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दुनिया मेरे आगेः मायूस प्रतिभाएं

हम लगातार सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर बात करने के क्रम में कई ऐसे क्षेत्रों की समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं जिन्हें विकास का आधार माना जाता है।

Author March 29, 2017 3:34 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

कविता

हम लगातार सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर बात करने के क्रम में कई ऐसे क्षेत्रों की समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं जिन्हें विकास का आधार माना जाता है। जबकि उन क्षेत्रों की भूमिका हमारे आम जीवन में बड़ी होती है। हाल ही में अनूप ने फोन पर बताया कि उसके कॉलेज में ‘कैंपस सेलेक्शन’ हो रहा है, यानी संस्थान में ही आकर कोई कंपनी अपने यहां काम करने वालों को चुन रही है। उसमें उसे एक कंपनी ने चुन लिया था। मैंने सबसे पहले तनख्वाह पूछी तो उसने बताया एक लाख अस्सी हजार रुपए सालाना। मैंने इसे बहुत कम कहा तो अनूप ने कहा कि वहां आने वाली सारी कंपनियां इतनी ही तनख्वाह का प्रस्ताव दे रही हैं। मैंने कहा कि तुमने इतनी मेहनत करके बीटेक में दाखिला लिया था और आज नौकरी मिल रही है तो वेतन इतना कम क्यों है? क्या आइटी क्षेत्र में नए लोगों को इतनी कम तनख्वाह पर नौकरी मिलती है? जो इंजीनियर बनने गया है, आखिर वह कैसे इतनी कम तनख्वाह पर राजी हो जाता है? उसने बताया कि अब इंजीनियरों की हालत बहुत खराब हो चुकी है। मैं सोचती रही कि आखिर क्या कारण हो सकता है कि सारी कंपनियां एक साथ इतनी कम तनख्वाह पर नए लोगों को नौकरी का प्रस्ताव दे रही हैं। अगर एक बारहवीं पास इलेक्ट्रीशियन महीने में बारह हजार रुपए पाता है तो एक इंजीनियर की तनख्वाह भी तेरह-चौदह हजार रुपए से ज्यादा नहीं है। सवाल है कि इंजीनियरिंग की डिग्री का क्या फायदा? यही नहीं, नए लोगों को जो सैलरी मिलती है, वह कई सालों तक उतनी ही बनी रहती है या फिर नाममात्र की बढ़ोतरी की जाती है।

मेरे एक वरिष्ठ बंगलुरु में आइटी क्षेत्र में ही किसी बड़ी कंपनी में काम करते हैं। उन्होंने जो बताया वह तो और हैरान करने वाली बात है। वे छह साल पहले जिस तनख्वाह पर कंपनी में गए थे, अब भी उतने ही पैसे पाते हैं। मैं इसकी वजहें नहीं समझ पा रही थी। लेकिन इस बीच आइटी उद्योग में काम कर चुके टीवी मोहनदास पई ने आइटी क्षेत्र से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य सामने रखे जो इंजीनियरिंग करने वाले और उससे जुड़े लोगों को परेशान करने वाले हैं। उन्होंने कहा कि भारत की बड़ी आइटी कंपनियां संस्थानों के साथ इस बात के लिए सांठगांठ कर लेती हैं कि नए लोगों को कम तनख्वाह पर किस तरह नौकरी दी जाए। दरअसल, शुरुआत करने के स्तर पर सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की अधिक संख्या को देखते हुए कंपनियां इस बात का फायदा उठाती हैं। यों तो भारत में ज्यादा निजी नौकरियों में तनख्वाह बढ़ाने के मामले में अधिकतम कंजूसी बरती जाती है। लेकिन अब यह प्रवृत्ति सभी क्षेत्रों के रोजगार में हावी होती जा रही है। महंगाई बढ़ी है, उस तुलना में आइटी कंपनियों ने भी वेतन नहीं बढ़ाया। पई ने 1994 से 2006 तक इंफोसिस में बतौर मुख्य वित्तीय अधिकारी के तौर पर काम किया है। उन्होंने साफतौर पर यह माना कि आइटी कंपनियां आपस में बात करके नई शुरुआत करने वालों की तनख्वाह न बढ़ाने का फैसला करती हैं। हालांकि यह इन उद्योगों के लिए अच्छी बात नहीं है।

सवाल है कि जब तनख्वाह का पूरा ढांचा पहले से ही तय कर लिया जा रहा है तो कोई कैसे उससे ज्यादा पैसे की बात सोच सकता है? ये तो एक तरह से पहले से ही सोचा-समझा खेल हो गया जो सारी बड़ी कंपनियां संस्थानों के साथ मिल कर खेल रही हैं। एक स्थिति यह जरूर है कि आइटी क्षेत्र में एक साल में करीब चार लाख इंजीनियरों की मांग होती है, जबकि हर साल लगभग पंद्रह लाख इंजीनियर तैयार होकर निकलते हैं। यानी कहा जा सकता है कि कम तनख्वाह की बढ़ती प्रथा को फिलहाल तो शायद कोई नहीं रोक पाए। आॅल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन की वेबसाइट के मुताबिक भारत में सवा छह हजार से ज्यादा सरकारी और गैर-सरकारी इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी कॉलेज हैं और तीन हजार एक सौ उनतालीस पॉलिटेक्निक संस्थान हैं। अगर इंजीनियरिंग कॉलेज और इंजीनियरों की संख्या ऐसे ही बढ़ती रही तो हालात ज्यादा बिगड़ सकते हैं।

पिछले नौ साल में सामान्य जीवन में महंगाई बेलगाम होती गई है और कई क्षेत्रों में इस अनुपात में तनख्वाहों में कुछ खयाल रखा गया है, भले वह जरूरत के मुताबिक उचित नहीं हो। लेकिन आइटी क्षेत्र में वेतन में बढ़ोतरी लगभग थमी हुई है। जबकि विकास का समूचा खाका जो पेश किया जा रहा है, उसकी बुनियाद सूचना और तकनीक पर ही टिकी है। आज सरकार जिस डिजिटल इंडिया की बात कर रही है, क्या वह आइटी क्षेत्र में बेहतर गुणवत्ता से लैस सेवा देने वाले योग्य इंजीनियरों के बिना संभव है? सस्ती मजदूरी पर सेवा लेकर कब तक गुणवत्ता के पैमाने को बरकरार रखा जा सकता है? ऐसे में अगर विदेशों की ओर प्रतिभा पलायन जैसी स्थितियां सामने आती हैं तो उसे कैसे अस्वाभाविक कहा जाएगा!

 

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