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दुनिया मेरे आगेः अर्थ बदलते शब्द

समय कितनी तेजी से बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। अभी जिस पल हम बात कर रहे होते हैं, अगले पल वह इतिहास के पन्ने में दब जाता है।

Author September 23, 2016 2:48 AM

कृष्ण कुमार रत्तू

समय कितनी तेजी से बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। अभी जिस पल हम बात कर रहे होते हैं, अगले पल वह इतिहास के पन्ने में दब जाता है। शायद इसे ही समय का काल-चक्र कहा गया है। गांव शहर में कैसे और कब बदल गए, पता ही नहीं चला। कल तक यहां लहलहाती हुई हरी-भरी फसलें थीं, आज यह पक्की बस्तियों के जंगल में बदल गया है। गांव की बोली कैसे बदल गई चुपचाप, यह तो तब पता चलता है जब गांव से आया हुआ लड़का शहर से भी ज्यादा नवशहरी हो गया दिखाई देता है! आपका लिबास, व्यवहार, शिष्टाचार- सब कुछ तो इस समय के झोंके में ओझल हो गया है। शहर कुछ देने के नाम पर यही दे रहा है!

हर गली-मोहल्ले में सूचना क्रांति की दस्तक के कारण मोबाइल और फेसबुक, वाट्सऐप, यू-ट्यूब ने टीवी की चकाचौंध को भी पीछे छोड़ दिया है। टेलीविजन कब बीते हुए समय की बात हो जाए, किसी को पता ही नहीं चलेगा। यही तो है समय गति और गतिमान होते समय का बदलता हुआ चेहरा। बदलते समय में चेहरे को कमजोरी और झुर्रियों ने रिझाना शुरू कर दिया है। मुझे लगता है कि गांव ज्यादा तेजी से वृद्ध हो रहा है, क्योंकि वहां के खेत-खलिहान, गली-मोहल्ले, पंसारी की छोटी-छोटी एकाध दुकानें अब उन सामानों से भरने लगी हैं, जिनमें गांव की लस्सी का जिक्र नहीं होता। अब ठंडा यानी ‘कोकाकोला’ की बातें होती हैं। मोबाइल के सिम कार्ड रिचार्ज और भोजपुरी से लेकर हरियाणवी और पंजाबी के द्विअर्थी संवादों वाले गीतों की पाइरेसी की डीवीडी और पेन-ड्राइव तक मिलने लगी हैं। अब आटे के बिस्कुट नहीं हैं, पर किस-किस पश्चिमी ब्रांड के आटे की मैगी जितनी मर्जी, ले लो। नाम, दाम, ध्यान सब कुछ तो बदल गया है। बचा हुआ तेजी से बदल रहा है। सीरियलों और उनके पात्रों के नाम बच्चों को यों याद हैं, जैसे विरासत का खजाना हों वे शब्द। जैसे पिता से ‘डैडी’, ‘पिताश्री’ और अब आगे ‘पिताश्री महाराज’ हो गया है। यह विज्ञापनों के बहाने धारावाहिकों का शब्दों पर अतिक्रमण नहीं तो इस तरह के शब्दों के अर्थों के परिवर्तन को आप किस श्रेणी में रखेंगे? विडंबना यह कि जो लोग बदलाव में बह रहे हैं, उन्हें भी अंदाजा नहीं है कि आने वाले दौर में वक्त कौन-सा गुल खिलाएगा!

यह माना जा सकता है कि बदलाव प्रकृति का नियम है, लेकिन आपकी जुबान या भाषा इतनी भी बेगानी और बेमानी न हो जाए कि अगली पीढ़ी को वह डीवीडी में ही पढ़ने को मिले। इन दिनों तो ‘स्मार्ट शहरों’ के साथ शायद आपकी खासतौर पर हिंदी भाषा और भी ‘स्मार्ट’ हो गई। शब्दों के अर्थ बदल गए हैं और अर्थों को शब्दों की जमीन, शब्दों का जड़ से उखड़ना भी रास आ गया है।
मेरे जैसा गांव से उखड़ा हुआ कोई भी थोड़ा-बहुत पढ़ा लिखा व्यक्ति उस गांव की त्रासदी का जीता-जागता सबूत है, जिस गांव के कच्चे मकान, कीचड़ से भरी हुई गलियां और टूटी हुई चारदिवारी का स्कूल महानगर में रहते हुए आपके अंग्रेजी से लैस शब्दों के अर्थ भी बदलता है। गोया अब न गांव के रहे, न शहर के। शहर में सभ्यता और विश्वास की जड़ लगनी नामुमकिन है और गांव से उखड़ी ऐसी कि आपका सब कुछ ध्वस्त हो गया है। बच्चे शहर में ढल गए। भाषा और बोली बेगानी हो गई। मां-बाप वृद्ध गांव में पड़े चिट्ठियों के इंतजार में और बूढ़े हो गए। पर गांव का डाकिया भी ऐसा हो गया है कि अब वह चिट्ठियां कम लाता है, बल्कि आॅनलाइन मंगवाई गई वस्तुओं के पैकेट लेकर आने लगा है।

यह कैसा बदलाव है, जहां शब्दों के अर्थ बदल गए हैं, संवेदनाएं शून्य हो गई हैं, रिश्ते खत्म हो गए हैं। इस संवादरहित फेसबुक और पल-पल खत्म होते अर्थों को देखना अपने आपको खत्म होते देखने की तरह ही है। आदिकाल से समय का यह कारवां चल रहा है। अब लगने लगा है कि नए भारत की नई भावी पीढ़ी शायद इन बदले हुए अर्थों से ही शब्दों की तलाश करेगी, जबकि हम और हमारी पीढ़ी का सारा समय जुगाड़ और शब्दों के अर्थ ढूंढ़ने में ही यानी रोजी-रोटी की जद्दोजहद में ही गुजर गया। लेकिन सच तो यह भी है शब्दों का अर्थ होना और अर्थों का समय के साथ बदल जाना। यही तो दुनिया का तमाशा है, जिसे हम चुपचाप देखते हुए गुजर जाते हैं और खुशी या फिर उदासी से बार-बार भर जाते हैं।

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