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दुनिया मेरे आगेः परिसर की दृष्टि

एक साथी ने मुझसे अपना अनुभव साझा किया। दरअसल, उनसे एक दिन ई-मेल द्वारा सूचना मांगी गई थी कि वे अगले सत्र में क्या पढ़ाना चाहते हैं।

Author Published on: September 8, 2017 2:46 AM
सांकेतिक फोटो

ऋषभ कुमार मिश्र

एक साथी ने मुझसे अपना अनुभव साझा किया। दरअसल, उनसे एक दिन ई-मेल द्वारा सूचना मांगी गई थी कि वे अगले सत्र में क्या पढ़ाना चाहते हैं। अपनी अध्ययन पृष्ठभूमि और रुचि को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह सूची उपलब्ध करा दी। लगभग एक महीने बाद जो समय-सारणी प्रकाशित हुई, उसमें उन्हें इच्छित विषय पत्र पढ़ाने को नहीं दिया गया। इस बारे में जब उन्होंने संबंधित कर्मी से बात की तो जवाब मिला कि विभाग के वरिष्ठ साथियों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से मना किया है कि उन्हें एमफिल और पीएचडी जैसे उच्चतम स्तर पर वह पत्र आबंटित न किया जाए, क्योंकि अभी वे ‘जूनियर’ हैं। हालांकि जब उन्होंने वरिष्ठ साथियों से बात की तो सभी इस बात से मुकर गए। इसके बाद उन्हें इच्छित पत्र आबंटित किया गया।
इस संदर्भ में एक सवाल मेरे दिमाग को कुरेद रहा है कि इस तरह की घटनाओं का विश्वविद्यालयों पर क्या प्रभाव पड़ता है? पहली नजर में इनके प्रभाव में परिसरों में ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं जो विश्वविद्यालय को ‘विश्व’ के स्थान पर छोटे-छोटे गुटों में तब्दील कर देती हैं। सांगठनिक व्यवहार के सिद्धांत बताते हैं कि इस तरह की गुटबंदी सामुदायिकता के भाव के लिए खतरनाक होती है। जबकि सीखने, शोध और ज्ञान निर्माण के लिए सामुदायिकता को एक आधारभूत विशेषता माना गया है। धीरे-धीरे यह गुटबंदी विद्यार्थियों और कर्मचारियों के बीच फैल जाती है, जिससे हितरक्षा के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। फिर यही संघर्ष चापलूसी, मतारोपण और संवादहीनता को जन्म देता है।

पाउलो फ्रेरे ने अपनी कृति ‘उत्पीड़ितों के शिक्षाशास्त्र’ में उत्पीड़न का मूल इन्हीं व्यवहारों को बताया है। इस तरह से जिस उत्पीड़न और वर्चस्व के विरोध में न्याय आधारित, समतामूलक और समावेशी परिसर का आदर्श स्वीकार किया गया है, उसमें कुएं के मेंढ़क पैदा हो जाते हैं जो अपनी-अपनी दुनिया और प्रभाव क्षेत्र को ‘विश्व’ मान लेते हैं। इस बंद दुनिया में विचारों का खुलापन, परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों के बीच संवाद और ज्ञान के ‘यूनिवर्स’ में विविधता की बात करना बेईमानी लगता है। इस तरह के परिवेश में मुक्ति की छटपटाहट नहीं होती है। लोग शोषण को अपनी नियति मान लेते हैं। मजेदार बात तो यह है कि जो लोग सत्ता पक्ष के साथ खड़े होकर उत्पीड़न को देख कर आनंद उठाते हैं, उन्हें भी अपनी वैचारिक आजादी खोकर उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। कम से कम वैचारिकी की रीढ़विहीनता विश्वविद्यालय की परिकल्पना से मेल नहीं खाती है!

हमें इस भ्रांति में जीने की आदत है कि उम्र में बड़े होने का अर्थ बुद्धि और प्रतिभा में श्रेष्ठ होना है। अब तक का कोई भी मनोवैज्ञानिक अध्ययन इस संबंध में ठोस प्रमाण नहीं देता है। उच्च शिक्षा से जुड़ी रपटें और नीतिगत दस्तावेज इस बात का उल्लेख करते हैं कि अनुभवी शिक्षक को प्रशासनिक दायित्व दिया जाए, उनके अनुभवों का लाभ नेतृत्व में लिया जाए। लेकिन कहीं यह उल्लेख नहीं मिलता कि ज्यादा अनुभव और कम अनुभव के आधार पर पढ़ने-पढ़ाने के अधिकार से किसी को वंचित कर दिया जाए। इस तरह की व्यवस्था को बनाए रखने का तर्क सामाजिक बदलाव के स्थान पर संस्थागत ऊंच-नीच को एक वैध व्यवस्था घोषित कर देता है। इस व्यवस्था में ‘दब्बू तानाशाह’ तैयार हो सकते हैं, लेकिन सर्जक मस्तिष्क नहीं।

वैयक्तिक आग्रहों से व्यवस्था को प्रभावित करना एक पेशेवर तरीका नहीं है। दायित्व के निर्वहन में व्यक्तिगत पसंद या नापसंद का हावी होना एक पेशेवर की भूमिका में व्यक्ति की असफलता है। जब विश्वविद्यालय को पेशेवरों को तैयार करने के लिए पौधशाला की स्थापना को आप स्वीकार करते हैं तो उसकी इस व्याख्या को भी स्वीकार करना होगा कि संस्थान के लक्ष्य, मूल्य और समाज के प्रति दाय व्यक्तिगत हित, स्वार्थ, आकर्षण, ईर्ष्या आदि से ऊपर हैं। कई बार एक उपयुक्त सीमा तक प्रतिस्पर्धा और आगे बढ़ाने का फलसफा अभिप्रेरक माना जाता है। यह अभिप्रेरक अपनी श्रेष्ठता के लिए लकीर को बड़ा करने के सिद्धांत को स्वीकार करता है। लेकिन अगर किसी के लकीर खींचने पर पहरेदारी लगा दी जाए और अनावश्यक कांट-छांट की जाए तो नकारात्मक माहौल बनना स्वाभाविक है।

इस माहौल में पहरेदारी करने वाला व्यक्ति यह नहीं जाना पाता है कि वह किसी दूसरे के हाथ की कठपुतली बन चुका है। लेकिन वह इस आनंद में डूबा रहता है कि उसने अपने अधिकार के प्रयोग से कुछ लोगों को किसी खास अवसर से वंचित कर दिया। परिणाम यह होता है कि संवाद और सौहार्द्र के स्थान पर व्यवस्था का संचालन संदेह, जासूसी और कानूनबाजी से होने लगता है। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि विश्वविद्यालय का अध्यापक होने के नाते समाज आपको एक बौद्धिक का दर्जा देता है जिसके विचार और कर्म एक समाज में बदलाव का मॉडल और खुराक होते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय की अपनी चाल-ढाल ही ऐसी हो, जहां इन छल-प्रपंचों की व्यवस्था ही समूल नाश कर दे।

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