ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे

चुनाव के चेहरे

एक गाना है- ‘ये मौसम भी गया वो मौसम भी गया, अब तो कहो मेरे सनम फिर कब मिलोगे, मिलेंगे जब हां हां बारिश...

बचपन के रंग

विष्णु नागर जिन दिनों हमारे साथी, मित्र, रिश्तेदार ठंड से ठिठुर रहे हैं, हम अपने दो पोतों के पास केरल में हैं, जहां ठंड...

अजमेर में रज़ा

हर साल अपनी पहचान में कोई न कोई ऐसा प्रसंग छोड़ जाता है, जिससे उसकी यादें, उसकी क्रमिकता हमारे भीतर बनी रहती हैं। बीते...

वह सुबह

दिल्ली के पंडारा रोड में मेरे घर के अगल-बगल अनेक बड़े-बड़े अफसर, मंत्री, सांसद रहते हैं, जो एक दूसरे से शायद ही कभी बोलते...

ठगी के ठिकाने

प्रेमपाल शर्मा नाम हरीचंद। काम ठेली पर हरी सब्जी बेचना। वह अक्सर अंधेरा होने के बाद ही मिलता था। गिनी-चुनी सब्जी, पालक, मेथी, सरसों...

यादों की कड़ियां

क्षमा शर्मा उस शाम वह जम्मूतवी एक्सप्रेस थी। मुझे बरेली जाना था। पंकज चतुर्वेदी मुझे लेने आने वाले थे। मगर गाड़ी छूट चुकी थी।...

कसौटी पर युवजन

शुभू पटवा आज क्या यह कल्पना की जा सकती है कि कोई समाज युवजन-विहीन होकर अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है? किसी भी काल...

आमिर खान की ‘PK’: परदे पर सियासत

जितेंद्र कुमार आमतौर पर फिल्में मैं कम देखता हूं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से लगातार कई मित्रों ने मौजूदा राजनीति पर बहसों के बीच...

यादों के शहर

वर्षा हर वह शहर जिससे होकर हम कभी गुजरते हैं, जहां कुछ पल ठहरते हैं, वहां की सड़कें, बाजार, इमारतें देखते हैं, उससे एक...

लूट सके सो लूट

दीपक मशाल कुछ समय पहले पेरिस से भारत आया तो मोबाइल में वाट्स-ऐप को बंद करना भूल गया। इसका खमियाजा इस तरह भुगतना पड़ा...

दिखना और होना

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी आमतौर पर जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह दिखता नहीं। शायद इसीलिए कहा जाता रहा है कि...

परदे के पार

सुजाता तेवतिया टीवी के अन्य कार्यक्रमों की तरह ही विज्ञापन भी एक स्वतंत्र कार्यक्रम का दर्जा पा चुके हैं। वे अब सिर्फ रिक्त स्थान...

अज्ञान का अहंकार

विष्णु नागर कुछ समय पहले की बात है। हवाईयात्रा पूरी हो चुकी थी और गंतव्य तक पहुंचने के बाद यात्री बाहर आ रहे थे।...

कैसा नया

सुमेरचंद जितनी देर में पृथ्वी अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करती है, उतने समय को एक दिन कहा जाता है। इसी प्रकार, जितने...

बृहत्तर परिवार

राजकिशोर वे नहीं रहीं। वे कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं। क्या बूढ़ा होना बीमार होना है? बिलकुल नहीं। लेकिन बुढ़ापा आदमी को...

वह अविस्मरणीय रात

अरविंद कुमार मुझे याद है छब्बीस-सत्ताईस दिसंबर 1973 को ‘समांतर कोश’ के विचार की वह न भुला सकने वाली रात। ‘माधुरी’ व्यावसायिक फिल्म पत्रिका...

स्तरीयता बनाम लोकप्रियता

देवेंद्र आर्य स्तरीयता बनाम लोकप्रियता की गांठ हिंदी साहित्य के लिए ऐसी है, जिसे लगभग सभी बड़े साहित्यकारों ने खोलने की कोशिश की है।...

कहां है हमारा हिस्सा

विपिन चौधरी बरसों पहले जब सुनीता की शादी हुई थी, तब उसके पिता ने गांव में सबसे ज्यादा दान-दहेज देकर उसे ससुराल विदा किया...