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दुनिया मेरे आगेः एक नई परवाज

भारतीय सशस्त्र बलों में युद्ध अभियान में शामिल होना महिलाओं का हमेशा एक सपना रहा है। इसके लिए उन्होंने एक लंबा संघर्ष किया है, तब जाकर उनके इस ख्वाब की ताबीर होने वाली है।

Author March 17, 2016 2:36 AM
(File Photo)

भारतीय सशस्त्र बलों में युद्ध अभियान में शामिल होना महिलाओं का हमेशा एक सपना रहा है। इसके लिए उन्होंने एक लंबा संघर्ष किया है, तब जाकर उनके इस ख्वाब की ताबीर होने वाली है। इस साल अठारह जून तक तीन कैडेट वाला महिला लड़ाकू पायलटों का पहला बैच भारतीय वायुसेना के लिए प्रशिक्षित हो जाएगा। इस बैच में अवनी चतुर्वेदी, मोहना सिंह और भावना कंठ शामिल हैं। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में एयर चीफ मार्शल अरुप राहा ने इस बात का एलान करते हुए कहा कि प्रशिक्षण पूरा हो जाने के बाद ये महिला लड़ाकू पायलट अपने पुरुष सहकर्मियों के समकक्ष होंगी और अठारह जून को पासिंग आउट परेड में हिस्सा लेंगी।

अलबत्ता भारतीय वायुसेना एकेडमी से पास होने के बाद भी उन्हें लड़ाकू बेड़े में शामिल किए जाने से पहले छह महीने का एक और विशेष प्रशिक्षण हासिल करना होगा। इस प्रशिक्षण में महिला लड़ाकू पायलटों को हॉक विमान से एक सौ पैंतालीस घंटे की उड़ान भरनी होगी। यह सबसे तेज युद्धक विमान है। पूरे प्रशिक्षण के दौरान उन्हें कुल मिला कर दो सौ सत्तासी घंटे की उड़ान भरनी होगी, तब जाकर महिला लड़ाकू पायलट का कमीशन दिया जाएगा। भारतीय सेना की तीनों कमानों में वायुसेना पहली कमान होगी, जिसमें महिलाओं को कॉम्बेट अभियान में शामिल किया जाएगा।

पिछले साल अक्तूबर में महिलाओं को लड़ाकू पायलट के रूप में शामिल करने की रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के बाद वायु सेना का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं, जहां महिलाओं की नुमाइंदगी न हो। इससे पहले भारतीय वायुसेना महिलाओं को वायुसेना की सात विंगों, मसलन ट्रांसपोर्ट और हेलीकॉप्टर बेड़े, नेविगेशन, एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग, प्रशासन, लॉजिस्टिक्स, एकाउंट्स, शिक्षा और मौसम विज्ञान शाखाओं में ही भर्ती होने का मौका देती थी। वायुसेना ने महिलाओं के लिए अपने दरवाजे 1990 के दशक की शुरुआत में खोले थे। तब से लेकर अब तक महिलाओं ने एक लंबा सफर तय किया है।

वायुसेना में फिलहाल डेढ़ हजार महिला अधिकारी हैं, जिनमें से चौरानवे पायलट और चौदह नेविगेटर हैं। महिलाओं की हिस्सेदारी के लिहाज से देखें तो यह 8.5 फीसद है। पर यह संख्या तीनों सशस्त्र बलों में सबसे ज्यादा है। वायुसेना दिवस की तिरासीवीं वर्षगांठ के मौके पर वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अरुप राहा ने जब यह बात कही थी कि ‘वायुसेना, महिला पायलटों को लड़ाकू विमान उड़ाने की जिम्मेदारी सौंपने के बारे में विचार कर रही है, तब किसी को शायद यह अंदाजा नहीं था कि यह विचार इतनी जल्दी अमल में आ जाएगा।

दरअसल, आम सोच यह रही है कि लड़ाकू विमान उड़ाने के मामले में महिलाओं को अपनी शारीरिक फिटनेस के चलते कुछ समस्याएं आड़े आ सकती हैं। सही है कि लड़ाकू विमान उड़ाने के लिए पायलट की शारीरिक क्षमता बेहतर होनी चाहिए, जिससे वे तमाम खतरों से अच्छी तरह से जूझ सकें। वहीं उड़ान कौशल में भी उसे हर तरह से दक्ष होना जरूरी है। जाहिर है, इस तरह की शारीरिक फिटनेस, मानसिक क्षमता और एकाग्रता हासिल करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं। महिलाओं ने जैसे अपने आपको विभिन्न मोर्चों पर साबित किया हैं, यहां भी करेंगी।

उन्हें सेना में लड़ाकू भूमिका महज इस आधार पर न देना कि वे महिलाएं हैं, यह सोच ही गलत है। सच यह है कि लैंगिक भेदभाव की वजह से ही महिलाएं पुरुषों से पीछे छूट गर्इं, वरना उनकी काबिलियत में कहीं कोई कमी नहीं। महिला फाइटर पायलट ने फ्लाइंग स्ट्रीम का जो इम्तहान पास किया है, उसे देने का मौका जिंदगी में सिर्फ एक बार मिलता है। इस बार एकेडमी की फ्लाइंग स्ट्रीम के इम्तहान में एक सौ बीस पायलट बैठे थे, जिसमें से सिर्फ सैंतीस ने यह परीक्षा पास की। यानी तीन महिलाओं के अलावा बाकी पुरुष पायलट हैं।

भारतीय सेना में पहले महिलाओं को स्थायी कमीशन भी नहीं दिया जाता था। वहां उनकी सेवाएं सीमित थीं। महिलाओं को केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन ही मिलता था और उनकी तैनाती प्रशासनिक, चिकित्सा और शैक्षणिक विभागों में ही की जाती थी। शार्ट टर्म कमीशन के बाद उन्हें जबरन सेवानिवृत्त कर दिया जाता था। लेकिन 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद पहले उन्हें थलसेना में स्थायी कमीशन मिला, उसके कुछ समय बाद वायुसेना में भी यह उपलब्धि हासिल हो गई।

स्थायी कमीशन हासिल करने के बाद वायुसेना में अब ऐसी महिला पायलट हैं, जो ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर उड़ाती हैं। कुछ महिला पायलटों ने तो लद्दाख के दौलतबेग ओल्डी से एएन-32 जैसा बड़ा एयरक्राफ्ट भी उड़ाया है। लेकिन इसके बाद भी जंग के हालात में उन्हें लड़ाई के मोर्चे पर नहीं भेजा जाता था। अब वक्त आ गया है कि थल सेना और नौसेना में भी महिलाओं को कॉम्बेट (लड़ाकू) अभियान की जिम्मेदारी मिले। पुरुषों की तरह महिलाएं भी सेना के हर क्षेत्र में काम कर सकती हैं, बस जरूरत उन्हें ज्यादा से ज्यादा मौका देने की है।

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