ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः आत्ममुग्धता की संस्कृति

भीड़, भीड़ और भीड़...सड़कें, बाजार, सिनेमाहॉल, पार्क, अस्पताल, मेट्रो ही नहीं, पुलों के नीचे से लेकर चमचमाते हवाई अड््डे तक चारों ओर फैला अथाह जनसमुद्र।

(express Photo)

कविता भाटिया

भीड़, भीड़ और भीड़…सड़कें, बाजार, सिनेमाहॉल, पार्क, अस्पताल, मेट्रो ही नहीं, पुलों के नीचे से लेकर चमचमाते हवाई अड््डे तक चारों ओर फैला अथाह जनसमुद्र। यकायक मन में सवाल उठा, इतने मनुष्य- पर इंसानियत, भावनाएं और संवेदनाएं, स्व और पर का रिश्ता? उस दिन जनकपुरी से मंडी हाउस जाने के लिए मैंने मेट्रो ली और लेडीज डिब्बे में सवार हो गई, जो कि खचाखच भरा था। अलग-अलग सुगंधियों से महकती युवतियों के हंसी-ठट्ठे और बातचीत से माहौल गर्म था। मुझे बैठने की सीट नहीं मिली और मैं एक किनारे खड़े होकर माहौल का जायजा लेने लगी। अधिकतर नवयौवनाएं अपने फोन पर चैट करने, किसी गेम का लेवल पार कर प्वाइंट्स बनाने या कोई वीडियो देखने में मगन थीं। एक लड़की अपने होंठों के बीच जीभ घुमाती हुई अपनी बेस्ट सेल्फी लेने के मूड में थी। मोतीनगर स्टेशन से एक अधेड़ महिला अपने साथ एक वजनी बैग लेकर लगभग हांफती-सी डिब्बे में घुसी।

खचाखच भरे डिब्बे में वह अपने बाएं पैर के घुटने को पकड़ कवि निराला की ‘जो मार खा रोई नहीं’ की मजदूर स्त्री की तरह बेबस-सी एक किनारे खड़ी हो गई। मैंने एक सरसरी नजर घुमाई, इन आज की नवयुवतियों पर, जो अपनी आभासी दुनिया की गिरफ्त में थीं। कुछ तो सारी दुनिया से बेखबर आंखें मूंदे अपनी नींद पूरी करने की चेष्टा में थीं। जिस युवा शक्ति पर हम गर्व करते हैं, क्या वह ऐसी ही है? दो युवतियों को अपनी लिपस्टिक ठीक करने और बाल संवारने में व्यस्त देख कर मैंने उनके स्टेशन नजदीक आ जाने का अनुमान लगाया। एक से अनुरोध कर उस महिला को सीट देने को कहा। उसने सीट तो नहीं छोड़ी, हां तनिक मुंह बिचका कर कुछ सरक कर साथ बैठने की जगह दे दी। यह घटना रोजाना की हो सकती है, पर नैतिक मूल्यों के गिरते ग्राफ की ओर इशारा अवश्य करती है।

मैं सोचने लगी कि वास्तविक चेतन दुनिया से विलग होकर आभासी दुनिया को वास्तविक मानने वाले ये युवा भला कितनी वास्तविक जिंदगी जी रहे हैं? अपने आप पर मोहित हम नित्य अपनी फेसबुक वॉल पर हमारी सेल्फी को कितने लाइक्स या कमेंट्स मिले, यह झट देख लेना चाहते हैं, पर किसी की विवशता या तकलीफ हमें नहीं दिखती। सच, हम कितने स्वार्थी और आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। क्या यह भीड़ संवेदनाशून्य समाज की है? क्या प्रेम, दया, परोपकार और सहानुभूति जैसे मूल्य अब पुस्तकों में ही रह जाएंगे? इस पॉपुलर कल्चर की देन आत्ममुग्धता और आत्मकेंद्रित स्वार्थी प्रवृत्ति ने किशोरों को किस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया है, हाल ही में घटी घटनाएं इसका प्रमाण हैं।

फेसबुक और यू-ट्यूब पर अपना सनसनीखेज, रोमांचक वीडियो डाल कर वाहवाही लूटने के इरादे से रेलवे ट्रैक पर वीडियो बनाते हुए दो किशोरों की मौत हमें झकझोरती है। कभी किसी जलप्रपात, संकरी घाटी के किनारे या दूर से दौड़ती आती ट्रेन के आगे खड़े होकर सेल्फी खींचना अथवा अपना वीडियो बनाना और फिर अपने मित्रों के बीच अपने कॉलर ऊपर कर अपने को साहसी सिद्ध करने की यह चाह कितनी बड़ी बेवकूफी है। इधर देखने में आया है कि कई स्कूली बच्चे अपने ‘फनी’ वीडियो बना कर यू-ट्यूब पर शेयर करते हैं। एक निश्चित संख्या में उसके व्यूअर्स बढ़ने पर व्यावसायिकता की दौड़ में शामिल होकर वे कमाई के हकदार हो जाते हैं। प्रश्न उठता है कम उम्र की यह सनक कौन-सी बहादुरी की ओर इशारा करती है?

वस्तुत: यह उस दिशाहीनता और भावनात्मक भटकन का असर है, जिन परिवारों में शाम होते ही माता-पिता और बच्चे अपने अपने स्मार्ट फोन से चिपके दिखाई देते हैं। एक ही कमरे में बैठे, पर एक दूसरे से अपरिचित और बेखबर। बस-अपनी अपनी इच्छाओं में कैद। यही संवादहीनता संवेदनहीनता में तब्दील हो रही है। देश का युवा वर्ग स्वयं में एक शक्ति है और इतिहास गवाह है कि इस युवा शक्ति ने कई बार अपने को प्रमाणित किया है, पर आज का युवा शार्टकट तरीकों से जिंदगी की लंबी रेस को जीतना चाहता है। उसमें धैर्य, संयम और विवेक की कमी है और ईर्ष्या तथा प्रतिस्पर्धा ने अपनी जगह बनाई है। उसके सम्मुख ‘नायकों’ के प्रतिमान बदल रहे हैं।

पिछले दिनों एक सीरियल किलर युवक युवतियों का चुबंन लेते वीडियो बनाते समय पकड़ा गया, जिसे वह अपनी मौज-मस्ती के लिए बना कर दोस्तों के बीच शेयर करता था। इसके अतिरिक्त एक अन्य घटना में एक अपराधी युवक ने पकड़े जाने पर स्वीकारा कि अपराधिक धारावाहिक और वीडियो देख कर ही उसे बलात्कार जैसे घृणित अपराध करने का मन होता था। वस्तुत: इन सबके मूल में बदलता पारिवारिक ढांचा, एकल परिवार पद्धति, माता-पिता का अपने ही काम में व्यस्त रहना, नए गैजेट्स के इस्तेमाल की चकाचौंध तथा बेकारी और असंतोष हैं। आवश्यकता है युवा ऊर्जा को सकारात्मक रूप देने की। छद्म यथार्थ को वास्तविक मानती और असंतोष, हताशा तथा कुंठा से जूझती इस युवा पीढ़ी पर साइबर दुनिया, फैशन और पब संस्कृति धीरे-धीरे हावी होती जा रही है। भविष्य की धुंधुंआती तस्वीर दर्शाती ऐसी घटनाएं हमें समय रहते सचेत होने की चेतावनी देती हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: किताब और बंदूक
2 दुनिया मेरे आगे: फड़ और पगड़ी का शाहपुरा
3 धारणा बनाम सच
यह पढ़ा क्या?
X