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दुनिया मेरे आगेः यादों में झूल

एक समय था जब सावन माह आरंभ होते ही घर के आंगन में लगे पेड़ पर झूले पड़ जाते थे और महिलाएं गीतों के साथ उसका आनंद उठाती थीं।

Author August 5, 2016 2:57 AM
(File Photo)

रमेश सर्राफा धमोरा

एक समय था जब सावन माह आरंभ होते ही घर के आंगन में लगे पेड़ पर झूले पड़ जाते थे और महिलाएं गीतों के साथ उसका आनंद उठाती थीं। समय के साथ पेड़ गायब होते गए और बहुमंजिला इमारतें बनने से आंगन का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बन कर गायब हो रहे हैं। अब सावन माह में झूले कुछ जगहों पर ही दिखाई देते हैं। वर्षा ऋतु की खूबियां अब किताबों तक सीमित रह गई हैं। वर्षा ऋतु में सावन की महिमा धार्मिक अनुष्ठान की दृष्टि से तो बढ़ जाती है, लेकिन प्रकृति के संग जीने की परंपरा थमती जा रही है। आधुनिकता की दौड़ में प्रकृति के संग झूला झूलने की बात अब कहीं नहीं दिखती है। ग्रामीण क्षेत्र की युवतियां भी सावन के झूलों का आनंद नहीं उठा पाती हैं। इसका कारण जनसंख्या घनत्व में वृद्धि के साथ ही वृक्षों की कटाई को माना जाता है।

सावन में प्रकृति शृंगार करती है जो मन को मोहने वाला होता है। यह मौसम ऐसा होता है जब प्रकृति खुश होती है तो लोगों का मन भी झूमने लगता है। झूला इसमें सहायक बन जाता है। खासतौर पर महिलाएं और युवतियां इसकी शौकीन होती हैं। यह भी माना जाता है कि इससे प्रकृति के निकट जाने और उसकी हरियाली बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है। झूला झूलने के दौरान गाए जाने वाले गीत मन को सुकून देते हैं। लेकिन अब झूले की परंपरा लुप्त हो रही है। सावन-भादों की खुशबू अब नहीं दिखती है। इन झूलों के नहीं होने से लोक-संगीत भी अब शायद ही कहीं सुनने को मिलता है। जबकि पहले सावन आते ही गली-कूचों और बगीचों में मोर, पपीहा और कोयल की मधुर बोली के बीच युवतियां झूले का लुत्फ उठाया करती थीं। अब न तो पहले जैसे बगीचे रहे और न ही मोर की आवाज सुनाई देती है। बिन झूला झूले ही सावन गुजर जाता है। लगातार किसी न किसी तरह की प्राकृतिक आपदाओं के कहर का असर माना जाए या वन माफियाओं की टेढ़ी नजर का परिणाम कि गांवों में भी अब बगीचे तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं। अब वहां न युवा वर्ग को अपने मनोरंजन के लिए झूला डालने की जगह है न मोर या दूसरे पक्षियों के विचरने के लिए सुरक्षित जगह।

मेरे गांव की बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि कभी सावन नजदीक आते ही बहन-बेटियां ससुराल से मायके बुला ली जाती थीं। घर-परिवार में मिलने-जुलने से ज्यादा उत्साह इस बात का होता था कि सखियों के साथ झूला कहां और कैसे झूला जाए। झुंड के रूप में इकट्ठा होकर महिलाएं एक बार के जमावड़े में दर्जनों सावन के गीत गाया करती थीं। एक महिला ने बताया कि त्योहार में बेटियों को ससुराल से बुलाने की परंपरा तो आज भी चली आ रही है, लेकिन जगह के अभाव में न तो कोई झूला झूल पाता है और न ही अब मोर, पपीहा और कोयल की सुरीली आवाज ही सुनने को मिलती है। अब पेड़ ही नहीं हैं तो झूला कहां डाला जाए!

खासतौर पर शहरों में जगह की कमी ने हालत यह बना दी है कि अब झूला लगाने के लिए जगह की तलाश करनी पड़ती है। पहले संयुक्त परिवार में बड़े-बूढ़ों के सान्निध्य में लोग एक दूसरे के घरों से जुड़ते थे। जबकि एकल परिवार ने इस आपसी स्नेह को खत्म कर दिया है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि महिलाएं सामुदायिक भवनों में त्योहार मनाने इकट्ठा होती हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से खुशियां बांटती हैं, लेकिन सावन के झूले जैसे सहज और सामाजिक साधन अब नहीं हैं।

आज भौतिकवाद ने एक-दूसरे के प्रति लगाव भी खत्म कर दिया है। घरों की बालकनियों या छोटे लॉन में लोहे और बांस के झूले लगा लिए जाते हैं और परंपरा का निर्वाह मान लिया जाता है। बड़े-बड़े मॉलों के पास बहुत ऊंचाई और जोखिम वाले झूले दिख जाते हैं। लेकिन झूले का वास्तविक आनंद उसकी कृत्रिमता में नहीं, झूलों की सहजता में है।
मुझे लगता है कि इन सब कारणों के अलावा एक और बड़ी वजह है जिससे झूला खत्म हो रहा है। पहले गांव के लोग हर बहन-बेटी को अपनी मानते थे। लेकिन आज पड़ोस से लेकर संबंधों तक का स्वरूप बहुत विकृत हुआ है। जिसके हाथ में रक्षा सूत्र बांधा जाता है, कई बार वही भक्षक बन जाता है। बाग-बगीचों के खात्मे के साथ जहां मोर-पपीहों की संख्या घटी है, वहीं समाज में बढ़ती संवेदनहीनता के कारण भाईचारे में बेहद कमी आई है। जबकि झूला तो संवेदना और सामाजिक सद्भाव के सहारे वातावरण में आनंद घोलता है।

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