सपनों से परे

मां-बाप धन कमाने की मशीन बन गए हैं। बच्चों को शीर्ष पर पहुंचाने की चाहत में वे इस बात से बेखबर हैं कि उनके बच्चे के पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है।

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चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

एक अबोध मन की कल्पना इस दुनिया की सबसे सुंदर रचना होती है। कभी किसी छोटे-से बच्चे को निहारिए। वह सबसे बेखबर अपनी ही दुनिया में खोया होता है। जाने वह क्या देखता है! अनायास कभी वह मुस्करा देता है तो कभी भयभीत हो जाता है। कभी खुद से बात करने की कोशिश करता है तो कभी वह सोच की मुद्रा में पड़ जाता है। तब उसे यह नहीं पता होता कि हाथी किस तरह का होता है या शेर कभी हमला भी कर सकता है! चिड़िया की चहचह उनका मन मोह लेती है तो बंदर की उछल-कूद उसके लिए एक खेल होता है। सच से परे वह अपनी दुनिया खुद बुनता है। शायद इसीलिए हमारे समाज में बच्चों के खेल-खिलौनों का आविष्कार हुआ। बंदर से लेकर चिड़िया और गुड्डे-गुड़िया या घर-गृहस्थी के सामान बच्चों के खेल में शामिल होते थे। नन्हें बच्चे का आहिस्ता-आहिस्ता दुनिया से परिचय होता था।

एक वह समय था जब मां-बाप के पास भी वक्त होता था। वे अपने बच्चों को बढ़ते देख कर प्रसन्न होते थे। यह वही समय होता था जब मां लोरी सुना कर और बच्चों को थपथपा कर स्नेहपूर्वक नींद के आगोश में भेजती थी। शायद इसी समय से शुरू होता था मां का स्कूल। इस स्कूल में मां का स्नेह तो था ही, जीवन का सबक भी बच्चा यहीं से सीखता था। यानी बड़ों का सम्मान करना और छोटों से प्यार। यह वही समय था वह पर्व-त्योहारों को मनाए जाते देख कर उनके भावों को अपने दिमाग में उतारता था। वह रंगों का मतलब जानता था। पतंग की डोर से वह जीत की सीख लेता था। लेकिन इस जीत की सीख में उसके पास संवेदनाएं भी थीं। वह जीतना चाहता था, लेकिन किसी की पराजय उसका लक्ष्य नहीं था।

विडंबना यह है कि स्वप्न-लोक में बच्चों के विचरने के दिन अब गुम हो गए हैं। अब न वह समय बचा और न सपने। अब बच्चे वयस्क दिख रहे हैं। मां-बाप के पास वक्त नहीं है। अब उन्हें कोई नहीं सिखाता है कि ‘ह’ से हाथी और ग से गमला होता है। वे यह जानते हैं कि ‘एलीफैंट’ किसे कहते हैं। ‘बंदर मामा’ की कहानी उसे पता नहीं है, लेकिन ‘मंकी’ से वह बाखबर है। दिवाली पर फूटने वाले पटाखों को वह पर्यावरण दूषित करना कहता है, लेकिन एके-47 जैसे घातक हथियारों के मोहपाश में बंधा हुआ है। बंदूक उसे जीवन-रक्षक लगता है। बच्चे का दिमाग टेलीविजन के परदे पर उतरने वाले रंगों की तरह रंगा हुआ है, लेकिन होली के रंगों से उसे एलर्जी है। आज का बच्चा ‘इंटेलीजेंट’ है। वह ‘आइपैड’ से खेलता है और कॉमिक वाले धारावाहिक देखता है। उसे अब सपने नहीं आते। वह ‘एनीमेटेड’ चरित्रों को देख कर उन्हें ही जीने लगता है। इन चरित्रों में भी जिसे ‘विलेन’ या खलनायक कहा जाता है, वही उसका प्रिय पात्र होता है। आज का बच्चा जल्दी में है। वह थोड़े समय में सब कुछ पा लेना चाहता है। जीत जाना उसका एकमात्र ध्येय है। पराजय उसे नापसंद है। वह दूसरों को पराजित होता देख आनंद से भर उठता है। एक खलनायक उसके भीतर पनप रहा है! उसे यहां तक किसने पहुंचाया?

यह इस समय का कड़वा सच है। मां-बाप धन कमाने की मशीन बन गए हैं। उन्होंने अपने सपनों को मार दिया है। बच्चों को शीर्ष पर पहुंचाने की चाहत में वे इस बात से बेखबर हैं कि उनके बच्चे के पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है। समाज के प्रति संवेदनहीन मानसिकता में जीता हुआ बच्चा कामयाब तो हो सकता है, लेकिन यह कामयाबी उसे इंसान नहीं बना पाएगी। दूसरी ओर, मां-बाप के पास अब बच्चे को लोरी सुना कर थपथपा कर सुलाने का वक्त नहीं है। कान की नसों को फाड़ते बेसुरी आवाजों में बच्चा रम जाता है। मां-बाप के पास बच्चों को सुनाने के लिए कहानी नहीं है। एकल परिवार के चलते दादा-दादी और नाना-नानी तो पहले ही गुम हो चुके हैं।

अब बच्चों को खाने में दूध-भात नहीं दिया जाता, बल्कि अब उनके खाने के लिए मैगी या ऐसा ही कोई फास्टफूड है। बच्चों की जरूरत का हर जवाब मां-बाप के पास पैसा है। यह समय बेहद डराने वाला है। इस समय ने बच्चों के सपनों को गुमशुदा कर दिया है। वे कल्पना के बिना जी रहे हैं। उनमें जिज्ञासा नहीं बची है। बची है तो जीत लेने की होड़। जीत और हार के बीच धीमे-धीमे बड़े होते इन बच्चों को कौन वापस ले जाएगा उनके सपनों की दुनिया में, यह सवाल जवाब के इंतजार में है। कहते हैं सपनों का मर जाना सबसे बुरा होता है और हम इस बुरे समय के साक्षी बनने लिए मजबूर हैं। कहीं हम खुद ही तो बच्चों के सपनों का कत्ल नहीं कर रहे हैं!

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