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दुनिया मेरे आगेः जन सुविधा की जगह

मैं नहीं जानता कि भारत में किसी प्रांत में रेस्तरां या कॉफी हाउस में टॉयलेट या प्रसाधन-कक्ष की सुविधा के संबंध में कोई कानून है या नहीं। लेकिन ब्रिटेन में हरेक बड़े रेस्तरां या कॉफी हाउस में आमतौर पर टायलेट की सुविधा होना आवश्यक है।

Author Published on: June 3, 2016 2:49 AM
toilet facility, indian restaurant, loo facilityप्रतीकात्मक तस्वीर

मैं नहीं जानता कि भारत में किसी प्रांत में रेस्तरां या कॉफी हाउस में टॉयलेट या प्रसाधन-कक्ष की सुविधा के संबंध में कोई कानून है या नहीं। लेकिन ब्रिटेन में हरेक बड़े रेस्तरां या कॉफी हाउस में आमतौर पर टायलेट की सुविधा होना आवश्यक है। किसी शहर में कानूनन यह सुविधा प्रदान करने के लिए प्रतिष्ठान कितना बड़ा होना चाहिए, यानी वहां कम से कम कितने ग्राहकों के बैठने की सुविधा होनी चाहिए? पंद्रह, दस, पांच या इससे भी कम? इसका उत्तर हाल में ही इंग्लैंंड के शहर हल की एक अदालत ने दिया है। ब्रिटेन के लोकल गवर्नमेंट मिसलेनियस प्रॉवीजंस एक्ट की धारा-20 के मुताबिक अगर किसी रेस्तरां या कॉफी हाउस में कम से कम दस सीटें भी हों तो वहां कानूनन टायलेट या जन-सुविधा भी होना अनिवार्य है।

यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर किसी ने शायद गंभीरता से नहीं सोचा हो। लेकिन हल शहर की अदालत ने शहर में स्थित ग्रेग नामक कॉफी हाउस की दो शाखाओं में ग्राहकों के लिए टायलेट न होने की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए उसके खिलाफ निर्णय दिया। ब्रिटेन में कानूनन कम से कम दस सीटों वाले रेस्तरां में ग्राहकों के लिए टायलेट की सुविधा अनिवार्य होने के नियम के बावजूद देखा जा रहा है कि दो-चार या दस-बीस नहीं, बल्कि सैकड़ों छोटे-छोटे प्रतिष्ठानों में जन-सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। अब अगर उच्च न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ दायर की गई याचिका खारिज हो जाती है तो ब्रिटेन के लगभग बीस हजार ‘टेक अवे’ रेस्तरां और लगभग पांच हजार कॉफी हाउस के लिए अनिवार्य हो जाएगा कि वे अपने परिसर में ग्राहकों के लिए या तो टायलेट की सुविधा प्रदान करें या अपना कारोबार बंद कर दें। अभी नियम यह है कि दस या कम सीटों वाले प्रतिष्ठानों में टायलेट होना अनिवार्य नहीं है, पर व्यवहार में देखा यह जा रहा है कि कुछ बड़े यानी दस से अधिक सीटों वाले हजारों रेस्तरां या कॉफी हाउस में भी ग्राहकों के लिए शौचालय आदि की सुविधा नहीं है।

अब सवाल है कि अगर रेस्तरां के अंदर नहीं, बल्कि बाहर कुर्सी और टेबल रख दिए जाएं (जैसा अक्सर देखने में आता है) तो भी क्या यह कानून लागू होगा! अभी यहां ऐसे भी कई रेस्तरां हैं जहां लोग अंदर तो खड़े-खड़े चाय-कॉफी पी लेते हैं, पर बाहर कुर्सी-टेबल रखी रहती हैं। कुछ रेस्तरां में टायलेट की सुविधा होती भी है तो वहां ताला बंद रहता है। उसके उपयोग के लिए कर्मचारी से चाबी मांगनी होती है जो बहुत से लोग संकोचवश नहीं मांगते।

इंग्लैंड में अभी भी कुछ बहुत पुराने घरों में शौचालय नहीं हैं। उन घरों में रहने वाले लोग पहले सार्वजनिक शौचालयों का प्रयोग करते थे। अब ऐसे लोगों को अपने घरों में शौचालय बनवाने के लिए वहां की नगरपालिकाएं अनुदान देती हैं और अधिक से अधिक लोगों को इसकी जानकारी हो, इसके लिए समाचारपत्रों में नियमित रूप से विज्ञापन भी दिए जाते हैं।

दरअसल, असली समस्या कुछ शहरों में सार्वजनिक जन-सुविधाएं नहीं होने की है। अभी ऐसा कोई कानून नहीं है कि नगरपालिकाएं शहरों में सार्वजनिक टायलेट की सुविधा प्रदान करें। इसका एक परिणाम यह भी हुआ है कि पहले जिन शहरों में टायलेट थे, उनमें आधे से अधिक बंद पड़े हैं- स्टाफ की कमी या मंदी की वजह से हुई छंटनी के कारण। पहले होता यह था कि आमतौर पर लोग ‘टेक अवे’ प्रतिष्ठानों से खाना लेते थे और बाद में सार्वजनिक शौचालयों में चले जाते थे। अब यह संभव नहीं रह गया है। इसका फायदा सुपर मार्केट, डिपार्टमेंटल स्टोर, पेट्रोल स्टेशन और इसी प्रकार के अन्य प्रतिष्ठानों ने उठाना शुरू किया है, जहां ऐसी जगह टायलेट बनवाए गए हैं कि वहां पहुंचने के लिए पूरे स्टोर के बीच में से होकर जाना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप लोगों की नजर स्टोर में रखी हुई चीजों की ओर जाती है और वे स्टोर से बाहर निकलते वक्त कुछ न कुछ खरीद ही लेते हैं। अब पेट्रोल स्टेशनों में भी दैनिक उपयोग की छोटी-मोटी चीजें बिकने लगी हैं। सरकार चाहती है कि लोग बाहर निकलें, शॉपिंग करें खाना खाएं और इस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ हो। लेकिन वह अपने स्तर पर शौचालयों की सुविधा नहीं मुहैया कराना चाहती।

यों जन-सुविधाओं के मसले पर ब्रिटेन जैसे देश में यह स्थिति होगी, इसकी कल्पना थोड़ी मुश्किल है। फिर भी, वहां इसे एक बड़ी समस्या नहीं कहा जा सकता। थोड़ी-बहुत इस तरह की जो दिक्कत है भी, उससे निपटने की कोशिशें चल रही हैं। इसके बरक्स भारत में तमाम लोग जानते हैं कि खुले में ‘निपटने’ और शौचालयों के अभाव से लेकर सिर पर मैला ढोने तक की समस्या कितनी गहरी है। और यह इक्कीसवीं सदी में विकास की नई ऊंचाइयां हासिल करने के बावजूद है।

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