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दुनिया मेरा आगेः समता का सपना

सफर के दौरान कभी ट्रेन में तो कभी बस में कई बार यात्रियों की दिलचस्प बातें सुनने को मिल जाती हैं और उनमें हमें वर्तमान समाज व्यवस्था और व्यवहार की झलक मिलती है।
Author April 14, 2018 02:41 am
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून में कुछ बदलाव करने की खबर आते ही राहुल गांधी ‘दलित-विरोधी सरकार’ की तख्ती लिए हंगामा करते नजर आए।

राज वाल्मीकि

सफर के दौरान कभी ट्रेन में तो कभी बस में कई बार यात्रियों की दिलचस्प बातें सुनने को मिल जाती हैं और उनमें हमें वर्तमान समाज व्यवस्था और व्यवहार की झलक मिलती है। अक्सर बातचीत समसामयिक मुद्दों से ही शुरू होती है और जब बात निकलती है तो दूर तक जाती ही है। कुछ समय पहले मैं एक वातानुकूलित ट्रेन में सफर कर रहा था। उम्मीद के मुताबिक उसमें सफर करने वाले लगभग सभी लोग संभ्रांत और उच्च शिक्षित लग रहे थे। लेकिन उनकी बातों को सुनने पर लगा कि हमारी समाज व्यवस्था में कुछ ऐसा है कि व्यक्ति कितना भी पढ़-लिख जाए, मगर बचपन से लेकर युवावस्था तक परिवार और आसपास के वातावरण से हासिल संस्कार उसकी मानसिकता में गहरे बैठे होते हैं। ऐसी स्थिति में उसकी सटीक विश्लेषण करने की क्षमता नष्ट हो जाती है, उसमें दूध का दूध और पानी का पानी करने का विवेक नहीं रह जाता, क्योंकि उसकी सोच पर पूर्वाग्रह या दुराग्रह हावी होते हैं।
अपनी सामाजिक श्रेष्ठता के मानस में जीने वाले आज भी ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो यह मान कर चलते हैं कि उनकी सेवा करना कमजोर सामाजिक हैसियत के लोगों की नियति है, इसलिए उन्हें इससे ज्यादा कुछ नहीं सोचना चाहिए। मेरे आमने-सामने की सीटों पर मेरे सहित आठ लोग बैठे थे।

एक ने उस दिन की मुख्य खबर के बारे में आक्रोश से भर कर कहा कि आज लोगों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करना भी जरूरी नहीं लग रहा है। जबकि अदालत ने बहुत सोच-समझ कर ही कानूनों के दुरुपयोग पर एक सही फैसला दिया है। इसके बावजूद खुद को दलित कहने वाले लोग हंगामा मचा रहे हैं; एक समय जो लोग बदहाली में जिंदगी गुजार रहे थे, आज उनके तेवर बेलगाम हो गए हैं। उसके बगल में बैठे व्यक्ति ने उत्साहित होकर ज्यादा तीखी बात कही और तीसरे ने कहा कि अगर ये लोग अपनी सीमा में रहें और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करें तो ताकतवर लोगों को उनके साथ बुरा व्यवहार करने का मौका क्यों मिलेगा! आखिर जबरन मूंछें रखने या घोड़ी पर सवार होने से क्या मिल जाता है! उसने यह भी कहा कि आंबेडकर का नाम लेकर आज उत्पात मचाया जा रहा है और उसे जागरूकता का नाम दिया जा रहा है।

वहां बैठे होने की वजह से उनकी बातें सुनना मेरे लिए मजबूरी थी। अपने कामकाज और सार्वजनिक जीवन में मुझे अक्सर इस तरह की बातें सुनने को मिलती रही हैं और अब मैं दुखी होने के बजाय अफसोस के भाव में चला जाता हूं। मैंने आंबेडकर वांग्मय को पढ़ा है। ऐसे मौकों पर मुझे बाबा साहेब आंबेडकर के वे विचार याद आने लगते हैं, जिनमें उन्होंने कहा था कि ‘शिक्षा ही समाज में समानता ला सकती है। शिक्षा ही समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकाती है। मनुष्य जब शिक्षित हो जाता है तो उसमें अच्छे और बुरे की पहचान करने की क्षमता बढ़ जाती है।’ लेकिन जब उच्च शिक्षित और संभ्रांत होने के दावे करने वाले लोगों को सामाजिक अन्याय के शिकार तबकों के खिलाफ संवेदनहीन बातें करते देखता-सुनता हूं तो ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति होने लगती है। सभी संसाधनों से लैस और सत्ता संस्थानों में अवसरों का हर लाभ उठाने के बावजूद ऐसे लोग हकीकत को देखना और स्वीकार करना क्यों नहीं चाहते हैं? इनकी विश्लेषण क्षमता इनकी सामाजिक श्रेष्ठता की ग्रंथियों से क्यों संचालित होती है? ऐसी स्थितियों में मुझे भारत की शिक्षा-व्यवस्था और सामाजिक विकास के दावे बेमानी लगते हैं, जिनमें हम आए दिन एक महाशक्ति होने और विश्वगुरु होने की बातें करते हैं। मेरे सामने यह सवाल बार-बार खड़ा हो जाता है कि खुद को उच्च शिक्षित कहने वाले लोग कैसे और क्यों समाज व्यवस्था की उन परतों को देखना और पहचानना जरूरी नहीं समझते हैं जो भेदभाव और वंचना की बुनियाद पर ही कायम हैं।

हमारे देश का संविधान समता को प्रोत्साहित करने की भावना से ओतप्रोत है। विकास-क्रम में पीछे छोड़ दिए गए तबकों के लिए विशेष अवसरों की व्यवस्था इसी का हिस्सा है। लेकिन मौजूदा आधुनिक दौर में भी वर्चस्वशाली सामाजिक वर्गों की सोच नहीं बदल सकी है। बाबा साहेब ने शायद इसी को ध्यान में रखते हुए कहा था- ‘हमारी लड़ाई धन या शक्ति के लिए नहीं है। यह आजादी की लड़ाई है। यह मानवीय व्यक्तित्व का दावा करने की लड़ाई है।’ हमारा संविधान देश के हर नागरिक को किसी भी तरह के भेदभाव के बिना समान मानवीय गरिमा प्रदान करना चाहता है। समता के समाज का निर्माण करना चाहता है, लेकिन इसके लिए सबको और खासतौर पर खुद को उच्च शिक्षित और संभ्रांत कहने वाले लोगों और समुदायों को अपनी सोच बदलनी होगी। पीछे छूट गए तबकों के साथ और बराबर आने की कोशिशों का स्वागत करना होगा। तभी हम एक समानता के मूल्यों से लैस सभ्य और विकासमान समाज की रचना कर पाएंगे।

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