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दुनिया मेरे आगेः सरोकार का हाशिया

इतिहास में दर्ज बहुत सारी बातें अक्सर राजनीति का मोहरा बनती रही हैं और आमतौर पर यह सत्ता की सुविधा और उसके अनुकूल होने से तय होता है।
Author March 4, 2017 03:35 am
मुमताजमहल का बेटा दारा शिकोह

कुमकुम सिंह

इतिहास में दर्ज बहुत सारी बातें अक्सर राजनीति का मोहरा बनती रही हैं और आमतौर पर यह सत्ता की सुविधा और उसके अनुकूल होने से तय होता है। कोई प्रसंग अचानक उभर कर शांत हो जाता है, लेकिन उसके संदर्भ आम नहीं हो पाते हैं, इसलिए उसकी अहमियत भी गुम रह जाती है। मसलन, अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब सोलहवीं सदी का एक शहजादा निजामुद्दीन की अपनी नामालूम कब्र से निकल कर दिल्ली की डलहौजी रोड पर खड़ा हो गया। राजनीतिक इतिहास की मौत मरे दाराशिकोह ने भारत को डाक की व्यवस्था देने वाले लंदन से आए लॉर्ड को दिल्ली की सड़क से विस्थापित कर दिया। लेकिन इतिहास किसी को नहीं बख्शता। इसलिए दाराशिकोह का भी हिसाब हुआ। कॉलेज के बाद दाराशिकोह का मेरी स्मृतियों से लोप हो चुका था।

मैं उसके बारे में उतना ही जानती थी, जितना बारहवीं के इम्तिहान में पास होने के लिए जरूरी था। लेकिन दिल्ली नगर निगम में एक मुगल शहजादे के नाम पर सड़क के नामकरण ने चौंकाया। इसके बारे में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। फिर मैंने दाराशिकोह की सियासत पर तफसील से पढ़ा और कुछ डॉक्यूमेंट्री देखी। शाहजहां को दो बेटियों के बाद चार बेटे हुए- दाराशिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श। सबसे बड़े दाराशिकोह पिता को सबसे अजीज थे। इसकी वजह थी। वे जितना सम्मान मौलवियों का करते, उतना ही आदर योगियों का भी। सूफियों और संन्यासियों की संगत उनकी सियासत की पाठशाला थी। सिख धर्म में भी उनकी गहरी रुचि थी। शुरुआती सालों में इस्लामी बादशाहत के उत्तराधिकार का कोई तय नियम नहीं था। इसीलिए सगे भाइयों में खूनी संघर्ष चलता रहा। शाहजहां के चारों बेटे आपस में दुश्मनों की तरह पेश आते थे।

रोज-रोज की कलह से परेशान शाहजहां ने चारों को चार सूबे सौंप दिए। लेकिन 1657 में जब औरंगजेब आगरा में गद्दी हथियाने की तैयारी में लगा था तो दाराशिकोह फारसी अदब, इतिहास, संस्कृत और योग सीख रहे थे। शानदार तालीम के बाद दारा ने एक बेमिसाल किताब मजमा-उल-बहरीन लिखी। यानी दो सागरों का मिलन। यह सूफीवाद और सनातन धर्म के बीच समानता का पता लगाने का पहला प्रयास था। उन्होंने संस्कृत के जानकारों की मदद से पचास उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में खुद अनुवाद किया। वे अकबर और हुमायूं से बहुत प्रभावित थे। जाहिर है, ये वे बातें थीं जो उस वक्त की हिंदुस्तानी हुकूमत और मिजाज के खिलाफ थीं। शिकोह का साहस युद्ध का साहस नहीं था, विचारों का साहस था। जनता के सभी तबकों में दाराशिकोह की लोकप्रियता बेहिसाब थी। दारा ने अपनी किताब में लिखा- ‘जन्नत जैसी भी हो, कम से कम वहां मुल्ला या उनका शोर तो बिल्कुल नहीं हैं।’ मतलब भारत का संविधान लिखे जाने से कोई चार सौ साल पहले ही दाराशिकोह को समझ में आ गया था कि यही इस मुल्क की आत्मा है।

मौजूदा दौर में इस बात की अहमियत शिद्दत से महसूस होती है। सबसे महत्त्वपूर्ण दाराशिकोह का व्यक्तित्व साधारणता की भव्यता की मिसाल था। फ्रांस से आकर भारत में लंबा समय गुजारने वाले दाराशिकोह के समकालीन बर्नियर के मुताबिक दारा लोगों को प्रभावित करने में उस्ताद थे। उन्होंने बुजी नामक एक पादरी से लंबे समय तक शिक्षा ली थी। उनके तोपखाने में ईसाई भी थे। लेकिन सर्वधर्म समभाव के पुजारी दाराशिकोह का एक पहलू और भी है। इतिहासकार कहते हैं कि दारा तुनकमिजाज और बेहद आत्ममुग्ध थे। किसी की सलाह उन्हें नहीं सुहाती थी, क्योंकि वे खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते थे। उनका यही स्वभाव उनकी अकाल मृत्यु का कारण बना। दरअसल, उन्हें सही सूचना देने से सभी घबराते थे। कभी वे उपनिषदों में खोए रहे, कभी नमाज में तो कभी सिख संगत में। इस चक्कर में उन्होंने तमाम उलझनें बुन ली थीं। शायद वे तय नहीं कर पाए कि वे इतिहास में कैसे दर्ज होना चाहते हैं- शासक या संत। उन्हें दोनों बनना था।

आप इंसान कितने भी अच्छे हों, लेकिन युद्ध में महत्त्वपूर्ण यह है कि आप कितने अच्छे योद्धा हैं। औरंगजेब का इसमें कोई सानी नहीं था। आगरा की निर्णायक जंग में शिकोह का हाथ ऊपर था। उनके सैनिक लाखों में थे और औरंगजेब के हजारों में। लेकिन रणनीति की कमी और बचकाने फैसलों ने दारा को पराजय दी और दिल्ली की सड़कों पर जिल्लत की मौत। उन्हें मारने से पहले हाथी पर बांध कर गलियों में घुमाया गया था।

इतिहासकारों का मत है कि अगर औरंगजेब की जगह शिकोह के हाथ में सत्ता होती तो मुगलिया सल्तनत का यों पतन न होता, समाज यों न बंटता, अंग्रेजों की घुसपैठ न हो पाती। यह आकलन सही या गलत हो सकता है। लेकिन क्या होता, इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि क्या हुआ। सच यह है कि इसी दिल्ली के कश्मीरी गेट में दाराशिकोह के नाम पर चलने वाली साढ़े तीन सौ साल पुरानी विशाल लाइब्रेरी खंडहर में बदल चुकी है। वहां अब कोई नहीं जाता। यह खंडहर समानता और भाईचारे के मूल्यों में हमारे सामूहिक विश्वास का खंडहर है। सड़क का नाम सियासत को तो बचा लेता है, लेकिन सरोकारों को नहीं।

 

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