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दुनिया मेरे आगे

भाईचारे की इमारत

महेंद्र राजा जैन बर्लिन में पिछले कुछ वर्षों से जगह-जगह आकाश छूती इमारतों के निर्माण कार्य के दौरान क्रेनों की कानफोड़ू आवाज से वहां...

आत्म बगैर कथा

संदीप जोशी आत्मकथा लिखने का एक समय होता है। जीवनी लिखने की भी एक उम्र होती है। आत्मकथा या जीवनी लिखना जीवन में मिली...

स्वच्छता का परदा

विनोद कुमार पिछले कुछ समय से स्वच्छता और सफाई को लेकर अजीब तमाशा हो रहा है। मोदीजी ने आह्वान किया और लोग निकल पड़े...

दूर के राही

सुनील मिश्र पिछले महीने विख्यात पार्श्वगायक दिवंगत किशोर कुमार की पुण्यतिथि तेरह अक्तूबर को सरकारी ड्यूटी के हिसाब से एक दिन पहले खंडवा आ...

तुम अकेली नहीं होगी

सदफ़ नाज़ प्यारी रेहाना जब्बारी! तुम्हारी मां ‘शोलेह’ के नाम तुम्हारा खत पढ़ा। तुम्हारी फांसी और उसके बाद इस खत से अब पूरी दुनिया...

तहजीब के तराने

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी बात सत्तर के दशक की है। तब दिल लखनवी बड़े लोकप्रिय थे। ऊंची आवाज और बुलंद तरन्नुम में गजल पढ़ते थे और...

नफरत के नासूर

निवेदिता पच्चीस साल पहले भागलपुर जख्मों से भर गया था। एक बार फिर उसके जख्म हरे हो गए। स्मृति भी किस अंधेरे में अपना...

उलटी बयार

विश्वंभर शिक्षा में बदलाव के प्रति राज्य सरकारों के सरोकारों और गंभीरता को उनके फैसलों के संदर्भ में देखा-समझा जाना चाहिए। राजस्थान के शिक्षामंत्री...

खोई हुई दिशाएं

मधु कांकरिया वह पिछले सप्ताह ही एम्स्टर्डम से मुंबई आई थी, तीन महीने के लिए। पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह...

हाइटेक ठगी

अजेय कुमार जनसत्ता 17 नवंबर, 2014: बेटे को तरक्की पर जब उसकी कंपनी ने एक महंगा मोबाइल फोन दिया तो मुझे डर लगा रहता...

अंतहीन बाजार

संदीप जोशी जनसत्ता 15 नवंबर, 2014: बाजार को हर मौके पर मुनाफा कमाने की चाहत रहती है। वहीं उपभोक्ता को बाजार में होड़ से...

बाजार में बचपन

शुभू पटवा जनसत्ता 14 नवंबर, 2014: बच्चों के लिए सोचना और काम करना जितना जरूरी है, उतना ही जटिल भी। लेकिन हमारे समाज की...

नेहरू का नायकत्व

अशोक लाल जनसत्ता 13 नवंबर, 2014: मुझे नहीं पता कि नेहरूजी की छाती कितनी चौड़ी थी! तब हमारे नेता अपनी पहलवानी की डींगें नहीं...

मेरे तीन डर

राजकिशोर जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: एक भेद की बात बताना चाहता हूं, हालांकि बात फैल गई, तब भी मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। दरअसल,...

सियासत की दीवारें

के. विक्रम राव जनसत्ता 11 नवंबर, 2014: सुबह के दैनिक पलट रहा था। अट्ठाईस से तीस तो अमूमन होते हैं। ‘आज का इतिहास’ पीटीआइ...

आजाद उद्यान

प्रयाग शुक्ल जनसत्ता 10 नवंबर, 2014: मैं उन्हें बड़े मनोयोग से संगमरमरी चबूतरे पर गिरे हुए एक-एक सूखे पत्ते, धूल को बुहारते देख रहा...

श्रमेव और संस्कृत

शास्त्री कोसलेंद्रदास जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: नरेंद्र मोदी की सरकार बनने पर जिस बात की सबसे अधिक उम्मीद की गई, वह संस्कृत के विकास...

गांधी मैदान तब

के. विक्रम राव जनसत्ता 20 अक्तूबर, 2014: भले ही सौराष्ट्र के सींगदाने का बीया बड़ा होता हो, लखनऊ की मूंगफली खाने, साथ में सोंधा...