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दुनिया मेरे आगेः विकास के निशां

उसे देखकर कई भाव उभरते हैं। लगता है, किसी ने अमरूद का आधा हिस्सा खाकर फेंक दिया हो। या कि किसी ने बर्थडे की केक को चाकू से काटा हो।
Author October 6, 2017 02:28 am
इस अधखाए पहाड़ को देखकर कुछ ऐसे ही बिंब दिमाग में उभरते हैं।

जयराम शुक्ल

भोपाल से इंदौर जाते हुए जब देवास बाइपास से गुजरता हूं तो कलेजा हाथ में आ जाता है। बाइपास शुरू होते ही बाएं हाथ पर हनुमानजी की विराट प्रतिमा है। उसके पीछे खड़े पहाड़ का जो दृश्य है, वह बेहद दर्दनाक है। उसे देखकर कई भाव उभरते हैं। लगता है, किसी ने अमरूद का आधा हिस्सा खाकर फेंक दिया हो। या कि किसी ने बर्थडे की केक को चाकू से काटा हो। इस अधखाए पहाड़ को देखकर कुछ ऐसे ही बिंब दिमाग में उभरते हैं। दार्इं ओर धुंधुआती हुई कई चिमनियां दिखेंगी। दृश्य कुछ ऐसा बनता है मानो धरती के मुंह में जबरन किसी ने ढेरों सुलगती हुई बीड़ियां ठूंस दी हों।

यह दृश्य सिर्फ देवास का नहीं है। जहां भी पहाड़ हैं, वहां ऐसे कारुणिक नजारे आम हैं। पर इसे अंतस से महसूस करने की आदि कवि वाल्मीकि की दृष्टि जगानी होगी, जिन्होंने क्रौंच वध की घटना में क्रौंचनी के आर्त्तनाद से उपजी करुणा के चलते पहली कविता रच दी थी। हर मनुष्य में यह दृष्टि है। मैं प्रकृतिप्रेमी हूं, इसलिए मुझे यह दृश्य कुछ ज्यादा ही चुभता है। जब भी समय मिलता है तो मैं विन्ध्य के वनप्रांतरों में थोड़ा भटक लेता हूं। सिंगरौली के धुएं से निकल कर उससे लगे जंगलों में खूब भटका हूं। वाल्मीकि आज यहां आकर घूमते तो गश खाकर गिर पड़ते। हम लोग भौतिकवादी हुए, फिर खुदगर्ज बन गए। इसलिए यह सब कुछ देख भी लेते हैं। यहां आकर आप देखेंगे कि आदमी ने किस तरह धरती को उलट पलटकर माटी के ढूह खड़े कर दिए हैं। लगभग तीन सौ किलोमीटर की परिधि का नामोनिशां मिट गया। पहाड़ पीस कर बिजली में बदल दिए गए। वन्यजीव और पहाड़ी जीव जाने कहां बिला गए। किसी को इसकी खबर नहीं है।

विकास का आक्टोपस सिंगरौली से लगे सरई क्षेत्र के खूबसूरत जंगलों की ओर बढ़ रहा है। यह दुनिया का सबसे संपन्न जैव-विविधता वाला क्षेत्र है। पेड़-पौधों की दृष्टि से और जीव-जंतुओं की दृष्टि से भी। छत्तीसगढ़, झारखंड के हाथियों का यह गलियारा है। भालुओं का प्राकृतिक आवास। गुफाओं की शृृंंखला आदम सभ्यता की कहानी कहती है। इस क्षेत्र का गुनाह यह है कि इसके पेट में कोयला है और वह कोयला हमारी विकास-दर के लिए जरूरी है। इसलिए चाहिए हर हाल पर, किसी कीमत पर। कभी-कभी, गुण भी मौत के गाहक बन जाते हैं। जैसे कस्तूरी मृग के लिए, मणि नाग के लिए। यह तय है कि आज नहीं तो कल इस खूबसूरत वन की कस्तूरी और मणि की कीमत विकास की बलिवेदी पर चढ़ा दी जाएगी।

कहते हैं कि हमारा समाज धर्मभीरु है। उसकी रक्षा के लिए हम किसी हद तक जा जा सकते हैं। अगर ऐसा आप भी सोचते हैं तो एक बार चित्रकूट हो आइए। यहां भगवान श्रीराम साढे़ ग्यारह वर्ष रहे। जहां वे विचरते रहे होंगे, वहीं के जंगल और पहाड़ों के भीतर उम्दा किस्म का बाक्साइट है। श्रीराम की स्मृतियां बची रहें या जाएं, बेरहम विकास यात्रा और विकास-दर के चंद्रखिलौना के लिए हमें वे जंगल और वे पहाड़ चाहिए ही चाहिए। जिस सिद्धा पहाड़ को देखकर राम ने ‘..भुज उठाय प्रण कीन्ह..’ का संकल्प लिया था उस पहाड़ की गति देखेंगे, जरा भी संवेदना होगी तो करुणा उमड़ेगी। जेसीबी के पंजों ने पहाड़ों को नोच डाला हो जैसे। सरभंग ऋषि का जहां आश्रम था, उस वन प्रांतर को भी खनिज के लिए जगह-जगह से नोचा-खसोटा गया है।

पूरे देश के पहाड़ों और वनों के साथ ऐसा ही निर्दय व्यवहार हो रहा है। किसलिए..क्योंकि विकास के लिए यह जरूरी है। इससे विकास-दर बढ़ती है। विकास-दर का गणित बड़ा बेरहम है। खड़े हुए पेड़ों का विकास में कोई योगदान नहीं। इन्हें काट कर वहां से मार्ग निकालिए और पेड़ों को आरा-मिल भेजिए या पेपर मिल, तभी विकास को गति मिलेगी। खड़े हुए पहाड़ विकास में बाधक हैं। उन्हें केक की तरह काट कर सड़क पर पसराना पड़ेगा, विकास की गाड़ी तभी आगे बढेÞगी। बहती हुई नदियों का विकास में तब तक कोई योगदान नहीं जब तक कि इन्हें बांध कर गांवों को न डुबा दिया जाए। यह विकास का नया फलसफा है जहां संवेदना, स्मृति, जिंदगी की कोई हैसियत नहीं। विकास के समांतर विनाश की विकास-दर होती है, पर इसे नापे कौन? अर्थशास्त्रियों को इस पर विमर्श करना चाहिए।

सवाल जो पूछे जाने चाहिए वे ये हैं कि क्या हम कोई पहाड़ बना सकते हैं? क्या जंगल, नदी, झरने पैदा कर सकते हैं? तो फिर इन्हें तबाह करने, नष्ट-भ्रष्ट करने का अधिकार किसी को कहां से मिला? पुराणकथाओं में बताया गया है कि एक बार सहस्रबाहु ने नर्मदा को बांधने की कोशिश की थी तो परशुराम ने उसके सभी हाथ काट डाले थे। आज हम नदियों को बांधने, उनकी धारा को मोड़ने की, पहाड़ों और जंगलों को खाने की राक्षसी कोशिशें कर रहे हैं। इन्हें हमारे वैदिक वांग्मय में माता, पिता, सहोदर, भगिनी, पुत्र, बंधु-बांधवों का दर्जा कुछ सोच-समझकर ही दिया गया होगा। ये हैं तभी हम हैं। नीतिग्रंथों में लिखा है कि प्रकृति से हम उतना ही लें जितना कि एक भ्रमर फूल और फल से लेता है। विकास की निर्दय होड़ ने प्रकृति को ‘कत्लगाह’ में बदल दिया है। हम नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी।

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