ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः बारात की पंगत

लोगों के तरह-तरह के शौक होते हैं। कुछ लोग बारातों में जाने के शौकीन होते हैं, बल्कि यह कहिए कि वे जन्मजात बाराती होते हैं।
Author October 7, 2017 02:58 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

लोगों के तरह-तरह के शौक होते हैं। कुछ लोग बारातों में जाने के शौकीन होते हैं, बल्कि यह कहिए कि वे जन्मजात बाराती होते हैं। किसी की भी बारात में जाने का मौका मिले, वे तुरंत जाने को तैयार हो जाते हैं। सच मानो तो वे बारात में जाने के लिए खुद ही आग्रह करते नजर आते हैं। बारात के लिए भला संकोच कैसा! सारी लज्जा को तिलांजलि देकर वे खुद ही स्वयं को आमंत्रित करते हैं। ऐसे आक्रामक प्रवृत्ति के लोग बुलावे का इंतजार ही नहीं करते। किसी को जानें या न जानें, कोई बुलाए या न बुलाए वे तो उसे अपना मानकर जाने की जुगाड़ लगा ही लेते हैं।

बाराती वही जो हर बारात में जाए। पर जो कपड़े पहने बैठा है उसी में जाए। न घर से अपना तौलिया ले जाए न मंजन, ब्रश और शेविंग का सामान। यानी घर से कुछ भी लेकर न जाए। न पैसे न कपड़े। अनुभवी बाराती जानते हैं कि लड़की वाला बारातियों के लिए सभी इंतजाम करता है। फिर अपना कुछ भी ले जाने की भला क्या जरूरत है? और वहां जाकर ठाठ से सभी चीजों का मजा ले। जो भी खिलाया-पिलाया जाए, चाव से खाए। किसी चीज को इनकार ही न करे। मना करने पर न जाने कौन बुरा मान जाए! जरा सी बात पर क्यों किसी का दिल तोड़ा जाए। डर या संकोच भला किस बात का और क्यों? एक बाराती ऐसा भी था जो जब मिठाई खिलाई जा रही थी तो उसने रसगुल्लों से भरा हुआ पूरा डोंगा ही यह कहकर रखा लिया कि परोसने वाले को बार-बार न आना पड़े। और उसने पच्चीस-तीस रसगुल्ले चट कर लिए। हाजमा हो तो ऐसा कि सब हजम हो जाए। इनकार करने वाले को कमजोर, अनुभवहीन या शर्मीला करार दिया जाता है।
एक अवसर पर बारातियों को पाट पर बैठा कर भोजन कराया जा रहा था। तब एक बड़ा कटोरा मलाई और मेवा से भरा दूध भी पिलाने का रिवाज था। एक बूढ़े व्यक्ति ने कटोरे में चार-छह पूरी और कचौड़ी तोड़ कर डाल लीं और कटोरा पाट के नीचे सरका लिया। खिलाने वाले समझे कि वृद्ध कटोरा पाट के नीचे से निकालना भूल गया तो उन्होंने याद दिलाई। वृद्ध बोला- यह तो पाया यानी खाया-सा ही जानिए। आप तो जो पत्तल में नहीं है वह लाते जाना। ऐसे खाऊ लोगों से ही तो बारात की शान कायम होती है।

बारात प्रिय लोग चाहते हैं कि भले ही दूसरों के हजारों खर्च हो जाएं पर उनकी फूटी कौड़ी भी खर्च न हो। बेशर्मी की हद तक खातिर कराने वाले ये लोग कभी-कभी हास्यास्पद स्थिति पैदा कर देते हैं। एक बार एक बाराती बात-बात में नखरे कर रहा था। कभी कहता कि पूरी ठंडी है तो कभी कहता कि कड़ी है। एक व्यक्ति ने तंग आकर उसका हाथ पकड़ कर उसे उठाया और पचास रुपए का नोट देकर कहा कि सामने सब्जी-पूरी की दुकान है वह वहां जाकर खा ले। और कुछ हो या न हो, ऐसे लोग माहौल तो बिगाड़ ही देते हैं और कटुता बढ़ाते हैं सो अलग। घर पर भले ही रूखा-सूखा खाते हों, पर बाराती बनते ही उनके तेवर बदल जाते हैं। व्यवस्था बिगाड़ना और रंग में भंग करने में ही उन्हें मजा आता है। वे हर बात में व हर चीज में दोष ढूंढ़ते हैं। इसके ठीक विपरीत कुछ अच्छे उदाहरण भी हैं। पर हैं वे बहुत कम। एक वाकया इंदौर के एक मशहूर उद्योगपति का है। वे जाते हरेक के यहां थे और खाना भी खाते थे और नेग भी देते थे। पर उनकी अपनी शैली और तरीका था।

वे दो पत्तलें लगवाते थे क्योंकि उनकी खुराक भी अच्छी थी और सेहत भी। परोसने वाले से साफ कह देते थे कि वह उनसे पूछें नहीं कि यह दूं और वह दूं। वह तो पत्तल में बस डालता ही जाए। उन्हें जब कुछ नहीं लेना होगा तो वे मना कर देंगे। पर वह उनसे इस या उस चीज के बारे में बार-बार न पूछे। एक बार जब वे एक बारात में गए तो साथ में खाने-पीने की तमाम व्यवस्था होने के बावजूद रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन रुकने पर पूरा खोमचा ही खरीद लेते और बारात में सबको बंटवा देते। बोले कि ये खोमचे वाले भी तो याद करेंगे कि कोई सेठ बारात में आया था। तो वे एक दरियादिल और गांठ से पैसा खर्च करने वाले सबमें घुलने मिलने वाले बाराती थे। नेग वे ग्यारह रुपए ही देते थे, पर देते सभी के यहां थे और जाते भी सभी के यहां थे। ऐसे बारातियों से बारात की शान और शोहरत बढ़ती है। वे कभी खुद को दूसरों पर नहीं थोपते।

पर ऐसे बाराती हैं ही कितने? ज्यादातर तो बारात में जाने के शौकीन और घरातियों की तौहीन करने वाले ही होते हैं। उनका काम ही दूसरों के पैसे पर ऐश करना होता है। व्यवस्था बिगाड़ना और हर ऐसा काम करना जो वे खुद अपने घर में नहीं कर पाते और हरेक पर रौब गांठना ही मानो उनका एकमात्र उद्देश्य होता है। वे बुराई-भलाई करने में ही सारा समय निकाल देते हैं। अब धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति बदल तो रही है पर अभी भी अधिकांश बारातियों की आदतें नहीं सुधरी हैं। वे सच्चे अर्थों में स्वयंसेवी और स्वयंजीवी हैं। खुद का ही ख्याल रखते हैं। दूसरे अपना ख्याल खुद रखें। उन्हें दूसरों से क्या मतलब?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.