ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: चित्र भाषा

आदिम मानव पत्थरों पर चित्रों के माध्यम से अपने अंदर की भावनाएं और उद्गार प्रकट करते थे। दुनिया के किसी भी कोने में ऐसे चित्र गुफाओं में मिल जाते हैं।

Author Updated: January 18, 2021 5:40 AM
humanसांकेतिक फोटो।

हेमंत कुमार पारीक

हमारे देश की अनगिनत गुफाओं में शैलचित्रों की भरमार है। अजंता की गुफाएं इसका जीता-जागता प्रमाण हैं। उस दौर में भूख मिटाने का जरिया जंगली जानवरों को मार कर हासिल किया गया मांस हुआ करते थे। इसलिए ज्यादातर शैलचित्रों में आखेट करता मनुष्य दिखता है। जानवरों के साथ पक्षियों का चित्रण भी मिलता है। अब हम सबको ज्ञात है कि कालक्रम में धीरे-धीरे आदि मानव ने आग जलाना सीखा… खेती करना सीखा।

हजारों साल बाद आज वह इस अवस्था में पहुंचा है। अपने बुद्धि और कौशल से उसने इतना सारा तामझाम और सुख-सुविधाएं इकट्ठा कर ली हैं। मनुष्य ने उत्तरोत्तर अपनी भाषा विकसित की और उसके माध्यम से अपने विचारों का आदान-प्रदान किया। जब कुछ लिख कर वक्त को दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हुई तब ताड़-पत्रों पर लिखा। लिखने के लिए बाद में क्रमश: कागज, पेन, पैंसिल का आविष्कार हुआ।

जंगलों से निकल कर मनुष्य खुले मैदानों में बसने लगा और कालांतर में आलीशान मकान, बंगलों और महलों में रहने लगा। बड़े-बड़े ग्रंथों की रचना की और अपने बुद्धि बल से ऐसी-ऐसी तकनीकें विकसित की हैं कि उन्हें देख और समझ कर आज आश्चर्य होता है कि कभी हमारे पूर्वज गुफाआें और कंदराओं में रहते थे।

आज हमारे पास कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल और इंटरनेट है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से हम एक क्षण में संपर्क कर सकते हैं। मोबाइल के विस्तार ने नई-नई दिशाएं दी हैं। कमोबेश रोजमर्रा के कार्यों के लिए अब हमें घर से बाहर निकलने की जरूरत ही नहीं रही। बिजली, पानी आदि के बिल जमा करने के लिए लंबी-लंबी कतारों में लगने की आवश्यकता नहीं है। किसी को पैसा भेजना हो तो डाकघर जाने की जरूरत नहीं रही।

घर बैठे-मोबाइल से वे सारे काम कर सकते हैं जिन्हें करने में समय जाया होता है। हम अब घर में ही केंद्रित हो गए हैं और घर से बाहर कदम रखने की जरूरत नहीं रही। यह सब सुनने में अच्छा लगता है और बड़ी राहत मिलती है जब सारे काम मोबाइल की बटन दबाते ही महज कुछ पलों के भीतर संपन्न हो जाते हैं। आॅनलाइन तकनीक ने सारी सुख-सुविधाएं हमारे दरवाजे पर लाकर रख दी हैं। यह सब वैसे ही है जैसे कि कहानी और पुराने किस्सों में चिराग से जिन्न पैदा होता है और चिराग रगड़ने वाले से पूछता है कि क्या हुक्म है मेरे आका..! और फिर वह जरूरत के मुताबिक काम पूरा कर देता है।

बचपन के दिनों में यह सब एक कल्पना भर थी। मगर अब यथार्थ में एक चिराग यानी मोबाइल हमारे हाथ में है जो आज हमारी ताकत बन चुका है। कुछ वर्ष पहले की दीपावली के दृश्य याद करें। बाजार की बड़ी-बड़ी दुकानें याद आती हैं। दीपावली के महीने भर पहले बाजार में ग्रीटिंग कार्ड की दुकानें सज जाया करती थीं।

अपने प्रियजनों को शुभकामनाएं भेजने के लिए प्रेरक और किफायती कार्डों के लिए हम इस दुकान से उस दुकान पर भटकते रहते थे। फिर डाकघरों के वे बड़े-बड़े डिब्बे याद आते हैं, जिन पर देश की विभिन्न राजधानियों के स्टिकर चिपके रहते थे। वे पोस्टकार्ड, लिफाफे और शुभकामना कार्ड अब सिर्फ दीपावली की झाड़न-पोंछन में ही नजर आते हैं। तुड़े-मुड़े, रंग उड़े। और फोन के बेकार डिब्बे! तब हम कभी डायल घुमा कर फोन किया करते थे। वे आवाजें आज भी कानों में गूंजती हैं।

अब तो मानो भाषा ही बदल रही है। सुबह-सुबह मोबाइल पर एक-दो घंटे इसको-उसको मैसेज करना जरूरी होता गया है। इस सबमें ‘गुड मार्निंग’ या ‘गुड नाइट’ के आपसी बातचीत की कोई जगह नहीं है। बस काम निपटाना बचा है। शुभकामना कार्डों की जगह अब किसी भी त्योहार पर सुंदर से संदेश और एक ‘जीफी’ के साथ इतिश्री हो जाती है। बस मिलना-जुलना खत्म हो गया। आपस में एक दूसरे को हाथ जोड़ कर या किसी भी तरह का अभिनंदन खत्म! मोबाइल लिए घर में बैठे रहें। किताबों से तो जैसे रिश्ता टूट ही गया है। सारा काम आॅनलाइन।

बीते साल दीपावली के अवसर पर मैंने दिल्ली स्थित एक प्रकाशक मित्र से बात की। जवाब देते हुए वह निराश था। बोला कि किताबें छपी पड़ी हैं, लेकिन कोई लेने वाला नहीं दिखता। वक्त काटने के लिए कुछ लोग दुकान पर आकर बैठते हैं। अब दिन भर घर पर बैठ कर क्या होगा! यही हाल सार्वजनिक पुस्तकालयों के हैं।

इधर-उधर महंगी-महंगी किताबें ठुंसी पड़ी हैं, मगर कोई पढ़ने वाला नहीं है। न तो बच्चे हैं, न नवयुवक और न कोई बुजुर्ग! आज हम उस पुराने दौर में आ गए हैं, जब मानव पत्थरों पर अपना परिवेश, विचार और भावनाओं को अंकित करता था। उसी तरह आज हम मूक होकर मोबाइल के माध्यम से चित्रों के माध्यम से बात कर रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि कलात्मक और लच्छेदार भाषा की अभिव्यक्ति हम भूल जाएं और उसी पुराने युग में पहुंच जाएं जब मानव पत्थरों पर चित्रों से खुद को अभिव्यक्त करता था।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगेः युवा की राह
2 दुनिया मेरे आगे: ध्वनियों का जादू
3 दुनिया मेरे आगे: विरह-गीतों के पंछी
यह पढ़ा क्या?
X