ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे

मनोविज्ञान की छांव

भविष्य की जरूरतों को देखते हुए स्कूल-कॉलेजों में पारंपरिक विषयों के अलावा कई नए विषय भी पढ़ाए जा रहे हैं। लेकिन एक जरूरी विषय...

दुनिया मेरे आगे: नेकी की राह

पौराणिक युग से लेकर आज तक महार्षि दधीचि, राजा शिवि, गुरु गोविंद सिंह, ईसा मसीह, सुकरात, महात्मा गांधी, बाबा आम्टे और प्रकाश आम्टे जैसे...

बेरोजगारी का दंश

कितने ताज्जुब की बात है कि हमारे देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास स्थायी और हमेशा के लिए कोई काम ही...

बदलते दृश्य

बदलते जमाने के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। समय का चक्र इंसान को बदलने में अहम भूमिका निभाता है, जिसका अहसास समय के...

धुएं का जहर

क्या आज पूरा विश्व प्रदूषण की मार नहीं झेल रहा है? देश की राजधानी दिल्ली विश्व भर में प्रदूषण को लेकर अपनी कितनी किरकिरी...

पितृसत्ता के पांव

दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन के रूप में मेट्रो की अहमियत किसी से छिपी नहीं है। खासतौर पर महिलाओं के लिए यह बेहद राहत भरा...

भाषा में हम

हम कौन हैं, यह इससे पता चलता है कि हम क्या सोचते हैं। और हम क्या सोचते हैं, यह हमारी अभिव्यक्ति से पता चलता...

दुनिया मेरे आगे: बच्चे मशीन नहीं

यह कथन कि ‘बच्चे मशीन नहीं हैं’ स्कूल संबंधी अन्य पक्षों पर भी सोचने पर मजबूर करता है। स्कूल में लगने वाले विषय आधारित...

दुनिया मेरे आगे: दोस्ती का दायरा

मीत, जिसे मित्र कहें, दोस्त या फिर यार कहें, सब इसके पर्याय हैं और यह संबंध जीवन का आधा अध्याय होता है। महान विद्वान...

दुनिया मेरे आगे: नाम की पहचान

नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद अपने पुश्तैनी कस्बे में रहने जाया जाए तो वहां की नई पीढ़ी द्वारा न पहचाना जाना स्वाभाविक है।...

दुनिया मेरे आगे: धारणाओं की धुरी

कुछ समय पहले राजस्थान के टोंक जिले के एक राजकीय स्कूल में बच्चों द्वारा आयोजित बाल मेले में भाग लेने का मौका मिला। आमतौर...

दुनिया मेरे आगे: सिमटते अखाड़े

सत्तर और अस्सी के दशक तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकतर गांव में अखाड़े होते थे। छोटे-बड़े सभी उम्र के कुश्ती के शौकीन लोग...

दुनिया मेरे आगे: आत्ममुग्धता का रोग

सही है कि मौत निश्चित है और वह आएगी ही। लेकिन मौत से पहले मौत आए और कारण महज आत्ममुग्धता बने तो दुख स्वाभाविक...

दुनिया मेरे आगे: बुझते दिए जलाने के लिए

पाकिस्तान के साथ सन 1965 से अब तक हुए युद्धों में हमें जितने मित्रों को अलविदा कहना पड़ा है, लगभग उतने ही हवाई दुर्घटनाओं...

दुनिया मेरे आगे: भाषा बनाम बोली

भाषाएं बोलियों से बनीं हैं। इसलिए भाषा और बोली के बीच गहरा संबंध है। इसके बावजूद दोनों अलग-अलग चीजें हैं। ध्वनि प्रकृति में उपलब्ध...

दुनिया मेरे आगे: वंचना की व्यवस्था

अगले दिन उन खेतों की ओर जाने का मैंने निश्चय किया। भाषा की कठिनाई की वजह से मैंने एक बच्चे को साथ ले लिया।...

दुनिया मेरे आगे: सर्दी में बेघर

ये बेखौफ और निर्भीक निर्धन लोग ठंड का पूरे जोर-शोर से मुकाबला करते हैं, लेकिन प्रकृति के निर्दय तांडव के आगे इनके हौसले मात...

दुनिया मेरे आगे: मोर की बोली

हमारे शास्त्रीय नृत्यों में उसकी चाल को स्थान भी मिला है। वह कविताओं में है। ‘दादुर मोर, पपीहे बोले’! वर्षा ऋतु का वर्णन उसके...