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दुनिया मेरे आगेः सुकून की उड़ान

मेरी एक मित्र को मोबाइल के वाट्सऐप पर एक बुरा समाचार मिला तो उससे पैदा हुए तनाव से उसकी हालत बिगड़ गई।

Author Published on: March 30, 2017 2:29 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

एकता कानूनगो बक्षी

मेरी एक मित्र को मोबाइल के वाट्सऐप पर एक बुरा समाचार मिला तो उससे पैदा हुए तनाव से उसकी हालत बिगड़ गई। स्थिति यह हो गई कि उसे डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा। बाद में पता चला कि वह एक गलत और किसी दूसरे का फॉरवर्ड किया गया मैसेज था। ऐसा इन दिनों अक्सर होता रहता है, क्योंकि जब से नई तकनीकी आई है, अच्छी या बुरी सूचनाएं तुरंत बिना सोचे-समझे भावावेश में सबसे पहले भेजने की लालसा में अपने नजदीकी लोगों को भी प्रेषित कर दी जाती हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। अच्छी या बुरी खबर पर घर के बड़े-बुजुर्गों का नियंत्रण होता था। परिवार के बड़े लोग दुनिया के कई अनुभवों से गुजर कर यह सोच बनाते थे और खयाल रखते थे कि क्या अच्छा रहेगा और किस बात से बात बिगड़ जाएगी। मेरे दादा अक्सर बताते थे कि जब वे बहुत छोटे थे, तब एक दिन सुबह-सुबह स्कूल भेज दिए गए थे। जबकि उसी रात उनकी दादी का निधन हुआ था। जब वे परीक्षा देकर वापस घर लौटे तब तक दादी का अंतिम संस्कार आदि कर दिया गया था। हालांकि उन्हें जीवन भर इस बात का मलाल रहा, लेकिन घर के बुजुर्गों की सूझबूझ से वे पूरक परीक्षा से बच गए और एक साल बिगड़ने से भी बच गया। अब यह स्थिति बहुत कम दिखाई देती है।

अब तकनीकी के रोज आधुनिक होते जाने के बल पर दुनिया भी लगातार छोटी होती जा रही है, उसका दायरा रोज सिकुड़ता जा रहा है। आज हम मीलों दूर बैठे अपने परिजन को खुश होने का अवसर दे सकते हैं तो दूर बैठे किसी व्यक्ति को सिरदर्द भी तोहफे में दे सकते हैं। दूसरे के सुख और दुख की चाबी कुछ हद तक अब हमारे पास भी मौजूद है। कोई छोटी-सी बात जैसे ही सामने आती है, हमारा पूर्णकालिक यानी हर वक्त साथ रहने वाला हरकारा स्मार्ट फोन हमारी उंगलियों के निर्देश पर हरकत के लिए हाजिर हो जाता है। एक बटन दबाया और दूसरे छोर पर प्रतिक्रिया शुरू। खुशी हो या दुख देने वाली कोई अप्रिय सूचना, तुरंत असर करने लगती है। इसके नतीजों के बारे में पड़ताल का समय हमारे पास नहीं होता! ऐसा लगता है कि इस तेज रफ्तार हो जा रहे जमाने में सोचना और विचार करना एक पुरानी और बीत गई बात मानी जाने लगी है। संदेश मिलते ही उधर दूसरे पक्ष ने सिरदर्द की गोली ली और आगे का काम मिनटों के भीतर शुरू कर दिया। देखते ही देखते सालों से चला आ रहा रिश्ता टूट कर बिखर जाता है।
मुझे लगता है कि पहले ऐसा नहीं होता होगा। परिवार में सूझ-बूझ वाले कई फिल्टर यानी बात बिगड़ने पर संभालने वाले लोग और तरीके मौजूद होते थे। यहां तक कि शोक समाचार भेजते समय चिट्ठी का एक सिरा काट या जला दिया जाता था, ताकि सामने वाले को बुरी खबर का सामना करने के लिए कुछ पल मिल सके। पहले भी सब अपनी अच्छी या बुरी खबर साझा करते थे, लेकिन तब किसी न किसी का विश्वास से भरा हाथ जरूर हमारे कंधे पर रहता था। अब इस तरह के तेज गति से संवादों के इधर से उधर होने के दौर में कोई संदेश आगे किसी को भेज दिए जाते हैं, बिन यह जाने कि प्राप्तकर्ता की मनोदशा, स्थिति कैसी होगी! कुछ तो नियम होने ही चाहिए। मसलन, आज हम अंतरराष्ट्रीय मैसेज करते हैं तो वहां का समय और स्थितियां हमारे दिमाग में होने चाहिए। वह संदेश पाने वाले की मन:स्थितियों और उसके विश्राम, अध्ययन और दफ्तरी व्यस्तताओं का खयाल रखा जाना जरूरी है। सामने वाले की जगह खुद को रख कर भी सोचना विवेक-सम्मत रहता है।

दुनिया का जीने का अब नया अंदाज है। हर व्यक्ति न जाने किस पदक की लालसा में मैराथन दौड़ लगा रहा है। कभी-कभी तो इतनी भागम-भाग का समय होता है कि हम थोड़े-से ठहराव की अपेक्षा लिए सोचते हैं कि थोड़ी देर के लिए सब कुछ से दूर हो जाएं। कोई हम तक पहुंच नहीं पाए। कुछ देर थोड़ा रुक कर सोचें, कुछ देर अकेले केवल अपने साथ रहें। कुछ देर के लिए अल्पकालीन शून्य का सुख हम जी लें। मतलब जीवन का रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से हमारे अपने हाथ में हो। क्या ऐसा नहीं लगता कभी-कभी!
भले ही मोबाइल फोन में ‘फ्लाइट मोड’ का एक विकल्प किन्हीं अन्य कारणों से रहा होगा। लेकिन कभी-कभार मोबाइल बन चुकी अपनी जिंदगी को भी इस स्थिति में लाकर देखा जाए। मेरा खयाल है कि उस वक्त अपनी जिंदगी की तस्वीर थोड़ी और साफ दिखेगी। हम किसी खास जगह के लिए हवाई उड़ान में तो नहीं होंगे, लेकिन कुछ समय के लिए सुकून से भरी अपनी जिंदगी की एक उड़ान जरूर भर सकेंगे। कोशिश करके देखने में क्या हर्ज है…!

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