उस नदी के बारे में सोचने लगी, जिसके पानी में कुछ देर बाद प्रतिमा को विसर्जित किया जाना था।

इससे पहले कहीं यह भी सुनने में आया था कि शहर के गली-चौराहों पर बहुत भीड़ लगी है। गणेशजी की मूर्तियां सजी हैं, लाउडस्पीकरों पर भक्ति-गीत जोर-शोर से बज रहे हैं और आने-जाने वालों को खीर-हलवे का प्रसाद बांटा जा रहा है। तब भी गणेशजी की छवि से ज्यादा सड़क पर फैला जूठी प्लेटों का कचरा ध्यान में अटक गया था। इन सबके बीच जगह-जगह गणेशजी की मूर्तियां रखी होने की बात पर मुझे लगभग तीस साल पहले वाली गणेश-चतुर्थी की याद हो आई। मेरी एक पड़ोसन मूल रूप से मध्यप्रदेश के देवास शहर की रहने वाली थी। एक दिन दोपहर में वह मेरे पास आई और मायूस-सी बोली- ‘मम्मीजी देवास से आई हुई हैं। उन्हें गणपति की मूर्ति चाहिए। कहीं नहीं मिली, अब क्या करूं!’ मैंने चिकनी मिट्टी या आटे से छोटी-सी आकृति बनाने का सुझाव दिया तो वह हंसते हुए चली गई। पता नहीं उस समय उनकी समस्या का समाधान कैसे हुआ होगा, लेकिन बहुत सारे लोगों की उलझन आज तक नहीं सुलझ पाई है। उलझन में पड़े उन लोगों में से एक मैं भी हूं। सोचती हूं कि कभी गणेश की मूर्ति जहां मुश्किल से उपलब्ध होती थी, वहीं आज हर गली हर मोड़ पर मूर्तियां सुशोभित हैं। यानी शहर वही है, पर कितना बदल गया है!

देश के कुछ हिस्सों में गणपति-पूजन या ऐसे अन्य कई अनुष्ठानों की धूमधाम के बारे में हम आमतौर पर सुनते रहते हैं। इनमें एक बहुत बड़े समाज की भागीदारी होती है। यह एक कड़वा सच है कि जहां धर्म, संस्कृति या परंपराओं के निर्वाह का सवाल हो तो क्या शिक्षा, क्या आधुनिकता और क्या पर्यावरण की चेतना, इन सबको पीछे धकेल दिया जाता है। और अगर कहीं धार्मिकता के इस शोर में प्रतियोगिता का जुनून भी घुल कर दिमागों पर सवार हो जाए, तब तो वहां से विवेक को ही धता बता दिया जाता है।
लेकिन यह घटना किसी और जगह की नहीं थी। मैं कहीं दूरदराज की नहीं, अपने क्षेत्र की बात कर रही थी। वह भी यहां सामान्य धार्मिक गतिविधियों के नाम पर समाज में बेतहाशा बढ़ते जा रहे उन्माद की। इसके पीछे आज की उग्र और उन्मादी राजनीति के रवैये से भी इनकार नहीं किया जा सकता, जिसने धार्मिकता के सौम्य रंगों को विकृत कर डाला है। आज धर्म के पालन में वह पहली-सी सादगी नहीं दिखती है!

शोरशराबे, चकाचौंध, दंभ और पाखंड ने धर्म की अवधारणा को बिगाड़ कर रख दिया है। यह समझना मुश्किल है कि जो लोग जिस तरह की गतिविधियों से संस्कृति बचाने का दावा करते हैं, उनसे संस्कृति कितनी बचेगी! और अगर इसी रूप में सब कुछ चलता रहा तो आने वाले समय में हमारी संस्कृति का स्वरूप कैसा होगा! धर्म के नाम पर उन्माद की बुनियाद पर खड़ी संस्कृति कितनी मानवीय मूल्यों की पोषक होगी? अफसोस इस बात पर है कि ऐसा करने में हमारी युवा पीढ़ी सिर्फ हिस्सेदार ही नहीं है, बल्कि इसमें अग्रणी भूमिका निभा रही है। व्यक्तित्व के विकास और एक स्वस्थ समाज के निर्माण में यह स्थिति सबसे बड़ी बाधा है। अभिभावकों और शिक्षकों के सामने यह एक बड़ी चुनौती है, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उस रोज घर लौटते समय मन पर बोझ लिए मैं यही सोचती रही कि कितना अच्छा हो, अगर हमारे युवा अपना यही समय और ऊर्जा किन्हीं ऐसे कार्यों में लगाएं, जिनसे एक बेहतर समाज का हमारा सपना साकार हो सके।

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