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संवेदना के सूखते सरोवर

समाजशास्त्र की सफल अवधारणा है कि समाज की लघुतम इकाई परिवार संचालन का मूल ऊर्जा स्रोत संवेदना रही है।

सांकेतिक फोटो।

समाजशास्त्र की सफल अवधारणा है कि समाज की लघुतम इकाई परिवार संचालन का मूल ऊर्जा स्रोत संवेदना रही है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक यह संजीवनी के रूप में सहयोगी बना रहा है। इस अदृश्य तत्त्व ने युगों से सामाजिक ताने-बाने को बांध कर रखा है और जब कभी किसी भी कारण से इसकी डोर कमजोर हुई है तो सामूहिक संगठित परिवेश ने इसे सूझ-बूझ के सहारे फिर रास्ते पर ला खड़ा किया है।

हमारे पूर्वजों के पास शैक्षणिक डिग्री नहीं थी, लेकिन उनके जीवन की आचार संहिताओं में वे सभी गुण मौजूद थे, जिससे समाज में शांति, भाईचारे, सद्भाव और सहयोग की वर्षा हुआ करती थी। इन क्रियाओं के पीछे सबसे मजबूत और प्रभावी मंत्र हुआ करता था उनके हृदय की विरलता और तरलता जो संवेदनाओं के सागर में सदा हिलोरें लिया करती थी। कालांतर में जीवन जीने की कृत्रिम कला, तथाकथित प्रगतिवाद, अतिशय भौतिकवाद ने संजोए मूल्यों की मात्रा में क्षरण की परिस्थिति ला दी और हम असीमित संसाधनों के रहते हुए भी आज अकेलेपन के उदासी दौर में आ गए हैं, जबकि एक वर्ष से जारी महामारी ने सब कुछ तहस नहस कर दिया है।

बचपन की स्मृति है कि हमारे दस से पंद्र्रह लोगों के परिवार में एक आंगन में एक ही चूल्हा जला करता था और उसी पर सभी का भोजन तैयार होता था। चूल्हों का अलग होना ही संवेदनाओं में दरार का कारण बना। हालांकि ग्रामीण स्तर से शहरी पलायन का रुख होना जीवन की कई मूलभूत आवश्यकताओं की अनिवार्यता भी थी। हर शाम गांव के प्रत्येक टोले में स्त्री-पुरुष की अलग-अलग गोष्ठी और उसमें दिनचर्या की चर्चा, पड़ोस में किसी बीमार व्यक्ति के बारे में पूछताछ, किसी के द्वार आए अतिथि की सेवा भक्ति में साधन का जुगाड़, शादी-विवाह में सहयोग की पेशकश जैसे अनगिनत मुद्दे पूरे ग्रामीण परिवेश को एकसूत्र में पिरो कर रखते थे। पड़ोस में हुई कोई शोक की घटना में बारी-बारी से दूसरे घर से तीन दिनों तक पूरे परिवार का जलपान और भोजन का प्रबंध संवेदनाओं की धरातल पर खरी उतरती थी।

अब इसमें कमी देखी जा रही है, लेकिन नगरीय संस्कृति की अपेक्षा हमारा गांव आज भी संपदाओं की दरिद्रता के बावजूद संवेदनाओं की प्रचुरता से लैस है। आपसी समन्वय के कारण ही ग्रामीण स्तर पर ही छोटे-मोटे झगड़े और विवाद का हल निकाल लिया जाता है। अनुभव है कि नगर के किसी व्यस्त मार्ग या चौक-चौराहे पर वाहन दुर्घटना के शिकार किसी पीड़ित को महंगी गाड़ियों में चलने वाले अधिकतर महाशय उसे उसी हालत में छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।

आखिर हमारी विरासतीय संवेदना आज कहां लुप्त हो गई, हमारे कर्तव्य क्यों अधिक आत्मकेंद्रित हो गए और हमारी भावनाएं क्रूर नियति की क्यों भेंट चढ़ गई? कभी-कभी विवशता के कारण हम संवेदनाओं को वितरित करने का कृपण स्वांग रचते हैं, लेकिन खुद संकट के दौर से गुजरने की नौबत आने पर मदद पाने के लिए अतिशय आकांक्षी बने रहने की लोभ-लीला में तल्लीन हो जाते हैं। विचारणीय कथ्य है- ‘कर भला हो भला’ के मर्म पर ही हम संवेदनाओं की सीढ़ी चढ़ कर सेवा और सहयोग के लक्ष्य को स्पर्श कर पाते हैं। समाज में व्याप्त स्वार्थी और अवसरवादी तत्त्वों ने संवेदनाओं की गरिमा को अपने पंजे में जकड़ लिया है।

बचपन में जिन साथियों के साथ खेलकूद, धमा-चौकड़ी, क्षणिक झगड़े, मनमुटाव का दैनिक क्रम चला करता था, कालांतर में इन कार्यकलापों के बादल छंटने से बीते दिनों की बाल सुलभ चपलता सिर्फ यादों के बंद पिटारे में कैद-सा हो जाता है। नौकरी मिल जाने पर बचपन के कुछ मित्रों के साथ कुछ दिनों तक तो संबंध के धागे जुड़े रहते हैं, जबकि काल के प्रवाह में हम संवेदना शून्य हो उनकी कभी खोज खबर नहीं लेते, जिनके साथ कभी खेल के मैदान में धक्का-मुक्की, पतंग उड़ाने में बहस, मिठाई खाने में छीना-झपटी की मनुहारी घटनाएं हुआ करती थीं।

यह हमारी परिस्थितिगत कारणों का आंशिक हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह भी स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि हम संवेदनाओं को प्रकट करने में कंजूसी ज्यादा कर बैठे हैं। कोरोना कहर में अपने कुछ मित्र काल के गाल में समा गए। नियम-कायदों के तहत दिवंगत मित्र के शोक संतप्त परिवार से मिलने की भी मनाही थी। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों या फोन से ही पीड़ित परिवार को धैर्य देने की औपचारिकता हम सबों में से कुछ ने की, जबकि अनेक मित्र ने तो सिर्फ मौन धारण करना ही उचित समझा। संवेदना क्षरण का इससे क्रूर उदाहरण नहीं मिलता।

वर्तमान महामारी की चीत्कार में संवेदना और सहानुभूति, दो ऐसे संजीवनी स्रोत हैं, जिससे किसी के प्राण-हरण को वापस नहीं किया जा सकता, लेकिन विपत्ति में पड़े शोक संतप्त परिवारजनों को हम उनके बेसुध और विह्वल मन को संवेदनारूपी चंदन लेप से उनके दुख को कम कर सकते हैं। अगर हम किसी परिजन के लिए संवेदनशील नहीं हो सके तो शायद हम भी किसी की संवेदना के मोहताज ही बन बैठेंगे। आज के विपदा पल में हम मात्र अपनी करुणा, दया, सहयोग की त्रिवेणी में डुबकी लगा कर ही संवेदना के सूखते सरोवर को बचा सकते हैं।

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