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दुनिया मेरे आगेः पौरुष के मारे

पिछले दिनों रेडियो कार्यक्रम बनाने के सिलसिले में किशोर उम्र के लड़कों से बातचीत हो रही थी। उनसे पूछा गया कि आप पर दबाव किस चीज का है। बहुत सारे जवाब आए।

Author Updated: February 4, 2017 3:14 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

सौम्या झा

पिछले दिनों रेडियो कार्यक्रम बनाने के सिलसिले में किशोर उम्र के लड़कों से बातचीत हो रही थी। उनसे पूछा गया कि आप पर दबाव किस चीज का है। बहुत सारे जवाब आए। पढ़ाई का, कॅरियर का, अच्छा लगने का और महिला मित्र बनाने का। बहन की सुरक्षा का, भले ही बहन उनसे कई साल बड़ी क्यों न हो! घर की ‘इज्जत’ का भी दबाव था, लेकिन उनके लिए सकारात्मक। किशोर लड़कों के मुताबिक यह उनकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, यानी घर की औरतों की सुरक्षा की जिम्मेदारी। जब उनसे हमने पूछा कि यह जिम्मेदारी किसने दी? आप क्यों बेवजह ज्यादा बोझ उठा रहे हैं, पहले ही इतना भार है, पढ़ाई और कॅरियर का? इस पर सबने कहा कि फिर कौन करेगा! आसपास के लोग कहेंगे कि बहन को काबू में रख, जमाना खराब है! कैसा भाई है जो बहन को अकेली जाने देता है! फिर दोस्त-रिश्तेदार भी कहते हैं, भाई हो, घर के चिराग हो, मर्द बनो…!
चौदह-पंद्रह वर्ष की उम्र में ‘मर्द’ का अर्थ भले न मालूम हो, लेकिन बार-बार ‘मर्दानगी’ का सबूत मांगा जाता है। सवाल है कि ‘मर्द’ कौन है? भारी आवाज वाला, हट्टा-कट्टा, जवान, चौड़ी छाती, मूंछ वाला या फिर बच्चा पैदा करने, मारने वाला, पीटने वाला, हिम्मत वाला, ताकत वाला? मैं जब यह कह रही थी तो उनके बीच से आवाज आई कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता।’ यानी मर्द रोते या कराहते नहीं…! सीधी-सी बात है। जिसमें ऐसे सारे गुण हैं, वही असली ‘मर्द’ है, उसी में ‘मर्दानगी’ है! धारणा यही है।
बचपन में एक कविता पढ़ी थी- ‘खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी!’ यह ‘मर्द’ की कौन-सी नई परिभाषा है? असल में जिसके पास ताकत है, समाज ने उसे ‘मर्द’ का दर्जा दिया। एक बार मेरी दोस्त बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर रही थी। वहां ज्यादा लोग नहीं थे। उसने ध्यान से देखा कि चौबीस-पच्चीस साल का एक लड़का वहीं खड़ी दूसरी लड़की को घूर रहा था। मेरी दोस्त ने दो-तीन बार देखा। जब उससे रहा नहीं गया तो उसने उस लड़के को ही घूरना शुरू कर दिया, ठीक उसी तरह। लड़का सकपका कर निकल गया। असल में यही ताकत शायद हावी होने की सत्ता ले आती है। अगर आपने अपने सारे निर्णय खुद लिए हों, चाहे वे यौनिक हों, सामाजिक हों या फिर आर्थिक, तो सत्ता आपके खेमे में। आसानी से समझा जा सकता है कि इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष को सत्ता मिली और ‘मर्दानगी’ की कहानी इसके इर्द-गिर्द बुनी गई।
सामाजिक कार्यकर्ता कमला भसीन की बात याद करूं तो ‘कुदरत को विविधता पसंद है। वह भेद बनाती है, भेद-भाव नहीं बनाती है। कुदरत अनुक्रम (हाइरार्की) नहीं बनाती। कुदरत ने ये कभी नहीं कहा कि मर्द औरत से बेहतर या औरत मर्द से बेहतर। समाज ने कुदरत के इस भेद को भेद-भाव और असमानता में बदल दिया। सबसे बड़ा अनुक्रम (हाइरार्की) है पुरुष और स्त्री के बीच।’ इस गैरबराबरी के कारण कितनी औरतों को जानलेवा हिंसा तक का शिकार होना पड़ता है। यह सब सिर्फ पितृसत्ता पर आधारित व्यवस्था की वजह से, जिसका मानना है कि पुरुष उत्तम और औरत निम्न है। इस व्यवस्था में पुरुषों का संसाधनों पर, निर्णय लेने पर और विचारधारा पर अधिक नियंत्रण है। इसमें औरतें भी शामिल हैं। हालांकि इस व्यवस्था ने पुरुषों का भी जीना मुहाल कर रखा है। पांच साल के भाई पर यह दबाव है कि वह अपने से कई साल बड़ी बहन के साथ बाजार जाए उसकी रक्षा करने। अब यह अलग बात है कि मुसीबत जब आए तो बहन अपनी रक्षा करे या भाई की!

द वाइपी फाउंडेशन संस्था किशोरों के साथ ‘मर्दानगी’ के मसले पर भी काम करती है। मर्दानगी को समझने और उसे चुनौती देने के लिए उन्होंने लखनऊ के स्कूल-कॉलेजों में पोस्टर के जरिए यह अभियान चलाया कि कैसे पुरुषों पर भी दबाव है मर्दानगी दिखाने का और कैसे ये मर्दानगी हिंसा से जुड़ी है। इसे समझने का प्रयास किया जाए। इन पोस्टरों में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक तिरानबे प्रतिशत लोगों ने कहा कि रिश्ते में नियंत्रण रखना ही मर्दानगी की निशानी है। नब्बे प्रतिशत युवा दोस्तों से अपने मन की बात साझा नहीं कर पाते। यानी अपनी बात अपने तक रखना मर्द होने की निशानी है। लड़कों से यह भी पूछा गया कि सारी गालियां औरतों को ही लक्षित क्यों हैं और उन्हें ही चोट क्यों पहुंचाती हैं।

मेरा एक दोस्त है दुबला-पतला। वह पहले कई बार परेशान हो जाता था जब उसके दोस्त या रिश्तेदार उसके शरीर को लेकर ताना देते थे। कहते थे कि शरीर बनाओ और आवाज में मर्दों की तरह भारीपन लाओ। उसने यह सब किया। लेकिन थोड़े ही दिनों में उकता गया। अब वह किसी की नहीं सुनता है। गुस्से में कहता है कि मुझे समाज का ऐसा मर्द नहीं बनना…! मैं इंसान हूं, यह काफी है। हमें भी तो बस इतनी-सी बात समझनी है!

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