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दुनिया मेरे आगेः ढलती शाम में

तीन पीढ़ियों में सौहार्द और समरसता वाले परिवार हमारी सुदृढ़ सामाजिक ईकाई की पहचान रहे हैं। लेकिन इस ढांचे में बिखराव ने शायद भावनाओं को भी ज्यादा निस्पंद बनाया है।

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तीन पीढ़ियों में सौहार्द और समरसता वाले परिवार हमारी सुदृढ़ सामाजिक ईकाई की पहचान रहे हैं। लेकिन इस ढांचे में बिखराव ने शायद भावनाओं को भी ज्यादा निस्पंद बनाया है। कायदे से देखें तो इस ढांचे में पहला विस्थापन सन 1960 के आसपास गांवों से शहरों में हुआ था। उच्च शिक्षा की ललक और औद्योगीकरण इसकी बड़ी वजहें जरूर रहीं। लेकिन सूखा, अकाल, विपरीत परिस्थितियां, जमींदारों की ज्यादती और जाति आधारित भेदभाव के कारण भी गांवों से पलायन करके नई पीढ़ी शहरों की ओर आकर्षित हुई। यहां आकर पढ़-लिख कर और अवसर पाकर कुछ अच्छे पदों पर भी पहुंचे। जो पढ़े-लिखे नहीं थे, वे दूसरी कुछ नौकरियों, मसलन ड्राइवर, चौकीदार का काम या मजदूरी करके या फिर कोई न कोई काम करके गुजारा करते और अपनी कमाई की कुछ न कुछ बचत अपने घर भी भेजते। पढ़ा-लिखा शिक्षित वर्ग भी अपने घर-गांव से भावनात्मक और आर्थिक दृष्टि से जुड़ा रहा।

उसके बाद सन अस्सी के आसपास विस्थापन का दूसरा दौर आया। शहरों के मध्यवर्ग की पढ़ी-लिखी, उच्च शिक्षा प्राप्त या उच्च शिक्षा का सपना देखने वाली नई पीढ़ी ने विदेशों की ओर रुख किया। अपने पिता और भाई का भी उन्हें पूरा सहयोग मिला। बच्चों की उन्नति में मां-बाप ने अपनी भूमिका निभाई, आर्थिक रूप से उन्हें अपना सहयोग देकर। इस समय अगर हिसाब लगाया जाए तो मध्यवर्ग के परिवारों के तीस से चालीस प्रतिशत बच्चे विदेशों में चले गए हैं और वहीं कोई नौकरी, व्यवसाय या फिर कोई रोजगार कर रहे हैं। लेकिन वे जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, अब लौट कर यहां वापस नहीं आना चाहते। इक्के-दुक्के अपवादों के अलावा उनमें से शायद ही कोई यहां लौटें। उनके देश से बाहर बस जाने के बाद उनके मां-बाप वाली बुजुर्ग पीढ़ी अकेली और असुरक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाती है। न उनके बच्चे उनके पास आकर रहते हैं, न ही वे खुद वहां जाकर रहेंगे। हां, साल या दो साल में कुछ दिनों के लिए ‘अपनी मिट्टी’ पर आते हैं और लौट जाते हैं। माता-पिता को भी पता है कि वहां बच्चों के पास जाकर उनका अकेलापन कम नहीं होगा। बल्कि अजनबी जगह और लोगों के बीच वे और भी अकेले हो जाते हैं। बाहर जाने की सुविधा नहीं होती, बच्चों के पास समय का अभाव होता है।

इसलिए बुजुर्ग अपने घरों और अपने ही देश में रहते हैं। लेकिन असुरक्षित और असहाय भी। बढ़ती उम्र की समस्याओं के साथ कमजोर स्वास्थ्य, अकेले का जीवन और बढ़ते सामाजिक अपराधों के बीच बुजुर्गों की हत्या की घटनाएं अब तेजी से बढ़ती जा रही हैं। समस्या और सघन हो जाती है, जब दोनों में से एक साथी चला जाता है। वे अकेले ही रहते हैं, बच्चे आते भी हैं तो मेहमान की तरह, चार, छह, पंद्रह दिन रह कर उन्हें लौटना होता है। यह स्थिति गांव से शहर और देश से विदेश, दोनों ही स्थितियों में बन गई है। उधर शिक्षित-प्रशिक्षित अच्छी नौकरी करती लड़कियां भी विवाह के बाद, परिवारों में बच्चे की जिम्मेवारी लेने से डरती हैं। बच्चे अकेले घर में मौजूद पुरुष या महिला आया के साथ रहते हैं। कई तरह की मुश्किलें आती हैं, बच्चों का अवसाद या उनका रास्ता भटक जाना और बुरी ‘लत’ में फंस जाना। हमारी पीढ़ी में हम तीन-चार पीढ़ियां साथ-साथ रही हैं। सभी का सहयोग होता था। न बच्चे भटकते थे और न ही बुजुर्ग असहाय होते थे। पर अब उस समय को नहीं लौटाया जा सकता है। विकास की दौड़ में ‘परिवार’ इतने महत्त्वपूर्ण नहीं रहे।

अगर इस समूचे परिदृश्य पर नजर डालें तो अब वृद्धाश्रम कोई गलत व्यवस्था नहीं लगती। अपनी आर्थिक सामर्थ्य के मुताबिक वृद्ध गृहों का चुनाव किया जा सकता है। जिनके पास पैसों की कमी नहीं है, उनके लिए पांच सितारा वृद्ध आश्रम हैं, सारी सुविधाओं के साथ। अन्यथा बीस से तीस हजार रुपए के औसत खर्चे पर भी सामान्य वृद्ध गृह हैं, जहां सभी जरूरी सुविधाएं हैं। वहां वे न केवल सुरक्षित होते हैं, बल्कि अकेले और इतने असहाय भी नहीं होते। एक जगह ऐसे ‘केयर होम’ में एक परंपरा रही है कि स्कूल-कॉलेज और युवा वहां किसी बुजुर्ग को ‘अडॉप्ट’ कर लेते थे। सप्ताह में दो बार आते उनके साथ शतरंज या दूसरे खेल खेलते, बातें करते और उनके अनुभव सुनते। बुजुर्गों में इंजीनियर, डॉक्टर, बहुराष्ट्रीय कंपनियों या सरकारी पदों पर रहने वाले भी मिलेंगे। उनके पास अपने-अपने क्षेत्र में अनुभवों का खजाना है। क्यों नहीं उनके साथ युवाओं का संवाद होना चाहिए, ताकि वे लाभान्वित हो। बुजुर्गों में शक्ति का संचार हो युवाओं के साथ समय बिता कर। हर वृद्ध गृह में इसकी व्यवस्था की जा सकती है। मोहल्लों में और कॉलोनियों के साथ-साथ हर वृद्धाश्रम में भी इसकी व्यवस्था की जा सकती है ताकि जैसे भी हो, पीढ़ियों के बीच संवाद बना रहे।

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