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दुनिया मेरे आगेः शून्य संवेदनाएं

संवेदनशीलता जिंदा रहने का पर्याय है, चाहे वह मानवीय समाज की कोई भी इकाई हो। इस कसौटी पर छोटे से छोटे जीव का भी अध्ययन किया जा सकता है।

जिंदा रहने का पर्याय है संवेदनशीलता

अर्चना गौतम

संवेदनशीलता जिंदा रहने का पर्याय है, चाहे वह मानवीय समाज की कोई भी इकाई हो। इस कसौटी पर छोटे से छोटे जीव का भी अध्ययन किया जा सकता है। समाज को तभी तक जीवित माना जाना चाहिए, जब उसमें संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों के प्रति सरोकार हो। वरना इंसानी मूल्यों के लिहाज से उसका कोई अपना अस्तित्व नहीं है। आखिरकार हम समाज में इसीलिए रहते हैं कि अकेले ज्यादा दूर तक नहीं जा सकते और न ही अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। लेकिन तब क्या कहा जाए, जब समाज को उसमें रहने वाली उन इकाइयों की कोई फिक्र नहीं हो जो दरकिनार कर दी गई हैं या हाशिये पर बसी हुई हैं!

आए दिन हम ऐसी खबरें पढ़ते-सुनते रहते हैं कि सड़क पर गुजरते लोग किस तरह सामने किसी घायल तड़पते व्यक्ति को छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं और समय पर सहायता नहीं मिलने के चलते वह दम तोड़ देता है। हाल में ऐसी खबरें भी आर्इं कि एक मृतक को श्मशान में इसीलिए जलाने नहीं दिया गया कि उसे समाज में नीची कही जाने वाली जाति के तौर पर देखा जाता है। कोई व्यक्ति भूख से दम तोड़ देता है, लेकिन आस-पड़ोस के लोग मदद के लिए नहीं आते! जलाने या दफनाने में खर्च होने वाले पैसे के अभाव में किसी अपने की ही लाश को छोड़ दिया जाता है! कितने मामलों को दर्ज करूं? ऐसी घटनाओं की सूची बहुत लंबी है।

लेकिन हाल की दो घटनाओं ने मेरी तरह के शायद बहुत सारे लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया कि सदियों से संवेदनशीलता और इंसानियत के बारे में सोचने के बावजूद हमारा समाज कहां तक पहुंचा है। ये घटनाएं न सिर्फ हमारे सामाजिक व्यवहार का आईना हैं, बल्कि इसकी मर चुकी अंतरात्मा से रूबरू कराती हैं। कुछ दिनों पहले दिल्ली में सड़क पर एक मजदूर हादसे का शिकार होकर घंटों तड़पता रहा। वह तड़पते हुए भी इस उम्मीद में रहा होगा कि कोई उसे अस्पताल पहुंचा दे। लेकिन उसकी मदद के लिए कोई नहीं आया। तमाम लोग, कारें और दूसरे वाहन- सब उसे दूर से देखते गुजरते रहे और नजरअंदाज करके आगे बढ़ते रहे। उलटे संवेदनशून्य जन-मानस के चेहरे का खुलासा करने के लिए एक व्यक्ति उसके पास आया और उसका मोबाइल फोन लेकर भाग गया।

लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं है कि इससे घबरा कर आंखें बंद कर ली जाएं। ऐसे अनेक वाकयों ने मानो हमें इनका अभ्यस्त बना दिया है। ओड़िशा के कालाहांडी इलाके में एक आदिवासी दाना मांझी अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर लाद कर बारह किलोमीटर सड़क पर चलता रहा और लोग किनारे खड़े तमाशा देखते रहे, फोटो खींचते रहे, टीवी मीडिया वाले उसका वीडियो बनाते रहे। कोई मदद के लिए आगे नहीं आया। टीबी जैसी ठीक हो जाने वाली बीमारी से मर जाने के बाद पत्नी की लाश को घर ले जाने के लिए उसे अस्पताल से एंबुलेंस तक मुहैया नहीं कराई गई थी। जब खबर फैलने लगी, तब इज्जत जाने के डर से प्रशासन को होश आया।

लेकिन जेहनी तौर पर झकझोर कर देनी वाली ये घटनाएं क्या केवल इक्के-दुक्के मामले हैं या फिर इनका हमारे सामाजिक ताने-बाने से कोई ताल्लुक है? जिस तरह हमारा सामाजिक ताना-बाना जातिवाद, सामंतवाद, नस्लवाद, पितृसत्ता के मूल्यों से सराबोर है, उसमें पूंजीवाद अपना अलग जहर घोल रहा है। ऐसी स्थिति में यह अंदाजा लगाना कोई बड़ी बात नहीं कि भारतीय समाज इतना संवेदनशून्य क्यों दिखता है! जब हम अपने समाज और इसकी सामाजिक चेतना पर गौर करते हैं तो यह साफ हो जाता है कि ऐसी घटनाओं का संबंध हमारे सामाजिक ढांचे और इतिहास से जुड़ा है! समाज का सबसे अमानवीय चेहरा यानी जातिवाद और जाति के आधार पर सामाजिक व्यवहार इस तरह की संवेदनहीनता का सबसे सटीक उदाहरण है। जाति के स्तर पर जिस तरह का विभाजन है समाज में और उसके अनुसार आज भी भेदभाव और नफरत खुलेआम सिखाई और जताई जाती है, उसमें कोई व्यक्ति अपने भीतर संवेदनशीलता का विकास कर सके या उसका निर्माण कर सके तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

अब इस तरह के चेतनाविहीन, अमानवीय प्रताड़ना से दो-चार समाज से हम यह उम्मीद रखते हैं कि हमें गली-चौराहों पर फरिश्ते मिलेंगे तो यह सिर्फ खयाल के लिए ही अच्छा है। हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं! हमें इस संवेदनहीनता से व्यापक स्तर पर ही लड़ना होगा। सिर्फ शोरगुल मचाने से हासिल कुछ नहीं होना! इसके लिए हमें वहां शुरुआत करनी होगी, जहां से बच्चों के जेहन में पहली नींव पड़ती है, यानी घर और स्कूल। सीधी बात है कि बच्चों के सामने किसी भी तरह के भेदभाव वाले बर्ताव नहीं किए जाएं। मसलन, भाई-बहन में अंतर, पड़ोसियों के बच्चों से इसलिए भेदभाव कि वह अलग जाति का है या मां-बाप के बीच किसी तरह की गैरबराबरी। इसके अलावा, हमें स्कूली पाठ्यक्रमों में उन सभी मूल्यों को शामिल करना होगा, ताकि हमारे बच्चे मानवीय मूल्यों को अपने भीतर उतार सकें।

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