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दुनिया मेरे आगे: सपनों की जमीन

सवाल है कि क्या आजादी के दिन राष्ट्रध्वज फहरा लेने, गांधी, सुभाष, नेहरू और पटेल आदि स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों के चित्रों पर माल्यार्पण कर और लाउडस्पीकर के जरिए मुहल्ले में देशभक्ति गीत बजा लेने भर को ही सच्ची आजादी माना जा सकता है?

शान से लहराता हमारा राष्ट्रीय ध्वज उत्साहित वीर जवान।

शंकर जालान

हर साल आजादी के दिन राष्ट्रध्वज लहराता देख कर मन जितना गदगद होता है, उसे लफ्जों में बयान नहीं किया जा सकता। जाहिर है, एक बार फिर इस दिन जगह-जगह तिरंगा फहराया जा रहा होगा, राष्ट्रीय गीत बजाए जा रहे होंगे। लोग अपने मासूम बच्चों के हाथ में तिरंगा थमा कर खुद भी खुश होंगे और उन्हें भी खुशी का अहसास कराएंगे या दिलाएंगे, जो तिरंगा यानी राष्ट्रध्वज का महत्त्व और मतलब तो क्या ही समझ पाएंगे, उसे ठीक से संभाल या पकड़ भी नहीं पाएंगे। लेकिन यही समझने की प्रक्रिया भी होती है। हो सकता है कि कुछ लोग अनजाने में ही तिरंगे की जरूरी कद्र नहीं कर पाते हैं, इसके बावजूद कुछ स्थानों राष्ट्रध्वज के साथ जैसा लापरवाही भरा सुलूक किया जाता है, उसे देख कर कलेजा मुंह को आता है। कोई इसे मेरे अति भावुकता के रूप में देख सकता है, लेकिन राष्ट्रीय झंडे को लेकर यह मेरा आग्रह है और इसे लेकर मुझे संतोष होता है।

यही वजह है कि कई बार मुझे लगता है कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जिस तरह के आयोजन होते हैं, उसमें भावनाएं कम और औपचारिकता ज्यादा होती है। आजादी के पर्व को हर तरह से मनाने की ‘आजादी’ होनी चाहिए, शायद लोग ऐसा ही मानते हैं। लेकिन इस दिवस को लेकर मन में जो कद्र होनी चाहिए, वह देखने में नहीं आता। सवाल है कि क्या आजादी के दिन राष्ट्रध्वज फहरा लेने, गांधी, सुभाष, नेहरू और पटेल आदि स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों के चित्रों पर माल्यार्पण कर और लाउडस्पीकर के जरिए मुहल्ले में देशभक्ति गीत बजा लेने भर को ही सच्ची आजादी माना जा सकता है?

इस पर जरा ध्यान से सोचने, समझने और मनन करने की जरूरत है और खुद से यह सवाल पूछने की भी कि क्या वाकई में हम और हमारा मुल्क आजादी के सपने और उसके मूल्यों को जमीन पर पूरा करने की ओर अग्रसर हैं! क्या हर कोई चैन की सांस ले रहा है? क्या हर किसी की बुनियादी जरूरतें पूरी हो रही हैं? क्या बेगुनाहों के साथ इंसाफ हो रहा है? क्या वास्तविक गुनाहगारों को सजा मिल रही है? क्या गरीबों को उनका हक और मजदूरों को उचित मजदूरी मिल रही है? क्या महिलाओं के अधिकार और मान-सम्मान की पर्याप्त रक्षा हो रही है? क्या हर बच्चे को शिक्षा मिल रही है? क्या युवकों को रोजगार मिल रहा है? क्या अमीर हो या गरीब, हर तबके के मरीज को बराबर गुणवत्ता का उपचार मिल रहा है?

ऐसे न जाने कितने ‘क्या’ और अनगिनत सवाल हैं, जिसका सीधा-सा जवाब खोजने निकलते हैं तो कई बार निराशा हाथ लगती है। यह स्थिति तब है जब आजादी के सात दशक बाद के सालों में इस दौरान देश में कई बार राजनीति उथल-पुथल हुआ, क्रांति आई, कई सरकारें आईं और गईं। लेकिन आज भी सैकड़ों गांव, हजारों कस्बे और लाखों लोग ऐसे होंगे जो शुद्ध पेयजल और भोजन के लिए तरसने को मजबूर हैं।

न जाने कितने दिन और कितने साल उन्हें ऐसी ही कशमकश की हालत में रहना होगा!
इसे विडंबना कहें या नियति या अमीरी की खुशकिस्मती कहें या गरीबी की बदकिस्मती, सच यह है कि इतने सालों में देश में अमीर और ज्यादा अमीर ही होते जा रहे हैं और गरीब की हालत और ज्यादा पस्त होती जा रही है। क्या यह सच नहीं है कि आज भी हमारे देश में लाखों की संख्या में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं? जिन बच्चों को स्कूल में होना चाहिए, वे कहीं मजदूरी कर रहे हैं या किसी ढाबे में जूठे बर्तन धो रहे हैं?

किसी भी पर्व-त्योहार या राष्ट्रीय जश्न के मौके पर देखें, अमीरों के बच्चे रंग-बिरंगे कपड़ों में खुशियां मनाते रहे हैं, वहीं गरीब के बच्चे कहीं स्कूल के पास कूड़ा बीन रहे होते हैं। बहुत-से ऐसे स्कूल मिल जाएंगे, जहां एक तरफ कुछ बच्चे स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश कर रहे होते है, वहीं स्कूल के प्रवेश द्वार के पास कुछ बच्चे अपने हाथों में कूड़े की टोकरी लिए अंदर कार्यक्रम पेश कर रहे बच्चों को झांक रहे होते हैं। आखिर ये गरीब बच्चे आजादी को कैसे देखें?

जहां गरीब आदमी एक लीटर किरासन तेल के लिए तरस रहा हो और अमीरों के यहां गैस के कई सिलेंडर भरे पड़े हों, क्या हम इसे व्यवस्था का न्याय कह सकते हैं? जब भूख से कई लोग मर जाते हैं, किसानों की खुदकुशी के मामले छिपने नहीं हैं, प्रसव के दौरान मामूली दवा की कमी से कई महिलाओं की मौत हो जाती है, लाखों लोग धरती को बिछौना और आसमान को चादर समझ कर जिंदगी भर फुटपाथ पर सोने को मजबूर हों, तो ऐसे में क्या यह कहना उचित नहीं है कि आजादी के आंदोलन के दौरान जो सपने हमारे नायकों ने देखे थे, वह हासिल करना अभी बाकी है? बदलाव की बढ़ते कदम के बावजूद अगर इस त्रासद तस्वीर में वास्तविक बदलाव नहीं आता है, बराबरी और इंसाफ सुनिश्चित नहीं किया जाता है, तो हम सब कुछ अच्छा होने के दावों पर सवाल उठाने पर मजबूर होते रहेंगे।

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