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दुनिया मेरे आगे: रिवायत का दंश

प्रेम प्रकाश समाज में अनिवार्य मानी जाने वाली विवाह संस्था को लेकर बहस इसलिए भी बेमानी है कि इसके लिए जो भी कच्चे-पक्के विकल्प सुझाए जाते हैं, उनके सरोकार ज्यादा व्यापक नहीं हैं। लेकिन बुरा यह लगता है कि जिस संस्था की बुनियादी शर्तों में लैंगिक समानता सुनिश्चित होनी चाहिए, वह या तो दिखती नहीं […]

Author August 26, 2016 1:00 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

प्रेम प्रकाश

समाज में अनिवार्य मानी जाने वाली विवाह संस्था को लेकर बहस इसलिए भी बेमानी है कि इसके लिए जो भी कच्चे-पक्के विकल्प सुझाए जाते हैं, उनके सरोकार ज्यादा व्यापक नहीं हैं। लेकिन बुरा यह लगता है कि जिस संस्था की बुनियादी शर्तों में लैंगिक समानता सुनिश्चित होनी चाहिए, वह या तो दिखती नहीं या फिर दिखती भी है तो खासे भद्दे रूप में। फिलहाल तो बस इतना ही देखें कि मंगलसूत्र से लेकर सिंदूर तक ‘विवाह सत्यापन’ के जितने भी प्रतीक चिह्न हैं, वे सिर्फ महिलाओं को धारण करने होते हैं। पुरुष का विवाहित-अविवाहित होना उस तरह चिह्नित नहीं होता जिस तरह महिलाओं का। यही नहीं, महिलाओं के लिए यह सब उसके सौभाग्य से भी जोड़ दिया गया है। शायद इसीलिए न सिर्फ विवाहित स्त्री, बल्कि एक ‘विधवा’ कही जाने वाली स्त्री की भी पहचान आसान है, लेकिन एक विवाहित पुरुष से लेकर विधुर तक की नहीं।

अपनी शादी का एक अनुभव आज तक मन में एक गहरे सवाल की तरह धंसा हुआ है। मुझे शादी हो जाने तक नहीं पता था कि मेरी सास कौन है। जबकि ससुराल के ज्यादातर संबंधियों को इस दौरान न सिर्फ उनके नाम से मैं भली-भांति जान गया था, बल्कि उनसे बातचीत भी हो रही थी। बाद में जब मुझे सच्चाई का पता चला तो आंखें भर आर्इं। दरअसल, मेरे ससुर का निधन कुछ साल पहले हो गया था। लिहाजा, मांगलिक क्षण में किसी ‘अशुभ’ से बचने के लिए वे शादी मंडप पर नहीं आर्इं। ऐसा करने का उन पर परिवार के किसी सदस्य की तरफ से दबाव तो नहीं था, लेकिन यह सब जरूर मान रहे थे कि यही लोक परंपरा है और इसका निर्वाह अगर होता है तो बुरा नहीं है!

खैर, शादी के बाद मुझे और पत्नी को एक कमरे में ले जाया गया। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा था। सब लोग इस तरह शांत और गुमसुम थे कि चाह कर भी किसी से कुछ पूछ नहीं सकता था। उस कमरे में एक तस्वीर के आगे चौमुखी दीया जल रहा था। तस्वीर के आगे एक महिला बैठी थीं। पत्नी ने आगे बढ़ कर उनके पांव छुए। बाद में मैंने भी ऐसा ही किया। तभी बताया गया कि वे और कोई नहीं, मेरी सास हैं। सास ने तस्वीर की तरफ इशारा किया। उन्होंने भरी आवाज में कहा कि सब इनका ही आशीर्वाद है, आज वे जहां भी होंगे, सचमुच बहुत खुश होंगे और अपनी बेटी-दामाद को आशीष दे रहे होंगे। दरअसल, वह मेरे दिवंगत ससुर की तस्वीर थी। तब जो बेचैनी इन सारे अनुभवों से मन में उठी थी, आज भी मन को भारी कर जाती है।

सास-बहू मार्का या पारिवारिक कहे जाने वाले जिन धारावाहिकों की आज टीवी पर भरमार है, उनमें भी कई बार इस तरह के वाकये दिखाए जाते हैं। मेरे पिता का पिछले साल निधन हुआ है। पिता चूंकि लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में रहे, सो ऐसी परंपराओं को सीधे-सीधे दकियानूसी ठहरा देते थे। लेकिन आश्चर्य होता था कि मां को इसमें कुछ भी अटपटा क्यों नहीं लगता था! उलटे वे कहतीं कि नए लोग अब कहां इन बातों की ज्यादा परवाह करते हैं! जबकि उनके समय में तो जिन महिलाओं के पति की मौत हो चुकी हो, उनके लिए न सिर्फ शादी-विवाह में, बल्कि बाकी समय में भी बोलने-रहने के अपने विधान थे। वे किसी बात पर खुश हो सकती थीं, लेकिन पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ मनाई जाने वाली खुशी में शामिल नहीं हो सकती थीं। सिर्फ इस मान्यता के चलते कि उनकी मौजूदगी उस खुशी को किसी ‘अशुभ’ में बदल देगी।

मां अपनी दो बेटियों और दो बेटों की शादी करने के बाद उम्र के सत्तरवें पड़ाव को छूने को हैं। संत विनोबा से लेकर प्रभावती और जयप्रकाश नारायण तक कई लोगों के साथ रहने, मिलने-बात करने का मौका भी मिला है उन्हें। देश-दुनिया भी खूब देखी है। पर पति ही ‘सुहाग-सौभाग्य’ है और उसके बिना एक ब्याहता के जीवन में अंधेरे के बिना कुछ नहीं बचता। वह सीख मन में नहीं, बल्कि नस-नस में दौड़ती है। किसी पुरुष के साथ होने की प्रामाणिकता की मर्यादा और इसके नाम पर निभती आ रही परंपरा इतनी गाढ़ी, गहरी और मजबूत है कि स्त्री स्वतंत्रता के ललकार भरते दौर में भी पुरुष दासता के इन प्रतीकों की न सिर्फ स्वीकृति है, बल्कि यह प्रचलन कम होने का नाम भी नहीं ले रहा। उत्सवधर्मी बाजार महिलाओं की नई पीढ़ी को तीज-त्योहारों के नाम पर अपने प्यार और जीवन साथी के लिए सजने-संवरने की सीख अलग दे रहा है।

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