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दुनिया मेरे आगे: दान का सुख

हमारे पूर्वज शुरू से ही हमारी जीवनशैली को बेहतर बनाने के लिए ज्ञान की अनगिनत बातें बताते रहे हैं। अनेक बोधकथाएं ऐसी हैं, जिन्हें पढ़ कर हमें प्रेरणा मिलती है।

Breadसांकेतिक फोटो।

गिरीश पंकज

वे सब भले ही काल्पनिक कथाएं हैं, लेकिन उनके निहितार्थ महत्त्वपूर्ण हैं। अनेक श्लोक, दोहे, चौपाइयों के सृजन के पीछे लक्ष्य लोकमंगल, लोक कल्याण रहा। जब लोग इन्हें पढ़ते हैं, तो मन में बेहतर काम करने का भाव जाग्रत होता है। जैसे दान को लेकर असंख्य कथाएं प्रचलित हैं। जो लोग इन कथाओं को आत्मसात कर लेते हैं, वे अपने जीवन में बहुत अधिक संपन्न भले न हों, तब भी दान देने का पुण्य कार्य करते रहते हैं।

सिख समाज में ‘दसवंद’, मुस्लिम समाज में ‘जकात’ और हिंदू समाज में दान की बात कही गई है। ‘दान दिए धन ना घटे’, ऐसा समझाया जाता है। जिन्हें बात समझ में नहीं आती, वे जीवनभर संचय करते रहते हैं, फिर एक दिन सब कुछ छोड़ कर खाली हाथ चले जाते हैं।

दान के लिए इसलिए भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से संपन्न होता है, उसके पास दौलत छप्पर फाड़ कर नहीं आती। वह इसी समाज से सब कुछ अर्जित करता है। जिस समाज के कारण हम संपन्न बने, उसके लिए अगर किंचित धन समर्पित कर भी दिया जाए, तो इसमें कोई बुराई नहीं। मगर कुछ लोग कृपण होते हैं।

दान के बारे में मेरा क्या, हर किसी का यह अनुभव रहा है कि किसी सुपात्र को दान देने के बाद परम सुख की प्राप्ति होती है। हम जैसे मध्यम वर्ग के लोग जब किसी की आर्थिक सहायता करते हैं, तो प्रसन्नता का अनुभव होता है। आप जब किसी वंचित की मदद करें, तो उस दिन आपके भीतर अनजाने में ही एक बेहतर मनुष्य आकार लेने लगता है।

अगर यह क्रम निरंतर बना रहे, तो ऐसा व्यक्ति सामान्य व्यक्ति नहीं रह जाता। वह विशिष्ट मानव के रूप में अनायास ही देखा जाने लगता है। हम भारत सहित विश्व के ऐसे कुछ दानदाताओं को जानते हैं, जो खरबपति हैं और जिन्होंने अपनी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा लोक-कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने महसूस किया कि जो कुछ उनके पास है, वह इसी समाज की पूंजी है। जिस समाज ने हमें इतना वैभव प्रदान किया, क्या हम उस समाज को अपने हिस्से का एकांश भी प्रदान नहीं कर सकते! इनकी चर्चा खूब होती है। मगर जो सिर्फ अर्जित ही किए जाते हैं, लोक कल्याण का कोई काम नहीं करते, उनकी कहीं कोई प्रतिष्ठा नहीं रहती।

मैं अपने शहर के एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूं जो सामान्य-सी नौकरी करता है, मगर उसके मन में गरीबों के प्रति बड़ा दया-भाव है। वह मूक जीवों से भी बहुत लगाव रखता है। वह वृद्धाश्रम में जाकर जरूरतमंदों को उपयोग में आने वाले पुराने वस्त्र और कुछ पैसे भी दान करता है।

अपने और परिवार के लोगों के जन्मदिन के अवसर पर वहां जाकर सबको विशेष भोजन करवाता है। उसके सामने बड़े-बड़े धनपति फीके पड़ जाते हैं, क्योंकि वह अपनी हैसियत से ज्यादा दान करता है।

यह भी अजीब विसंगति है कि उसके घर के पास ही एक बहुत बड़े सेठजी रहते हैं, लेकिन न जाने क्यों, वे इस मध्यमवर्गीय व्यक्ति के मुकाबले काफी गरीब नजर आते हैं। भले ही वे अपने घर की पार्टियों में दौलत उड़ा देते हैं, दिवाली पर खूब पटाखे फोड़ते हैं, जबर्दस्त रौशनी करते हैं, दुनिया भर की सैर करके लाखों रुपए उड़ा देते हैं।

मगर उनके बारे में कभी किसी ने यह नहीं सुना कि उन्होंने किसी बाल आश्रम को या वृद्धाश्रम को कुछ दान किया हो। उनके दरवाजे पर जो लोग कुछ उम्मीद लेकर आते हैं, उन्हें भी वह डांट-फटकार कर भगा देते हैं?

मैं समझ नहीं पाता कि कुछ लोग ऐसे क्यों होते हैं। आखिर ऐसे लोग किस गुरूर में जीते हैं। समाज में रहते हुए भी समाज से कट कर रहना इनको कैसे सुहाता है? क्या इन लोगों को बचपन में कभी दान के सुख की कोई भी कथा नहीं सुनाई गई।

क्या इन्हें परमार्थ की कुछ बातें नहीं बताई गर्इं? आखिर क्यों कोई व्यक्ति समाज में रहते हुए भी समाज के बारे में नहीं सोचता? क्यों हमारे भीतर यह बोध नहीं आता कि हमारे पास हमारी जरूरतों और सुविधा से ज्यादा जो भी है, वह कहीं न कहीं समाज से अतिरिक्त वसूला गया ही होता है?

एक दौर था जब हमें शिक्षा दी जाती थी कि भोजन करने से पहले गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भी एक कौर निकाल कर रखना चाहिए। जब हम गाय और कुत्ते के लिए भी अपने भोजन का एक अंश निकाल सकते हैं, तो क्यों नहीं अपनी कमाई का एक अंश गरीब लोगों की सेवा में भी लगा सकते हैं? जो इस उदात्त भावना को आत्मसात कर लेते हैं।

वे निम्न मध्यवर्गीय होने के बावजूद यहां-वहां दान करते रहते हैं। मगर जो हृदय से पत्थर हो चुके हैं, वे धनवान होने के बावजूद फूटी कौड़ी का दान नहीं करते। ये वे लोग हैं, जो भौतिक सुख अर्जित करते रहते हैं, लेकिन आत्मा के परमानंद से वंचित हैं।

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