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दुनिया मेरे आगेः पानी के बिंब

पानी के बारे में सोचने पर दो बिंब ज्यादा मुखर होते हैं। एक, सूखे से संबंधित और दूसरा, बाढ़ वाला।
Author April 15, 2017 04:40 am

आलोक रंजन

पानी के बारे में सोचने पर दो बिंब ज्यादा मुखर होते हैं। एक, सूखे से संबंधित और दूसरा, बाढ़ वाला। एक तरफ नल की टोंटी से एक बूंद गिरती दिखाई जाती है, खेत में फटी दरारें होती हैं, तो दूसरी तरफ पानी ही पानी। फिर उसमें फूस की छत पर फंसा कोई परिवार। इन दोनों के अलावा पानी से जुड़े बिंब बस खुशियों वाले होते हैं, जहां स्विमिंग पूल में तैरते, वाटर पार्क में आनंद उठाते, नौका विहार करते, समुद्र की लहरों पर तरह-तरह के खेलों का मजा लेते लोग दिख जाते हैं। इन सबके साथ एक बिंब ऐसा भी है जो अक्सर दिखता नहीं है, उस पर बातें भी क्षेपक के रूप में ही की जाती हैं। बहुत कम ऐसे चित्र सामने आते हैं जहां कारखानों, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों से निकलने वाली गंदगी को नदी में मिलता दिखाया जाता हो। हां, पानी को गंदा करने के नाम पर लोगों को नदी किनारे शौच करते हुए, मवेशियों के पानी में धंसे हुए और कपड़े धोए जाने के बिंब पेश कर दिए जाते हैं। ये चित्र सर्वसुलभ हैं, इसलिए दिखाए जाते हैं। लेकिन फैक्ट्रियों की गंदगी के चित्र नगण्य क्यों होते हैं, जिसका पानी को प्रदूषित करने में सबसे बड़ा योगदान है?
महीने भर पहले एक शाम जब मैं नदी से तैर कर लौटा तो देखा कि एक महानुभाव ने कई बार फोन किया और बात नहीं हो पाई। जब उनसे बात हुई तो उन्हें पूरा मामला समझाना पड़ा कि मैं नदी पर जाते समय फोन घर छोड़ जाता हूं। अब कल्पना कीजिए दिल्ली में बैठे एक व्यक्ति के बारे में, जिसके यहां आने वाले अखबार में आए दिन हवा की गंदगी की खबर छपती हो और कहीं न कहीं से बहता हुआ काला नाला जिसने कई बार जरूर देखा हो, वह आदमी केरल में नदी में तैरने की बात पर किस तरह ईर्ष्या से भर सकता है। वे महानुभाव भी उसी ईर्ष्या में कहने लगे कि एक तो केरल, जहां पहाड़ियों के बीच नदी बहती हो, और उसमें तैरना क्या आनंद देता होगा! उनके आनंद की कल्पना मुझ तक भी पहुंची। मैंने उन्हें कुछ कहना चाहा, लेकिन वे अपनी कल्पना ही सुनाते रहे। मैंने भी उसमें दखल देने की कोशिश बंद कर दी।

फरवरी-मार्च के दिनों में विद्यालय में काम कम हो जाते हैं, इसलिए हम लोग स्टाफ-रूम में ज्यादा पाए जाने लगते हैं, हंसी-मजाक करते हुए, अखबार पढ़ते हुए या फिर चश्मा चढ़ाए छात्रों की कॉपियों में सिर खपाते हुए! ऐसे ही मौके पर, हमारी एक सहकर्मी अखबार लेकर आई और पढ़ कर बताने लगी कि मैं जहां तैरने जाता हूं उसके बारे में खबर छपी है कि वहां से दो किलोमीटर आगे और एक किलोमीटर पीछे तक का पानी बुरी तरह प्रदूषित है और मुझे वहां नहीं जाना चाहिए। यह बात मैं जानता था कि वहां के पानी की सतह पर कोई तेल-सा फैला रहता है जो शरीर से चिपक जाता है। ज्यादा देर पानी में रहने से खुजली भी होने लगती है। यह बात मैं दिल्ली में बैठे उन महोदय को भी कहना चाह रहा था, लेकिन उन्होंने मौका ही नहीं दिया। हमारी सहकर्मी कहने लगी कि आगे से मत जाना, कम से कम कुछ दिन, जब तक वह चिपचिपा पदार्थ खत्म नहीं हो जाता। क्या पता कोई चर्मरोग हो जाए! मैं जानता था कि उनका मकसद मुझे उस खराब पानी से बचाने के बजाय अपने पति को रोकना था जो मेरे साथ तैरने जाते थे। नतीजतन, मेरे साथी ने उस शाम जाने से मना कर दिया और मुझे भी कुछ दिन रुक जाने के लिए तैयार कर लिया।

उस अखबार में भी था और स्थानीय लोगों ने भी बताया कि पास ही में रबड़ की एक फैक्ट्री है जिसकी गंदगी से यह चिपचिपा पदार्थ नदी में फैल गया है। न तो अखबार ने और न स्थानीय लोगों ने बताया कि उस फैक्ट्री को ऐसा करने से मना क्यों नहीं किया जा सकता। मैंने तो जाना बंद कर दिया, लेकिन लोग उस खबर के बावजूद नदी में नहाते, कपड़े धोते रहे। मेरा मन भी नदी की सतह पर आगे बढ़ते हुए सूरज को डूबते हुए देखने के लिए मचल जाता था, इसलिए अपने साथी के बिना ही मैं फिर से जाने लगा।
नदी में चिकनाई की मात्रा अब और बढ़ गई है। कई बार किनारे के पास के पानी से कपड़े धोने के साबुन की तेज गंध आती है। इस सबके बावजूद मंथर गति से बहती नदी के बीच में पानी पर उलटे लेट कर सूरज को ताकना या फिर पहाड़ी पर लगी आग की रंगत परखना इतना खुश कर देता है कि घर लौट कर एक क्या, पांच बार नहाया जा सकता है!

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