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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: भूलते भागते क्षण

दुकानों की बात करूं तो समोसे की कुछ दुकानें और खुल गर्इं, लेकिन समोसे की पुरानी दुकान ‘प्रेम हलवाई’ अब भी प्रसिद्ध है। मुझे...

दुनिया मेरे आगे: पढ़ाई के पैमाने

दूसरी मुश्किल यह है कि शिक्षक का मूल विषय कुछ और होता है और वह पढ़ाता कोई और विषय है। फिर इस क्रम में...

दुनिया मेरे आगे: बाजार के पांव

धूल-धक्कड़ भरे बाजार के वे दिन आज भी याद आते हैं। तिरपाल के भीतर बनी वे अस्थायी दुकानें और दूरदराज गांवों से आए वे...

दुनिया मेरे आगे: बचपन के बिना

आज के पढ़े-लिखे माता-पिता चाहते हैं कि उनका लाडला अच्छी तालीम हासिल कर शोहरत और दौलत का मालिक बने। लेकिन इसके लिए बच्चों का...

दुनिया मेरे आगे: अधिकार की गरिमा

दरअसल, समाज और इसकी परंपरा से जुड़े किसी एक ही मसले को देखने का नजरिया आमतौर पर व्यक्ति के आग्रहों से संचालित होता है।...

दुनिया मेरे आगेः बदलाव की बयार

महिलाओं के प्रति पुरुषों के व्यवहार के मसले पर ‘मी टू’ मुहिम में जिस तरह कई क्षेत्रों से जुड़े संभ्रांत और जानी-मानी हस्तियों पर...

दुनिया मेरे आगे: भरोसे की दुनिया

दरअसल, हम जिस समाज में रहते हैं, उसमें अगर अपने भीतर भरोसे के तार को अंतिम तौर पर तोड़ दें, तो शायद हमारा जीना...

दुनिया मेरे आगे: यथार्थ के पर्दे में

नब्बे के दशक का सिनेमा रोमांस और मारधाड़ से भरी फिल्मों के बीच कहीं अपनी राह तलाश रहा था। ऐसे में फूलन पर बनी...

दुनिया मेरे आगेः प्रकृति की गोद में

जब एक व्यक्ति घर से बाहर निकलता है और प्रकृति की शरण में अकेला ध्यानमग्न होता है तो वह साधारण नहीं होता। वह प्रकृति...

दुनिया मेरे आगेः बदलाव के ठौर

शहर के उतार-चढ़ाव के बीच भीड़ के बरक्स समाज में पसरे एकाकीपन को देखते-समझते वक्त गुजरता गया। लेकिन वह सहेली जब भी मिलती तो...

दुनिया मेरे आगेः जिंदगी के रंग

उम्र के साथ आदमी बदलता और उलझता जाता है। खुशियों की तलाश में सुविधाएं जुटाता है, पैसे इकट्ठा करता है, लग्जरी गाड़ियों में घूमता...

दुनिया मेरे आगेः सहजता का मार्ग

सरकार द्वारा दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में ‘हैप्पीनेस पाठ्यचर्या’ की शुरुआत इस दिशा में एक सार्थक पहल हो सकती है। इसके अंतर्गत रोजाना एक...

दुनिया मेरे आगे: जिजीविषा की जंग

हमारे समाज में ज्यादातर लोग स्त्री को लेकर आज भी एक कुत्सित मानसिकता का शिकार हैं। जबकि स्त्री की हैसियत से एक समाज की...

दुनिया मेरे आगे: सहेजनी होंगी बेचैनियां

वे स्त्रियां जो हर पुरुष से जुड़ी हैं, मां, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका और दोस्त बन कर। वे स्त्रियां जो जिंदगी से तो जुड़ी...

दुनिया मेरे आगे: वर्चस्व के विद्रूप

सबसे पहले और आखिरकार मानसिक स्तर पर दी गई स्वीकृति ही मनुष्य को व्यावहारिक स्वीकृति के लिए प्रेरित करती है। लेकिन अगर महिलाओं के...

दुनिया मेरे आगे: खेल बनाम काम

जिन बच्चों के अवलोकन को मैंने इस लेख का आधार बनाया है उनके खेल में समस्या समाधान, जोड़-तोड़ और सूझ आदि को देखा गया।...

दुनिया मेरे आगे: आधुनिकता की किरचें

हम मेट्रो ट्रेन में सवार हैं और अब बुलेट ट्रेन में सवार होने को लालायित हैं। फिर ये सफाई के औजारों के रूप में...

दुनिया मेरे आगे: सुबह के फूल

सुबह के फूलों की ओर निहारिये तो वे अपने रंग-रूप के सौंदर्य के साथ-साथ एक ताजगी का अहसास कराते हैं। सो, बहुतेरे लोग उनकी...