दुनिया मेरे आगे Archives - Page 59 of 63 - Jansatta
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दुनिया मेरे आगे

भरोसे की राह

रचना त्यागी ‘राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर उबर कंपनी फिर से लौट रही है।’ यह बात उबर कंपनी ने अपने एक इ-मेल में लिख...

संगत का सिरा

विष्णु नागर हाल ही में तिरुवनंतपुरम में केरल सरकार के पर्यटन विभाग के एक भव्य संगीत समारोह में अमजद अली खां ने सरोद वादन...

उनके पास वक्त न हुआ

किरण बेदी समय पर ही बाहर आर्इं। इतनी तेजी से घर से निकलीं कि दुआ-सलाम का भी ठीक से वक्त नहीं मिला। हम उनके...

आया ऋतुराज वसंत

चंचल भला हो लोककथाओं का, उनके मिथकीय चरित्रों और कथा के ताने-बाने का, जिसने समूचे समाज को उत्सवधर्मी बना दिया। हजारों-हजार साल से ये...

आस्था के आडंबर

अशोक गुप्ता मैं बेशक एक आस्तिक व्यक्ति हूं और धार्मिक आयोजनों की प्रस्तुति में अंतर्निहित संस्कृति का भावबोध ग्रहण कर सकता हूं। लेकिन धार्मिक...

सबक के बजाय

महेंद्र राजा जैन मुझे लगता है कि सोलह दिसंबर 2012 की घटना की खौफनाक रात दिल्ली के साथ-साथ देश भर के लोग अभी भूले...

विविधता की जगह

वरुण शर्मा जिन आदिवासी समुदायों की भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके बच्चों को आज एक दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है।...

चुनाव के चेहरे

एक गाना है- ‘ये मौसम भी गया वो मौसम भी गया, अब तो कहो मेरे सनम फिर कब मिलोगे, मिलेंगे जब हां हां बारिश...

बचपन के रंग

विष्णु नागर जिन दिनों हमारे साथी, मित्र, रिश्तेदार ठंड से ठिठुर रहे हैं, हम अपने दो पोतों के पास केरल में हैं, जहां ठंड...

अजमेर में रज़ा

हर साल अपनी पहचान में कोई न कोई ऐसा प्रसंग छोड़ जाता है, जिससे उसकी यादें, उसकी क्रमिकता हमारे भीतर बनी रहती हैं। बीते...

वह सुबह

दिल्ली के पंडारा रोड में मेरे घर के अगल-बगल अनेक बड़े-बड़े अफसर, मंत्री, सांसद रहते हैं, जो एक दूसरे से शायद ही कभी बोलते...

ठगी के ठिकाने

प्रेमपाल शर्मा नाम हरीचंद। काम ठेली पर हरी सब्जी बेचना। वह अक्सर अंधेरा होने के बाद ही मिलता था। गिनी-चुनी सब्जी, पालक, मेथी, सरसों...

यादों की कड़ियां

क्षमा शर्मा उस शाम वह जम्मूतवी एक्सप्रेस थी। मुझे बरेली जाना था। पंकज चतुर्वेदी मुझे लेने आने वाले थे। मगर गाड़ी छूट चुकी थी।...

कसौटी पर युवजन

शुभू पटवा आज क्या यह कल्पना की जा सकती है कि कोई समाज युवजन-विहीन होकर अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है? किसी भी काल...

आमिर खान की ‘PK’: परदे पर सियासत

जितेंद्र कुमार आमतौर पर फिल्में मैं कम देखता हूं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से लगातार कई मित्रों ने मौजूदा राजनीति पर बहसों के बीच...

यादों के शहर

वर्षा हर वह शहर जिससे होकर हम कभी गुजरते हैं, जहां कुछ पल ठहरते हैं, वहां की सड़कें, बाजार, इमारतें देखते हैं, उससे एक...

लूट सके सो लूट

दीपक मशाल कुछ समय पहले पेरिस से भारत आया तो मोबाइल में वाट्स-ऐप को बंद करना भूल गया। इसका खमियाजा इस तरह भुगतना पड़ा...

दिखना और होना

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी आमतौर पर जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह दिखता नहीं। शायद इसीलिए कहा जाता रहा है कि...