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विचारों की उपज हमारा अस्तित्व

हमारे द्वारा अनुभव किया जाने वाला हर एक विचार मस्तिष्क में एक रासायनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, जिससे एक भावना उपजती है।

मनीष कुमार चौधरी

लेखक अर्ल नाइटिंगेल ने कहा है, ‘हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं।’ यानी हम अपने विचारों की उपज हैं। जैसा सोचेंगे, वैसा ही बन जाएंगे। हमारे मन में प्रतिदिन पांच हजार से साठ हजार विचार आते हैं। ये विचार मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्थितियों के असंख्य निर्माण कर सकते हैं। हमारा दिमाग गणना की गई जानकारी के द्वारपाल के रूप में कार्य करता है। यह निर्धारित करता है कि हम तक पहुंचने वाली कौन-सी जानकारी प्रासंगिक है और उस पर हमारा मानसिक ध्यान किस तरह काम करेगा। वे विचार बहुत आसानी से विश्वास बन सकते हैं, जो हमारी भावनाओं को सकारात्मक या नकारात्मक तरीके से प्रभावित करते हैं।

हमारे द्वारा अनुभव किया जाने वाला हर एक विचार मस्तिष्क में एक रासायनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, जिससे एक भावना उपजती है। जैसे ही हम इस विचार के साथ जुड़ते हैं, एक नया ‘सर्किट’ या परिधि बनता है जिसके जरिए शरीर को एक संकेत मिलता है और हम एक निश्चित तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। जितना अधिक हम इस तरीके को दोहराते हैं, उतना ही यह हमारे दिमाग में रिसता जाता है और एक आदत बन जाती है। यानी हमारे विचार हमारी दृष्टि को आकार देते हैं। हम वही देखते हैं जो हम देखना चुनते हैं।

हमारे व्यवहार और कार्य करने के तरीके से परिभाषित हो जाता है कि हम कौन हैं और जीवन में क्या अनुभव करते हैं। इसलिए हम जो सोचते हैं उसके बारे में बहुत सावधान रहने की जरूरत है। कवि और दार्शनिक राल्फ वाल्डो इमर्सन ने लिखा है, ‘एक आदमी वह है जो वह दिन भर सोचता है।’ अच्छी बात यह है कि आप जो सोचते हैं, उस पर आपका नियंत्रण होता है। किसी और के पास यह शक्ति नहीं है, जब तक कि आप इसे नहीं देते। आप अपने विचारों के संवाहक हैं।

यों देखा जाए तो विचार अपने आप में कोई शक्ति नहीं रखते। जब हम सक्रिय रूप से अपना ध्यान उनमें लगाते हैं, तभी वे वास्तविक नजर आने लगते हैं। जब हम विशिष्ट विचारों के साथ जुड़ते हैं, तो उन भावनाओं को महसूस करना शुरू कर देते हैं जो इन विचारों से उत्पन्न हुई थीं। अगर नियमित रूप से इस विचार से जुड़ते हैं कि हम नाकारा हैं और इस पर अधिक ध्यान देते हैं तो खुद को निराश, बेकार और शायद हताश भी महसूस करने लगेंगे। इसलिए कि हमारे विचार एक भावना उत्पन्न करते हैं, जिस पर आप काम करते हैं। जैसे ही हम अपने विचार बदलते हैं, भावनाएं बदल जाती हैं। तब हमारी क्रिया भी बदल जाती है और परिणाम भिन्न आने लगते हैं।

तंत्रिका तंत्र को वैज्ञानिकों या न्यूरोसाइंटिस्टों ने बताया है कि हमारे अधिकांश निर्णय, कार्य, भावनाएं और व्यवहार मस्तिष्क की पनचानबे फीसद गतिविधियों पर निर्भर करते हैं, जो हमारी सचेत जागरूकता से परे हैं। इसका अर्थ है कि जीवन का पनचानबे फीसद हमारे अवचेतन मन में एक तरह की योजना या फिर प्रोग्रामिंग से आता है। वे अवचेतन व्यवहार ही निर्धारित पैमाना या पैटर्न बन जाते हैं और हमारे जीवन को चलाते हैं। विचार दिमाग में चल रहे विचारों की एक अंतहीन धारा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। वे तब तक शक्तिहीन होते हैं, जब तक आप उन पर चिपके रहने का निर्णय नहीं लेते हैं।

विचारक मैक्सवेल माल्ट्स ने अपनी किताब ‘साइको-साइबरनेटिक्स’ में एक महत्त्वपूर्ण बात लिखी है- ‘हमारी भीतरी दुनिया (हमारा रवैया और विचार) ही हमारी बाहरी दुनिया (हमारे कार्य और व्यवहार) को बनाते हैं।’ यानी सारा दारोमदार हमारी अपनी सोच और विचारों पर है कि उसे हम कैसे नियंत्रित करते हैं! जब भी कोई विचार दिमाग में आए, तो उस वक्त अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या यह विचार मेरे लिए स्वस्थ और फायदेमंद है! अगर विचार हमारे लिए लाभकारी नहीं है तो हल्का-सा मुस्कराएं और जैसे श्वास छोड़ते हैं, धीरे-से उस विचार को जाने दें। अब हमारे पास विकल्प है कि इसके स्थान पर एक अधिक उत्थानकारी विचार चुनें, जो हमारे लिए बेहतर सिद्ध होगा। हम केवल वही नियंत्रित करने में सक्षम हैं जो खुद को सोचने और याद रखने की अनुमति देते हैं। जब भी अनुपयोगी सोच मौजूद हो और भावनात्मक व शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़े तो इस प्रक्रिया को दोहराएं।

स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि ‘हम वही हैं जो हमारे विचारों ने हमें बनाया है। इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं। विचार रहते हैं। वे दूर तक यात्रा करते हैं।’ कोई भी चीज हमें उतना नुकसान नहीं पहुंचा सकती, जितने अनियंत्रित विचार। हम अपना सारा समय, ऊर्जा और पैसा बाहर के अपने अनुभव को बदलने की कोशिश में खर्च करते हैं। यह महसूस नहीं करते कि पूरी चीज को अंदर से पेश किया जा रहा है। अपने मन के बगीचे से खरपतवार हटाएं और स्वस्थ विचार बोएं, क्योंकि विचार ही हमारे जीवन का निर्माण करेंगे।

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