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दुनिया मेरे आगेः मीडिया के कार्यक्रम

क्या टेलीविजन चैनलों पर आने वाले कार्यक्रम किसी की मंगनी तोड़ सकते हैं? यह सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन ऐसा हुआ है।

Author October 27, 2017 2:22 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

क्या टेलीविजन चैनलों पर आने वाले कार्यक्रम किसी की मंगनी तोड़ सकते हैं? यह सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन ऐसा हुआ है। दरअसल, इसमें कार्यक्रम का कोई दोष नहीं है न ही टेलीविजन का। हमारे समाज में आम बातचीत में दूसरे के तर्क को सुनने का धैर्य ही खत्म होता जा रहा है। छोटी-मोटी बातों को भी लोग अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लेते हैं। और लड़ाई-झगड़ा तो क्या मारपीट पर भी उतारू हो जाते हैं। हम जो घटना आप को बता रहे हैं, वह कुछ अलग किस्म की है। मीडिया के प्रभाव पर चर्चा के दौरान कक्षा में हिमांशु ने एक वाकया सुनाया। उसने बताया कि कैसे एक हिंदी न्यूज चैनल में रात नौ बजे दिखाए जाने वाले कार्यक्रम की वजह से उसके बड़े भाई की मंगनी टूट गई और उसने अपने भाई द्वारा इसी घटना पर सोशल साइट पर साझा की गई पोस्ट को कक्षा में पढ़कर भी सुनाया।

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पोस्ट में लिखा गया था कि मंगनी के बाद दो तीन महीने तक उसकी अपनी मंगेतर से नियमित बातचीत होती थी। इस प्रेम-वार्तालाप में हिंदी न्यूज चैनल के उस कार्यक्रम का जिक्र होने लगा। पोस्ट के अनुसार लड़की को उस कार्यक्रम से काफी लगाव था लेकिन लड़का उस पर सवाल खड़े करता और उसकी आलोचना करता। यह बात लड़की और उसके घर वालों को नागवार गुजरने लगी। आखिरकार स्थिति यहां तक पहुंच गई कि लड़की और उसके परिजनों ने इस रिश्ते को ही खत्म लिया। खैर, पोस्ट के अंत में लड़के ने लिखा कि अच्छा हुआ कि रिश्ता टूट गया वरना हर दिन खाने की मेज पर इस ‘न पचने’ वाले कार्यक्रम की चर्चा होती और बातें सुननी पड़तीं। यह वाकया सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन यह एक गंभीर सवाल खड़े करता है कि कैसे हम खबरों वाले कार्यक्रम से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, जबकि सैद्धांतिक तौर पर खबरों का भावनाओं से कोई लगाव नहीं होता है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि इस कार्यक्रम को भावनाओं से जोड़कर परोसा जाता हो। आस्था के स्कूल की एक शिक्षक ने रोज इस कार्यक्रम को देखने के लिए स्पष्ट रूप से कहा है ताकि अगले दिन कक्षा में इस पर चर्चा हो। आस्था बनारस के एक निजी स्कूल में बारहवीं की छात्रा है।

एक बार यात्रा के दौरान आॅटो चालक ने बीच में रुक कर एक हिंदी का अखबार खरीदा तो मैंने उससे पूछा कि आपने क्यों इसी अखबार को खरीदा? उसने जवाब दिया कि इस अखबार की बातें बड़ी अपील करती हैं और मेरे मन को छूती हैं। किसी भी अखबार को पढ़ने के पीछे यह कारण कितना सही है, इस पर विचार करने की जरूरत है। हमारा किसी भी मीडिया या इसके कार्यक्रम से भावनात्मक रूप से जुड़ना कितना जायज है? दरअसल, किसी भी मीडिया या इसके कार्यक्रम से इस तरह से जुड़ना आपकी तार्किकता को नष्ट करता है और सही और गलत की पहचान को खत्म करता है। संचार विज्ञान के जानकर रेमंड विलियम के अनुसार हम किसी मीडिया या कार्यक्रम के आदी हो जाते हैं और कुछ समय बाद उसकी विशिष्ट विषय वस्तु को ज्यों का त्यों स्वीकार करने लगते हैं। हम दुनिया को अपने चहेते मीडिया या कार्यक्रम के नजरिए से देखने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि आखिरकार यह दुनिया को देखने के अनेक तरीकों में से केवल एक तरीका है।

जब देश में एक मात्र टीवी चैनल दूरदर्शन था तो नब्बे के दशक में उस पर धारावाहिक रामायण और महाभारत का प्रसारण होता था। ‘रामायण’ में राम का किरदार अरुण गोविल और सीता का किरदार दीपिका ने निभाया था। उस धारावाहिक का प्रभाव समाज में इतना हुआ कि अरुण गोविल राम के और दीपिका सीता के प्रतीक हो गए। शायद इसी कारण घरों में, फिल्मों में, टीवी चैनलों पर राम और सीता के बदले अरुण गोविल और दीपिका के फोटो टंगने और दिखाए जाने लगे। कुछ चैनलों पर यह आज भी जारी है। लोग यह भूल जाते हैं कि अरुण गोविल और दीपिका केवल पात्र थे। उसी दौर में महाभारत में कृष्ण की भूमिका निभाने वाले नितीश भारद्वाज लोकसभा का चुनाव जीत गए। इस जीत में उनकी कृष्ण की भूमिका एक बड़ी वजह थी क्योंकि लोग उन्हें कृष्ण के रूप में देखने लगे थे।

जनसंचार विषय के एक सिद्धांत के अनुसार मीडिया कई बार खबरों में भावनात्मक चीजें जोड़कर दिमाग पर ठीक उसी तरह हमला करता है जिस तरह किसी को मारने के लिए बुलेट से हमला किया जाता है ताकि इसका प्रभाव सटीक और असरदार हो। भारतीय समाज अभी उतना तार्किक नहीं है जो मीडिया में छपने और दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों का विश्लेषण कर सके। आज भी हम लोगों को यह कहते अक्सर सुनते हैं कि फलां चीज मीडिया में छपी या दिखाई गई है, तब उसका मंतव्य यही होता है कि जो कुछ दिखाया गया है, वह सच है।

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