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दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: तैयारी के मोर्चे

हम सब जब भी ‘होमवर्क’ शब्द सुनते हैं तो स्कूल के दिन याद आ जाते हैं। स्कूल में अध्यापक के सहयोग के बाद दिया...

दुनिया मेरे आगे: युवा की राह

देश के युवाओं को जब भी मौका मिला है, उन्होंने तकनीक, उद्योग, कलाओं से लेकर अंतरिक्ष तक लगभग हर क्षेत्र में अपनी योग्यता के...

दुनिया मेरे आगे: शिल्पकारी के दुख

नई आर्थिकी के फायदे का दावा हमचाहे जितना करें, लेकिन ‘ब्रांड वैल्यू’ यानी नामी कंपनियों के सामानों की प्रचारित चकाचौंध के दौर ने स्थानीय...

दुनिया मेरे आगे: एक समांतर दुनिया

कोई भी राजनीतिक दल कभी इंसानों के साथ नहीं होते हैं। अगर वे कभी खड़े दिखते हैं तो उनके दलगत स्वार्थ उसके पीछे की...

दुनिया मेरे आगे: पारदर्शिता का तकाजा

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध ‘देवदार’ में कहा है कि ‘जरूरी नहीं है, जो लगे वह हो भी। लगने और होने में फर्क होता...

दुनिया मेरे आगे: कुछ न होने का सुख

पिछले कुछ समय से मैं यह समझने की कोशिश कर रहा था कि कोई नया या अनजान व्यक्ति हमसे बातचीत के दौरान हमारे बारे...

दुनिया मेरे आगे: दुख के स्तर

दिन के उदास शुरू होने में कोई अनोखी बात नहीं होती। न ही यह विलक्षण होता है कि कहीं से कोई बुरी खबर आ...

दुनिया मेरे आगे: भरोसे का संकट

कैसा दौर आ गया है कि अब हर पुरुष पर शक होने लगा है। खासतौर पर बच्चियों को लेकर किसी पर भरोसा नहीं होता।...

दुनिया मेरे आगे: विविधता का पाठ

बहुत सारे बच्चों के घर की भाषा हिंदी नहीं है। इस कारण बच्चों को अपने घर और स्कूल की भाषा में तालमेल बैठाने में...

दुनिया मेरे आगे: अपनों का दंश

कई अध्ययनों में ये तथ्य सामने आ चुके हैं कि बच्चियों के यौन शोषण के ज्यादातर मामलों में परिचित या परिवार के ही लोग...

दुनिया मेरे आगे: पूर्वग्रहों के रंग

बाजारवाद ने ही रंगों को अपने हिसाब से स्त्री-पुरुष के आधार पर बांटा हो। शायद इसीलिए कोई लड़की बड़ी होते ही गुलाबी रंग को...

दुनिया मेरे आगे: शिक्षा की दुकानें

दिल्ली के अलावा तमाम छोटे शहरों में भारी तादाद में चल रहे इस तरह के कोचिंग संस्थानों में दावों और नतीजों का हाल एक...

दुनिया मेरे आगे: कूड़े के पहाड़

आज जिस तेजी से शहरों में ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ के फार्मूले का प्रयोग किया जा रहा है, डर है कि यह संक्रमण की...

दुनिया मेरे आगे: सोच-विचार के गलियारे

सजगता की बिल्ली चौकन्नी होकर बैठी रहे तो विचार का चूहा बिल से ही नहीं निकलता।

दुनिया मेरे आगे: शब्द गढ़ते हैं

1937 के दौर में जिस तरह मृणाल का पति उसे बेंत से पीटता है उसके प्रेम संबंध के बारे में जान कर, आज 2018...

दुनिया मेरे आगे: नदी का जीवन

आज के संदर्भ में वह घटना आश्चर्यचकित करने वाली है, जब आपस के सगे-संबंधी तक कई बार एक दूसरे के नहीं होते। उसके बाद...

दुनिया मेरे आगे: संवेदना के धरातल

अब धीरे-धीरे सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी संवेदनात्मक बदलाव या ह्रास देखने-महसूस करने को आसानी से मिल जाता है। अब स्पष्ट हो गया है...

दुनिया मेरे आगे: साइकिल की सवारी

आज के समय में जब बच्चों के शौक में वीडियो गेम की दुनिया बचपन से ही उनके अंदर एक तेज रफ्तार मनोभावना को जन्म...