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दुनिया मेरे आगेः समाज बनाम भाषा

भाषा जब मनुष्य कुछ भी नहीं जानता था, उस काल से ही सब कुछ जानने का भ्रम पैदा करती आ रही है। शब्दों के रूप में प्रतीकों का आभासी संसार अपने घटाटोप से सत्याभास रचता है।

Author January 25, 2017 3:13 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

रामप्रकाश कुशवाहा 

भाषा जब मनुष्य कुछ भी नहीं जानता था, उस काल से ही सब कुछ जानने का भ्रम पैदा करती आ रही है। शब्दों के रूप में प्रतीकों का आभासी संसार अपने घटाटोप से सत्याभास रचता है। दरअसल, हमारे पास एक साथ एक वास्तविक संसार और दूसरा शब्दों और अर्थों से बना मानसिक प्रतिसंसार होता है। सृष्टि या संसार के गुण-नियम भले नहीं बदलें हों, नई सूचनाओं, अनुभवों और तथ्यों के आधार पर मानसिक प्रतिसंसार बदलता जाता है। अच्छा और बुरा नेतृत्व इसी प्रतिसंसार को प्रभावित करने का प्रयास करते रहते हैं। प्राचीन भाषाविद् हर शब्द को पद (उपाधि के अर्थ में) मानते थे। यह अर्थ संस्कृत के ‘पदार्थ’ शब्द में अब भी सुरक्षित है। वास्तविक ‘भव’ जगत के भौतिक तत्त्व सबसे पहले हैं; मानसिक या अनुभव जगत उसी पर आश्रित और उसका अनुसरण करता है। लेकिन भाषा-तंत्र के विकसित हो जाने के बाद वस्तुओं की उपाधि, शब्द या पद पहले हो गया और उसका अर्थ यानी ‘पदार्थ’ बाद में। एक बार शब्द बन जाने के बाद जिसे हम वास्तव में नहीं जानते हैं, उसे भी जानने का दावा करने लगते हैं। चीजें और तथ्य-सत्य वास्तव में क्या हैं, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाता जितना कि हम उसे किस रूप में देखते हैं। यह चंद्रग्रहण को पृथ्वी की छाया के रूप में न देख कर राहू और केतु द्वारा ग्रसे जाने के रूप में देखने जैसा है और पृथ्वी के अपने स्थान पर स्थिर रहने और सूर्य के उसकी परिक्रमा करने जैसा भी। यानी हमारा वर्तमान ज्ञान मानव-जाति द्वारा अब तक प्राप्त सूचनाओं पर आधारित है। लेकिन जैसे ही कोई नया तथ्य आएगा, हम अपने ज्ञान में स्थित मानसिक प्रतिसंसार को बदलने के लिए विवश होंगे। मार्क्स ने इसे ही भौतिक जगत के बदलावों के हमारी सभ्यता पर पड़ने वाले अपरिहार्य प्रभाव के रूप में देखा है। इसलिए प्रकृति के रहस्य जैसे-जैसे और अनावृत्त होंगे, हमें अपने प्रतिसंसार, यानी ज्ञान-संसार को भी बदलना ही होगा।

लेकिन जो बात हमारे वृहत्तर अस्तित्व और हमारी उदात्त भावानुभूति को प्रभावित करती है, वह हमारे भाषाग्रस्त मस्तिष्क में उत्पन्न अर्थ की जड़ता ही है, जो हमें पूरी तरह जानने का भ्रम पैदा करती रहती है। हालांकि हमारा सारा ज्ञान माने हुए शब्दों पर टिका होता है, लेकिन पवित्र धार्मिक शब्दों के प्रति हमारा आग्रही मस्तिष्क यह मानने को तैयार नहीं होता कि एक शब्द के स्तर पर यह उतना ही काल्पनिक और सैद्धांतिक झूठ छिपाए है, जितना अन्य शब्द और हमारा अपना नाम भी। जबकि हमारा विशुद्ध अस्तित्व हमारे चिर-परिचित और सर्वविदित नाम के बावजूद खुद में ही रहस्यमय है। मुझे लगता है कि प्राचीन भारतीय मनीषियों ने इसी भाषिक तंत्र का अतिक्रमण करते हुए ‘नेति-नेति’ की अवधारणा दी थी और महावीर वर्द्धमान ने अनेकांतवाद का दर्शन दिया था। बुद्ध धर्म की शून्य और विपश्यना की अवधारणा, गीता का स्थित-प्रज्ञ और कठोपनिषद की आत्मा, आदि शंकराचार्य का मायावाद भाषा के परे के इसी आश्चर्यपूर्ण विशुद्ध अस्तित्व-लोक का साक्षात्कार है। भारतीयों के लिए शब्दों के मिथ्या होने का यह जीवन-बोध सामाजिक मुक्ति के लिए भी जरूरी है, क्योंकि इसी झूठ को पहचान कर हम जाति, संप्रदाय और धर्म-भेद जैसी मनोवैज्ञानिक प्रकृति वाली बाधाओं का अतिक्रमण कर पाएंगे। शब्दों को सामाजिक स्वीकृति मिलते ही वे सच मान लिए जाते हैं।

दरअसल, हम एक परमाणु के अस्तित्व के रहस्यमय सच को अभी पूरी तरह नहीं जानते, लेकिन अरबों-खरबों परमाणुओं के सामूहिक योग से बने मनुष्य को तुच्छ और हेय घोषित करने का पांडित्य बघारते हैं। शब्द जिन अर्थों को कहते या वहन करते हैं वे सच या उसके आसपास हो सकते हैं, लेकिन आखिरकार ज्ञान का प्रति-संसार एक आभासी सत्य ही है। वह कभी भी प्रत्यक्ष सत्य का स्थानापन्न नहीं हो सकता। वह जब भी होगा एक आभासी सत्य ही होगा। हमारे प्राचीन मनीषियों ने भाषा, शब्द और उसके अर्थ पर विचार करते समय मानव-जाति के शब्दों और भाषा-व्यवहार से परे के उस विशुद्ध रहस्यमय अस्तित्व को अपने ज्ञान-चक्षुओं से देख लिया था। यह दूसरी बात है कि ज्ञान के इसी सैद्धांतिक झूठ को वे माया कहते रहे। इस बोध का अतिक्रमण कर ही अपने विशुद्ध अनाम-अज्ञात अस्तित्व के प्रति वे आश्चर्य से भर जाते रहे। उसे दिव्य और ईश्वरीय-‘ब्रह्म’ के रूप में देखते रहे।
यह आश्चर्य और दिव्यता-बोध जीने का उनके पास ठोस बौद्धिक आधार भी था। वे यह जान गए थे कि मानव द्वारा प्रयुक्त भाषा और उसके द्वारा अब तक प्राप्त ज्ञान भी एक आभासी प्रतिसंसार ही है, न कि वास्तविक। इसीलिए कोई दावा करने के स्थान पर उन्होंने ‘नेति-नेति’ कहना जरूरी समझा। भाषा के इस तंत्रगत प्रभाव को समझे और उसका अतिक्रमण किए बिना मानव-जाति को अलग-अलग जनसंख्यात्मक विभाजन करने वाले, अलग-अलग पवित्र धार्मिक नामों के उस भाषिक झूठ को नहीं पहचाना जा सकता है जो दुनिया को लंबे समय से बांट रहा है।

 

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