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दुनिया मेरे आगेः बचपन का मजहब

आन्या दिल्ली के एक निजी प्ले स्कूल में नर्सरी कक्षा में पढ़ती है। प्ले स्कूल आधुनिक शिक्षा की उपज है। स्कूल प्रबंधन की तरफ से आन्या और उसके सहपाठियों को पिछले दो वर्षों में चर्च, मंदिर, गुरुद्वारा घुमाने या दिखाने ले जाया गया। इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

(File Photo)

आन्या दिल्ली के एक निजी प्ले स्कूल में नर्सरी कक्षा में पढ़ती है। प्ले स्कूल आधुनिक शिक्षा की उपज है। स्कूल प्रबंधन की तरफ से आन्या और उसके सहपाठियों को पिछले दो वर्षों में चर्च, मंदिर, गुरुद्वारा घुमाने या दिखाने ले जाया गया। इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन स्कूल प्रबंधन ने आन्या और उसके अन्य सहपाठियों को मस्जिद नहीं घुमाया या दिखाया। आन्या और उसके साथ के दूसरे मित्र मस्जिद के बारे में नहीं जानते हैं। क्या यह बात हमारी शिक्षा और उसके तंत्र के धर्मनिरपेक्ष होने पर सवाल खड़ा करती है? यों भी, महानगरों के स्कूल की ओर से बच्चों को धार्मिक स्थलों या पूजा घरों में घुमाना एक चलन बन गया है। इससे वे अपने आप को ज्यादा उदार और आधुनिक समझने लगते हैं।
व्यापकता में देखें तो संदर्भ जुड़े हुए लगते हैं। 1989 में बिहार के शहर सासाराम में एक सांप्रदायिक दंगा हुआ था। उस समय मैं वहां के एक निजी स्कूल में पढ़ता था। दंगा शांत होने के बाद भी कई दिनों तक साथ पढ़ने वाले मुसलिम बच्चे स्कूल नहीं आए। उनकी अनुपस्थिति में एक दिन एक शिक्षक ने पांचवी कक्षा में एक सवाल किया कि देश में दंगा कैसे रुकेगा।

एक छात्र ने दंगा रोकने के उपाय के तौर पर अप्रत्याशित रूप से मुसलिम समाज के खिलाफ नफरत को जाहिर किया। उस छात्र के जवाब से शिक्षक को हतप्रभ और चिंतित हो जाना चाहिए था। यह तो जाहिर था कि इतनी कम उम्र का बच्चा अगर ऐसा कुछ बोल रहा है तो इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं थी, बल्कि वह जिस आबोहवा में पल-बढ़ रहा होगा, उसने उसके भीतर इस तरह के भाव भरे होंगे। उसके बाद शिक्षक को उस बच्चे के साथ संवाद में जाकर मानवीय मूल्यों पर बात करनी चाहिए थी, ताकि उसके दिमाग में जो अब तक भरा गया था, उस पर वह सोचने की प्रक्रिया में जाए। लेकिन शिक्षक के चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं था और न उन्होंने इस मसले पर बच्चे से अलग से बात करने की जरूरत समझी।

सवाल है कि क्या उस शिक्षक को यह नहीं सोचना चाहिए था कि आखिर उस छात्र के मन में यह बात कैसे आई? जबकि उस छात्र का एक दोस्त मुसलिम भी था। एक बात यह भी महत्त्वपूर्ण है कि पांचवीं कक्षा में होने के बावजूद अब तक स्कूली पढ़ाई में ही इस छात्र के सामने न जाने कितनी बार भारत में ‘अनेकता में एकता’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ के बिंदु आए होंगे। तो क्या एक बार फिर उस शिक्षक को धर्मनिरपेक्षता के बारे उस छात्र से बात नहीं करनी चाहिए थी? उसे यह भी बताया जाना चाहिए था कि सांप्रदायिक दंगा होने के पीछे क्या वजह होती है। तब शायद यह पढ़ाई ज्यादा सार्थक होती। संस्थान चाहे कोई भी हो, क्या स्कूली बच्चों को किसी भी एक या खास धर्म से जुड़े विचारों से रूबरू कराया जाना चाहिए? धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर हमारे समाज में काफी बहस होती है। जब कभी किसी घटना को इस्लाम से जोड़ कर देखा जाता है तो सार्वजनिक जगहों पर और मीडिया में राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता पर चर्चा और ज्यादा दिखाई देने लगती है।

सैद्धांतिक तौर पर यह लगता है कि देश के स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देते हैं। खासकर जब हम कई बार स्कूलों में भारत में ‘अनेकता में एकता’ और धर्मनिरपेक्षता विषय पर निबंध लिखते और पढ़ते हैं। स्कूलों की दीवारों पर ‘हिंदू मुसलिम सिख ईसाई, आपस में हैं भाई भाई’ जैसी लाइन खूब लिखी हुई मिल जाती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि देश में धर्मनिरपेक्षता की बात केवल निबंधों और गोष्ठियों तक ही सीमित रहती है। स्कूलों में सर्वधर्म समभाव को दर्शाने की जगह किसी खास धर्म के प्रतीक आमतौर पर देखे जा सकते हैं। स्कूलों में केवल पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को झंडा फहराने से देशभक्ति साबित नहीं होती है।

इसके लिए स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को ठीक करना होगा। हाल ही में एक अखबार के स्थानीय संस्करण में एक खबर छपी कि बिहार के रोहतास जिले के एक गांव में एक स्कूल केवल पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को झंडा फहराने के लिए ही खोला जाता है। पटना के एक विश्वविद्यालय में लड़कों के छात्रावास जातियों के आधार पर आज भी बंटे हुए हैं। अगर वास्तव भारत को एक विकसित और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनना है तो पहले इसकी बुनयादी शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव लाना होगा, ताकि स्कूलों से पढ़ कर निकलने वाले बच्चों में सभी धर्मों के प्रति समान भाव हो और धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद और भारत में ‘अनेकता में एकता’ जैसे विषय बच्चों को केवल परीक्षा पास करने के लिए न पढ़ना पड़े। वे इसे अपने जीवन में भी उतार सकें।

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