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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: कठपुतली बनते हम

विडंबना है कि न चाहते हुए भी हम अक्सर कठपुतली बन जाते हैं या बना दिए जाते हैं। निश्चित ही इसका कारण हममें विवेकशीलता...

दुनिया मेरे आगे: बदलती सूरत

देहरादून के कई सरकारी प्राथमिक स्कूलों की चारदिवारी, कमरों की दीवारों को देखने और वहां के बच्चों से मिलने, उनसे बातें करने के बाद...

दुनिया मेरे आगे: बोझ तले मासूम

इस सबके बीच मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा रही है कि वह अमर हो जाए, लेकिन सामान्य ज्ञान वाला व्यक्ति भी जानता है कि...

दुनिया मेरे आगे: समाज का शिक्षण

आजकल अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले हम लोग सोचते हैं कि बच्चों को अपने हिसाब से जीने दिया जाए। उसके जीवन में कोई हस्तक्षेप...

दुनिया मेरे आगे: काम के नाम पर

हो सके तो काम करते हुए भी हर रोज थोड़ी देर के लिए सही, कुछ किए बगैर रहना चाहिए। खालीपन की मासूमियत के साथ...

दुनिया मेरे आगे: वंचना का पाठ

जब राखी, दिवाली, होली, मकर संक्रांति या ग्रीष्मकाल की छुट्टियां होतीं तो कुछ बच्चे अपने घर जाने में दिलचस्पी दिखाते। ऐसे ही कुछ बच्चों...

दुनिया मेरे आगे: अपने हिस्से में से

अगर हम विचार करें कि ऐसे प्रकृति-प्रिय जीव, जिनका न कोई बैंक खाता है, न कल के अनाज का भंडारण और न कोई स्थायी...

दुनिया मेरे आगे: उत्सवधर्मिता की तलाश में

व्यष्टि की जगह समष्टि चिंतन का विचार आज लगभग बेमानी हो चुका है। यह शुद्ध बाजारी ताकतों का प्रभाव है। बाजार आज हमारे शयन...

दुनिया मेरे आगे: खेल बनाम सियासत

पंजाब में राजनीति भी बड़े शौक से खेली जाती है। अगर क्रिकेट संयोग है तो राजनीति मौके का। पर क्रिकेट की तरह राजनीति में...

दुनिया मेरे आगे: वक्त रुकता है कहां

शहर हों या देहात, आप घूम कर देख लीजिए। हरेक उत्सव में अतीत मुस्कराता हुआ आता है। वह मांगता कुछ नहीं, मगर हमसे सब...

दुनिया मेरे आगे: शहर में हाट

शहरों-महानगरों के मॉल बनाम कस्बाई और ग्रामीण इलाकों की हाट पर लंबी बहस हो सकती है। दरअसल, तेजी से होते शहरीकरण के बावजूद हमारा...

दुनिया मेरे आगे: स्वच्छता के सामने

आज देश में ‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’ एक व्यापक नारा बन चुका है जो आमतौर पर सभी जगहों पर बोला-पढ़ा और सुना जा रहा...

दुनिया मेरे आगे: बराबरी के हक में

नैसर्गिक रूप से एक महिला निषेचन के समय अपने गर्भ में लड़की या लड़का- दोनों के लिए समान अवसर प्रदान करती है। लेकिन पुरुष...

दुनिया मेरे आगे: जश्न के चेहरे

जन्मदिन मनाने का यह कौन-सा तरीका विकसित हो गया है? एक हमारा तरीका था, जब सुबह उठते ही माता-पिता के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त...

दुनिया मेरे आगे: भाषा बनाम दृष्टि

इतिहासकार उपलब्ध साक्ष्यों और अपनी विचारधारा से एक तरह का इतिहास रचते हैं। जो उसका कथ्य है, वही उसका कथ्य क्यों है, इस पर...

दुनिया मेरे आगे: संवेदनाओं का अकाल

कुछ समय पहले एक खबर पढ़ कर दिल बैठ गया। दिलो-दिमाग में कई सवालों ने घेरा डाल लिया। वक्त के साथ लोग इसे भी...

दुनिया मेरे आगे: भूख के बरक्स

आज हर दाने की कीमत पहचानने की जरूरत है। न केवल सरकार को अनाज भंडारण की दिशा में उचित कदम उठाने की जरूरत है,...

दुनिया मेरे आगे: सुविधा का सफर

वे दिन बहुत पीछे चले गए हैं, जब शहरों कस्बों में इक्के-तांगे दौड़ते थे और साइकिलों पर बड़े-बड़े डॉक्टर इंजीनियर भी शान से बैठे...