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नियम बनाम अमल

हमारे देश में नियम-कायदे तो बहुत हैं, पर कानून का पालन बहुत कम मामलों में हो पाता है।

Author September 30, 2015 10:45 AM

हमारे देश में नियम-कायदे तो बहुत हैं, पर कानून का पालन बहुत कम मामलों में हो पाता है। यों सामान्य व्यवस्था के अंतर्गत विधायिका नियम-कानून बनाती है, प्रशासन और पुलिस पर उनका पालन करवाने की जिम्मेदारी है और न्यायपालिका कानून तोड़ने वालों को सजा देती है। पर क्या यह सब इतना सरल और सहज है, जितना नजर आता है? कानून बनाने वाले कहेंगे कि उन्होंने तो दुरुस्त व्यवस्था बनाई और अब प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह कानून का पालन करवाए। प्रशासन कहेगा कि वह तभी कुछ कर सकता है, जब कोई पीड़ित व्यक्ति कानून तोड़ने वाले की शिकायत करे। अगर कुछ नहीं किया गया तो पीड़ित व्यक्ति न्यायालय के दरवाजे खटखटा सकता है। लेकिन यहां भी साक्ष्य और गवाह जैसे जटिल मुद्दों से गुजरना पड़ेगा।

दरअसल, सारा मुद्दा ही राजनीति से जुड़ा हुआ है। फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए है, मगर उस पर सभी जगह या तो पार्किंग होती है या वह दुकानदारों के सामान रखने के काम आता है। यातायात के नियमों को ही लिया जाए तो कार चलाते समय बेल्ट लगाने या हेलमेट पहनने और दुपहिया वाहनों पर दो से अधिक सवारी बैठने की मनाही है। लेकिन कितने लोग मानते हैं, कितनों पर कार्रवाई होती है और कितनों को छोड़ दिया जाता है, यह सब जानते हैं।

गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करना दंडनीय अपराध है। पर कार या ऑटो ही नहीं, बाइक चलाते हुए भी अनगिनत लोग बात करते हर शहर में नजर आते हैं। जुलूस और बारात का मुख्य सड़कों पर नाचते-गाते हुए ही नहीं, शोर मचाते हुए और आने-जाने वालों को परेशान करते हुए चलना कई शहरों की त्रासदी है। विडंबना देखिए कि जो डीजे अदालत ने प्रतिबंधित कर रखे हैं, उनका खुलेआम ट्रकनुमा ट्रॉली में रख कर शोर या ध्वनि प्रदूषण करना भी पुलिस को नजर नहीं आता।

क्या स्थानीय प्रशासन इतना भी नहीं कर सकता कि शहर में सभी बड़े बैंड वालों के पास से डीजे वाले ट्रकनुमा ट्रॉली जब्त करे? क्या पहली नजर में ही अवांछित नजर आने वाली इस गतिविधि को रोकने के लिए किसी के शिकायत करने की जरूरत है? ऐसा लगता है कि पुलिस मूकदर्शक है और जब तक कानून-व्यवस्था भंग होने की स्थिति न आए तब तक कुछ भी करने से बचना चाहती है।
सार्वजनिक स्थान पर सिगरेट-बीड़ी पीने और सार्वजनिक स्थान पर गंदगी करने के खिलाफ भी सख्त नियम हैं। पर क्या वे लागू हो पाते हैं? न तो नियम तोड़ने वालों को ही कोई शर्म है और न दूसरे लोग एतराज जताते हैं। जिन पर इसे रोकने की जवाबदेही है, वे इनसे बेखबर बने रहने का स्वांग रचते हैं। सब कुछ देख कर भी अनदेखा करना शायद हमारी दरियादिली का नायाब नमूना है! लेकिन यकीन मानिए कि देश में कानून तोड़ कर ऐसा करने वाले विदेश जाने पर भीगी बिल्ली बन जाते हैं और वहां ऐसी कोई गंदगी करने का साहस तक नहीं कर पाते। फिर गंदगी करने की आजादी का अहम हिस्सा बनने की जुर्रत देश में ही क्यों? ‘सब चलता है’ जैसे गैरजिम्मेदार जुमले ने ही हमें कमजोर और असहाय कर दिया है।

कतार में खड़े रह कर अपनी बारी का इंतजार करना एक सर्वमान्य शिष्टाचार है और इसका एक नियम की तरह पालन किया जाना चाहिए। लेकिन कुछ प्रभावशाली लोग तो कतार में लगने को ही अपनी शान के खिलाफ मानते हैं। पर उनके खिलाफ क्या कोई कार्रवाई होती है? ऐसे लोगों का बहिष्कार तो किया ही जा सकता है। पर क्या इसके लिए बाकी लोग एकमत हो पाएंगे? इसमें मुझे शक है।
नियम और कानून के प्रति सम्मान और उन्हें तोड़ने पर कार्रवाई का डर भी जरूरी है। तभी ऐसी आदर्श स्थिति बनती है कि कानून का पालन जीवन का अभिन्न अंग बन जाए। वरना नियम-कानून बनते जाएं और उनका आम जीवन में क्रियान्वयन न हो तो यही होगा कि विधायिका, कार्यपालिका की ओर देखेगी, और कार्यपालिका, न्यायपालिका की ओर।

अभी तो ऐसी ही स्थिति है कि गंदगी, भ्रष्टाचार और आम जिंदगी की रोज की अन्य परेशानियां जो कार्यपालिका को दूर करनी चाहिए, वे भी न्यायपालिका के ऊपर ही आ पड़ी हैं। न्यायपालिका यों ही काम के अत्यधिक भार से जूझ रही है। अगर सभी कुछ न्यायालय ही करने लगे तो फिर पुलिस, प्रशासन और विधायिका सिर्फ तमाशबीन नहीं बन जाएंगे? ‘देखो और प्रतीक्षा करो’, ‘अपनी चमड़ी बचा कर काम करो’ और ‘मध्यमार्गी बने रहो’ के चलन के कारण अक्सर हम अधिकार होते हुए भी राजनीतिक दबाव के चलते उनका उपयोग नहीं कर पाते।
सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी
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