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दुनिया मेरे आगे

न चाकर को चाकरी

जब देश आजाद हुआ था तो पढ़े-लिखे लोगों की संख्या ज्यादा नहीं थी। इसलिए थोड़ा शिक्षित लोग भी सरकारी नौकरी पा जाते थे और...

सांध्य वेला में

शिव कुमार शर्मा न्यायमूर्ति एमसी छागला ने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ‘रोजेज इन दिसंबर’ इस चिंतन के बाद दिया है कि दिसंबर वर्ष का...

भटके हुए राही

अजेय कुमार बेटे ने जब अपनी विदेशी मुसलिम मित्र से शादी करने का प्रस्ताव रखा तो मुझे शक था कि मेरे सगे-संबंधियों में इसका...

जनतंत्र की राह

संदीप जोशी आज दलीय राजनीति अपनी विचारधारा यानी ‘बेस’ को संवारने में लगी है और अपने चेहरे बदलने के लिए मजबूर हुई है। मूंगफली...

होनी अनहोनी

वे हमारे मित्र थे और उम्र में मुझसे काफी बडेÞ थे। कुछ समय पहले नब्बे साल की उम्र में उनका निधन हो गया। शोक...

प्यार की बोली

अरुणेंद्र नाथ वर्मा किसी टेलीफोन वार्तालाप के अंत में प्यार उड़ेलते हुए ‘लव यू, लव यू टू’ जैसे शब्द सबसे पहले अंगरेजी चलचित्रों में...

हमसे स्कूल मत छीनो

निवेदिता मेरा शहर निहायत बदसूरत है। एक ऐसा शहर जहां पेड़-पौधे नहीं हैं, बाग नहीं हैं और जहां मौसम का फर्क सिर्फ आसमान में...

भरोसे की राह

रचना त्यागी ‘राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर उबर कंपनी फिर से लौट रही है।’ यह बात उबर कंपनी ने अपने एक इ-मेल में लिख...

संगत का सिरा

विष्णु नागर हाल ही में तिरुवनंतपुरम में केरल सरकार के पर्यटन विभाग के एक भव्य संगीत समारोह में अमजद अली खां ने सरोद वादन...

उनके पास वक्त न हुआ

किरण बेदी समय पर ही बाहर आर्इं। इतनी तेजी से घर से निकलीं कि दुआ-सलाम का भी ठीक से वक्त नहीं मिला। हम उनके...

आया ऋतुराज वसंत

चंचल भला हो लोककथाओं का, उनके मिथकीय चरित्रों और कथा के ताने-बाने का, जिसने समूचे समाज को उत्सवधर्मी बना दिया। हजारों-हजार साल से ये...

आस्था के आडंबर

अशोक गुप्ता मैं बेशक एक आस्तिक व्यक्ति हूं और धार्मिक आयोजनों की प्रस्तुति में अंतर्निहित संस्कृति का भावबोध ग्रहण कर सकता हूं। लेकिन धार्मिक...

सबक के बजाय

महेंद्र राजा जैन मुझे लगता है कि सोलह दिसंबर 2012 की घटना की खौफनाक रात दिल्ली के साथ-साथ देश भर के लोग अभी भूले...

विविधता की जगह

वरुण शर्मा जिन आदिवासी समुदायों की भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके बच्चों को आज एक दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है।...

चुनाव के चेहरे

एक गाना है- ‘ये मौसम भी गया वो मौसम भी गया, अब तो कहो मेरे सनम फिर कब मिलोगे, मिलेंगे जब हां हां बारिश...

बचपन के रंग

विष्णु नागर जिन दिनों हमारे साथी, मित्र, रिश्तेदार ठंड से ठिठुर रहे हैं, हम अपने दो पोतों के पास केरल में हैं, जहां ठंड...

अजमेर में रज़ा

हर साल अपनी पहचान में कोई न कोई ऐसा प्रसंग छोड़ जाता है, जिससे उसकी यादें, उसकी क्रमिकता हमारे भीतर बनी रहती हैं। बीते...

वह सुबह

दिल्ली के पंडारा रोड में मेरे घर के अगल-बगल अनेक बड़े-बड़े अफसर, मंत्री, सांसद रहते हैं, जो एक दूसरे से शायद ही कभी बोलते...